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बिज़नेस स्टैंडर्ड

मुनाफा और परोपकार टाटा की उलझन: रिश्ते में बढ़ते तनाव का स्थायी समाधान क्या है?

टाटा ट्रस्ट्स के लिए आदर्श स्थिति यह होगी कि वह टाटा संस में अपनी नियंत्रक हिस्सेदारी छोड़ दे और वाणिज्यिक शाखा को परोपकार के बंधनों से मुक्त कर दे। तर्क दे रहे हैं एम एस श्रीराम

Tata Group

इलेस्ट्रेशन - अजय मोहंती

Last Updated: सितंबर 21, 2026 | 9:53 PM IST

टाटा संस में हाल में शुरू हुए घटनाक्रम के बाद टाटा समूह के संचालन को लेकर काफी कुछ लिखा जा चुका है। यह बात हमें मौका देती है कि हम ऐसे कारोबारों के जटिल रिश्तों का परीक्षण करें जिनका एक मात्र उद्देश्य अंशधारकों की संपत्ति को अधिकतम करना है और जो अपने मुनाफे से परोपकार के काम करते हैं।

कई अन्य कारोबारी घरानों के मुनाफे से उपजे फाउंडेशनों से इतर टाटा का ढांचा एकदम अलग है। यहां परोपकारी संस्था को सीधे होल्डिंग कंपनी टाटा संस पर प्रत्यक्ष नियंत्रण हासिल है। परोपकारी संगठनों और कारोबारों का जवाबदेही ढांचा अलग-अलग होता है और उनका गठन भी अलग तरह से होता है। इससे उनके कामकाज के तरीके आपस में टकराते हैं और उनमें दरारें पड़ना स्वाभाविक है। टाटा समूह में एक सदी तक ऐसा नहीं नजर आया तो यह कोई चमत्कार ही है। परंतु उस चमत्कार को दोनों शाखाओं के नेतृत्व के तालमेल के माध्यम से आसानी से समझाया जा सकता है। 

रतन टाटा द्वारा व्यावसायिक और परोपकारी इकाइयों के नेतृत्व को अलग-अलग करने का नियम लागू किए जाने के बाद स्थिति बदल गई। इसके तहत यह सुनिश्चित किया गया कि इन दोनों इकाइयों का नेतृत्व अलग-अलग व्यक्ति करें। दोनों का नेतृत्व दो मजबूत व्यक्तित्वों के हाथों में होने के कारण इस व्यवस्था में दोनों पक्षों के बीच औपचारिक बातचीत और वार्ता की स्थिति बन गई। बहुसंख्यक हिस्सेदारी रखने वाले ट्रस्ट और एक व्यावसायिक समूह के बीच संबंध सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के संबंधों जैसा है। एक ही समय में परस्पर निर्भर भी और टकरावपूर्ण भी। 

समूह की व्यावसायिक इकाई टाटा संस के नजरिये से, समूह से होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल केवल दीर्घकाल में कारोबार को बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए। इसलिए उसे भविष्य में उभरने वाले अवसरों के लिए पूंजी बचाकर रखनी होती है, टर्नअराउंड योजना के तहत घाटे में चल रहे कारोबारों को बनाए रखना होता है और ऐसे नए क्षेत्रों में पूंजी लगानी होती है जहां शुरुआती दौर में लगातार बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है।

मुनाफे का वितरण व्यावसायिक इकाई के रणनीतिक उद्देश्यों का परिणाम होता है। वहीं टाटा ट्रस्ट्स अपने परोपकारी कार्यों को बड़े पैमाने पर जारी रखने के लिए संसाधनों का निरंतर प्रवाह चाहेगा खासकर तब जब उन्होंने कई वर्षों के लिए बड़े अनुदान देने की प्रतिबद्धता जताई हो। यह भी संभव है कि टाटा ट्रस्ट्स ऐसी गतिविधियों को वित्तीय सहायता दे जो स्वभावतः व्यावसायिक हितों के विपरीत हों। उदाहरण के लिए पर्यावरण संरक्षण या श्रमिक अधिकारों से जुड़ी गतिविधियां। याद कीजिए कि पश्चिम बंगाल के सिंगूर में नैनो संयंत्र के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले कुछ प्रदर्शनकारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से टाटा ट्रस्ट्स के लाभार्थी थे। यदि टाटा ट्रस्ट्स स्वायत्त रूप से काम करता है तो उसके और व्यावसायिक हितों के बीच सिर्फ कभी-कभार ही समानता या तालमेल देखने को मिलेगा।

व्यवसाय को एक साधन बनाकर सामाजिक उद्देश्य हासिल करने का एक प्रयोग अमेरिका स्थित कंपनी पैटागोनिया के मामले में देखने को मिलता है। इस कंपनी का उद्देश्य ही पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के लिए काम करना है। वर्षों तक पैटागोनिया का स्वामित्व और नियंत्रण एक ही परिवार के पास रहा जिससे उसके लिए मुनाफे से ऊपर अपने उद्देश्य को रखना आसान रहा। आज भी पैटागोनिया की नई संरचना पूरी तरह एक ऐसे ट्रस्ट के स्वामित्व में है जो उसके मूल उद्देश्य के लिए समर्पित है। इसका पूरा स्वामित्व ट्रस्ट के पास है और यह शेयर बाजार में सूचीबद्ध नहीं होगी। लेकिन यह व्यवस्था तब तक अच्छी तरह काम करती है, जब तक स्वामित्व सीमित हाथों में रहे और बोर्ड की बैठकें खाने की मेज पर ही हो सकें! 

