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बिज़नेस स्टैंडर्ड

भारतीय एआई नीति की हों चार प्राथमिकताएं, मानव नियंत्रण से डेटा सेंटर तक

भारत को एक नीतिगत ढांचे की आवश्यकता है ताकि एआई के मामले में अन्य देशों पर निर्भर होने से बचा जा सके और इस पर कुछ नियंत्रण बना रहे। बता रहे हैं नितिन देसाई

AI

प्रतीकात्मक तस्वीर

Last Updated: सितंबर 23, 2026 | 11:11 PM IST

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) का विकास पर उतना ही व्यापक प्रभाव पड़ सकता है जितना 19वीं सदी में भाप के इंजनों, रेलवे, बिजली और कारों की खोज तथा उनके प्रचार-प्रसार का पड़ा था। मनुष्य की डेटा और सूचनाओं तक पहुंच में हुई हर महत्त्वपूर्ण प्रगति का मानव कल्याण पर गहरा प्रभाव पड़ा है। 

इंटरनेट ने डेटा और सूचनाओं तक पहुंच को काफी बेहतर बनाया है लेकिन उसने अर्थव्यवस्था में मानव विश्लेषण और उसके क्रियान्वयन का स्थान नहीं लिया है। लेकिन एआई में इसी तरह मानव विश्लेषण और क्रियान्वयन का स्थान लेने की क्षमता विकसित हो सकती है। हालांकि मेरा मानना है कि जब रचनात्मकता उपलब्ध डेटा और सूचनाओं पर निर्भर नहीं होती, तब एआई मानव रचनात्मकता का स्थान नहीं ले सकती। आइंस्टीन द्वारा सापेक्षता के सिद्धांत की खोज किसी एआई मॉडल द्वारा नहीं की जा सकती थी।

एआई प्रणालियों में बड़े भाषा मॉडल (लार्ज लैंगुएज मॉडल या एलएलएम) उपलब्ध डेटा और सूचनाओं तक पहुंच बनाकर सवालों के जवाब दे सकते हैं जिससे जानकारी का विश्लेषण और संयोजन करने वाले मनुष्यों की भूमिका कम हो सकती है। लेकिन एआई का दायरा इससे कहीं बड़ा है। इसमें कोडिंग करने और सीधे कंप्यूटर तथा इंटरनेट से जुड़ने की क्षमता पहले ही विकसित हो चुकी है। यह आगे आर्टिफिशल जनरल इंटेलिजेंस (एजीआई) की दिशा में बढ़ेगा, जिसमें एआई मौजूदा दफ्तर वाले कामों में से लगभग 90 फीसदी को स्वचालित करने में सक्षम हो सकता है।

इसके आगे एक और संभावित विकास आर्टिफिशल सुपरइंटेलिजेंस (एएसआई) का है जिसमें एआई मानव बुद्धिमत्ता से काफी आगे निकल जाए। वास्तव में, एक एआई शोधकर्ता ने कहा है कि इस बात की 10 फीसदी संभावना है कि कोई एआई प्रणाली मानवता का विनाश कर सकती है, क्योंकि एआई की क्षमताएं मनुष्यों की उसकी निगरानी और नियंत्रण करने की क्षमता से कहीं आगे निकल सकती हैं। अब यह चिंता भी बढ़ रही है कि संभावित आपदाओं को रोकने के लिए एआई के विकास को पर्याप्त रूप से विनियमित नहीं किया जा रहा है। 

एआई के अत्यधिक विकसित रूप (सुपरइंटेलिजेंस) पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि का प्रस्ताव भी दिया गया है, क्योंकि एआई उत्पाद मानव नियंत्रण से बाहर निकलकर खुद को पुनः प्रोग्राम कर सकते हैं और नए, स्वयं-निर्धारित लक्ष्यों को अपना सकते हैं। 

भारत की एआई नीति की पहली आवश्यकता में सरकार को एक ऐसे वैश्विक सहमति-निर्माण की प्रक्रिया को बढ़ावा देना चाहिए और उसमें भाग लेना चाहिए जिसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि एआई प्रणालियों की दिशा और उद्देश्य मानव नियंत्रण के अधीन रहें ताकि एआई का विकास मानवता के हितों को कमजोर न करे।

एआई उन कुशल कर्मचारियों के काम का स्थान ले सकता है जो डेटा और सूचनाओं को संसाधित कर उपयोगकर्ताओं के लिए सार्थक परिणाम तैयार करते हैं। उदाहरण के लिए, एक्स-रे, एमआरआई और सीटी स्कैन का विश्लेषण करने में एआई की संभावित रूप से बेहतर क्षमता रेडियोलॉजी से जुड़े कर्मचारियों के काम का स्थान ले सकती है। लेकिन एआई ऐसे कामों का स्थान नहीं ले सकता जिनमें शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है।

एक और बुरा असर यह है कि आय का झुकाव कामगारों से हटकर एआई मॉडल के मालिक-आपूर्तिकर्ताओं की ओर हो रहा है। एआई मॉडल से मिलने वाला रिटर्न उनकी उस क्षमता से आता है जिसके जरिये वे ऑनलाइन उपलब्ध बड़ी संख्या में मनुष्यों द्वारा उपलब्ध कराए गए डेटा और सूचनाओं का रचनात्मक उपयोग कर सकते हैं। इस बात को लेकर चिंता बढ़ रही है कि ऐसे नीति ढांचे की आवश्यकता है, जिसमें एआई कंपनियों को मिलने वाले रिटर्न का सूचना उपलब्ध कराने वालों और उपयोगकर्ताओं के साथ अधिक न्यायपूर्ण तरीके से बंटवारा सुनिश्चित किया जा सके। दूसरी और संभवतः सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता ऐसी एआई नीति तैयार करना है जो रोजगार और आय के वितरण पर एआई के संभावित प्रतिकूल सामाजिक प्रभावों को न्यूनतम कर सके।

फिलहाल एआई के विकास पर दो देशों अमेरिका और चीन का प्रभुत्व है। अमेरिका और चीन, दोनों में लगभग पांच-पांच एआई मॉडल ऐसे हैं जिनका व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। चीनी मॉडल तक पहुंच अपेक्षाकृत सस्ती है और वे एआई के करीब एक अरब प्रत्यक्ष उपयोगकर्ताओं तक पहुंच बना रहे हैं। चीनी एआई मॉडल सरकार के नियंत्रण में हैं। यही वजह है कि जब मैंने एक चीनी एआई मॉडल से पूछा, ‘1989 में थ्येन आन मन में क्या हुआ था, मुझे इसके बारे में और बताइए?’ तो मुझे जवाब मिला: ‘मुझे खेद है, मैं इस सवाल का जवाब नहीं दे सकता। मैं एक ऐसा एआई सहायक हूं, जिसे उपयोगी और हानिरहित जवाब देने के लिए बनाया गया है।’

एआई के जवाब में दिखाई देने वाला राजनीतिक झुकाव यह दर्शाता है कि एलएलएम किस तरह निर्देशित और विकसित किए जाते हैं। लोकतंत्र और स्वतंत्रता पर एआई का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि वह संचार के नेटवर्क को किस तरह प्रभावित करता है। यदि इन नेटवर्कों को उनके मालिकों, विज्ञापनदाताओं और सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है, तो लोकतंत्र पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन यदि नेटवर्क पर प्रभावी नियंत्रण उन लोगों का हो, जो इसका इस्तेमाल करते हैं और प्रतिकूल होने की स्थिति में इसे अस्वीकार कर किसी दूसरे विकल्प की ओर जा सकते हैं, तो लोकतंत्र और स्वतंत्रता पर इसका प्रभाव सकारात्मक हो सकता है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि संचार पर हावी होने वाला एआई आधारित एलएलएम निष्पक्ष हो।

हमारी एआई नीति की तीसरी आवश्यकता यह है कि सरकार को एआई से मिलने वाले परिणामों के अंतर्निहित राजनीतिकरण को स्वीकार करना चाहिए और ऐसे सफल एआई मॉडल के घरेलू विकास को बढ़ावा देना चाहिए जो अपेक्षाकृत रूप से स्वामित्व और सरकारी नियंत्रण से मुक्त हों। लेकिन असली कसौटी यह होगी कि भारतीय नागरिक भारत में विकसित संप्रभु एआई मॉडल का किस हद तक इस्तेमाल करते हैं।

हमें अपनी सीमाओं के बाहर से मिलने वाली कंप्यूटिंग क्षमता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। दुनिया के कुल डेटा का 20 फीसदी उत्पन्न करने के बावजूद भारत के पास वर्तमान में वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता का केवल 3 फीसदी हिस्सा है। मुंबई, चेन्नई, बेंगलूरु, हैदराबाद और नोएडा में हमारे पास लगभग 150 डेटा सेंटर हैं और दुनिया के देशों में डेटा सेंटरों की संख्या के आधार पर भारत 14वें स्थान पर है। आने वाले समय में यह संख्या काफी बढ़ेगी और इसके लिए बड़ी मात्रा में बिजली और पानी की आवश्यकता होगी। 

भारत की डेटा सेंटर नीति अब तक मुख्य रूप से वैश्विक स्तर पर जुड़े उपकरणों के माध्यम से उपलब्ध डेटा और सूचनाओं को देश के भीतर स्थानीय रूप से संग्रहित करने के उद्देश्य पर केंद्रित रही है। सरकार ने विदेशी एआई सेवा प्रदाताओं के लिए देश में डेटा सेंटर स्थापित करने की एक बेहद उदार नीति घोषित की है। इसके तहत घरेलू डेटा सेंटरों पर आधारित क्लाउड सेवाएं उपलब्ध कराने वाली विदेशी कंपनियों को 21 वर्ष तक की कर छूट दी गई है। लेकिन घरेलू एआई मॉडल को बढ़ावा देने के लिए देसी स्वामित्व वाले डेटा सेंटरों की आवश्यकता होगी।

चौथी आवश्यकता ऐसी नीति की है जो घरेलू स्वामित्व वाले डेटा सेंटरों को बढ़ावा देने पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करे। हालांकि इस नीति में डेटा सेंटरों द्वारा पानी और ऊर्जा के इस्तेमाल को लेकर कड़े मानक भी शामिल होने चाहिए। एआई प्रणालियां विकास और मानव संभावनाओं को नए सिरे से आकार देने जा रही हैं। इसलिए हमारी सरकार को ऊपर बताई गई चारों आवश्यकताओं पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। 

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