जब दो इकाइयां परस्पर विरोधी उद्देश्यों के साथ काम करती हैं तो इस विरोधाभास को दूर करने का एकमात्र तरीका साझा नेतृत्व या दोनों के बीच उच्च स्तर का तालमेल कायम करना है। इससे उद्देश्य को तर्कसंगत बनाने और परिस्थितियों के अनुसार रुख बदलने में मदद मिलती है, कभी मुनाफे के पक्ष में उद्देश्य से समझौता करना और कभी उद्देश्य के लिए मुनाफे को छोड़ देना।

कोई प्रभावशाली और सर्वमान्य नेतृत्व दोनों पक्षों से जुड़े लोगों के मतभेदों को संभाल सकता है बशर्ते वह लगातार किसी एक उद्देश्य को दूसरे पर तरजीह न देता हो। रतन टाटा ने अपने नेतृत्व के शुरुआती दौर में खुद को समूह के निर्विवाद अगुआ के रूप में स्थापित और मजबूत किया था। उनके पास ऐसा व्यक्तित्व, प्रभाव और अधिकार था, जिससे वह यह संतुलन कायम कर सकते थे।

जैसे ही टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच सत्ता का विभाजन हुआ, तनाव सामने आने लगा। तनाव भले ही प्राथमिकताओं को लेकर हो लेकिन उसका असर व्यक्तित्वों के टकराव के रूप में दिखाई देता है। यदि संबंधित व्यक्तित्व एक-दूसरे के प्रति समायोजन और सहयोग की भावना रखते हैं तो व्यवस्था काम करती है। यदि ऐसा नहीं है तो वह काम नहीं करती। अगर हम अन्य परोपकारी संस्थानों को देखें, तो उनमें से अधिकांश का निर्माण वितरित किए गए मुनाफे या व्यावसायिक इकाई में हिस्सेदारी बेचकर प्राप्त रकम से बने कोष के जरिए हुआ है। इस प्रक्रिया में व्यावसायिक और परोपकारी इकाइयों के स्वामित्व को अलग कर दिया गया यानी दोनों के बीच नेतृत्व और नियंत्रण का विभाजन हो गया।

नए दौर के परोपकारी संगठनों, जैसे गेट्स फाउंडेशन, निलेकणी फिलैंथ्रपीज और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, ने अपनी परोपकारी पहलों के लिए धन या तो व्यावसायिक इकाइयों द्वारा वितरित किए गए मुनाफे से जुटाया है या हिस्सेदारी बेचकर प्राप्त रकम से। आगे चलकर टाटा समूह के लिए भी यही एकमात्र रास्ता रह जाता है,भले ही वे हिस्सेदारी कम करने और लिस्टिंग से बचने की को​शिश कर रहे हों। दूसरा विकल्प केवल यही है कि साझा नेतृत्व, जिसके पास नैतिक अधिकार हो, के जरिए परोपकारी और व्यावसायिक इकाइयों के बीच तालमेल कायम किया जाए।

नोएल टाटा वह भूमिका निभा सकते थे जो रतन टाटा ने टाटा समूह की कमान संभालने के शुरुआती दौर में निभाई थी। हालांकि रतन टाटा के कार्यकाल में किए गए बदलावों को देखते हुए अब ऐसा तालमेल मुश्किल नजर आता है। शापूरजी पलोनजी समूह को नकदी की जरूरत है इसलिए किसी भी तरह का विरोध बस उस चीज को टाल रहा है जो होकर ही रहेगी।

टाटा ट्रस्ट्स के लिए आदर्श स्थिति यह होगी कि वह टाटा संस में अपनी नियंत्रणकारी हिस्सेदारी छोड़ दे जिससे व्यावसायिक इकाई पर परोपकारी दायित्व का बोझ न रहे और वह स्वतंत्र रूप से व्यावसायिक निर्णय ले सके। इसके साथ ही ट्रस्ट्स अपनी बची हुई हिस्सेदारी से मिलने वाले मुनाफे का लाभ उठाता रहे। टाटा संस की शेयर बाजार में सूचीबद्धता से बोर्ड में विभिन्न व्यावसायिक हितों का प्रतिनिधित्व आएगा। टाटा ट्रस्ट्स की पर्याप्त अल्पांश हिस्सेदारी उसे कुछ असाधारण और महत्त्वपूर्ण फैसलों पर मानक/सीमित विशेष अधिकार दे सकती है जबकि रोजमर्रा के फैसले व्यावसायिक हितों के आधार पर लिए जाने चाहिए।

टाटा ट्रस्ट्स द्वारा अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा बेचने से उसे एक बड़ा कोष बनाने में भी मदद मिलेगी। इस कोष का इस्तेमाल टाटा संस से समय-समय पर मिलने वाले असमान लाभांश के बीच संतुलन बनाने के लिए किया जा सकेगा। टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच संबंधों के महत्त्वपूर्ण और ठोस हिस्से को अलग-अलग करना एक दीर्घकालिक और स्थायी संरचनात्मक समाधान है। जाहिर है, विरासत, भावनाएं, परंपराएं और अहंकार तर्कसंगत ढांचे पर आधारित ऐसे समाधान के रास्ते में बाधा बनते हैं। 


(लेखक भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलूरु में लोक नीति केंद्र में प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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