प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) से रिटायर होने वाले बुजुर्गों और नौकरीपेशा लोगों के लिए एक बहुत अच्छी और बड़ी राहत भरी खबर आई है। पेंशन रेगुलेटर PFRDA ने एन्युटी सरेंडर करने यानी पॉलिसी को बीच में ही बंद करने के नियमों को काफी आसान बना दिया है। रेगुलेटर के इस फैसले से उन रिटायर्ड कर्मचारियों को सबसे ज्यादा मदद मिलेगी, जो अचानक किसी मेडिकल इमरजेंसी (गंभीर बीमारी) से जूझ रहे हैं या फिर जिन्होंने पुराने नियमों के तहत ऐसी एन्युटी पॉलिसी ली थी जिसमें सरेंडर करने का विकल्प पहले से मौजूद था।
अब तक के नियमों के मुताबिक, एक बार एन्युटी पॉलिसी खरीदने के बाद उसे बीच में बंद करना या उससे बाहर निकलना लगभग नामुमकिन था। लेकिन अब पेंशन फंड रेगुलेटर एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) ने एक नया सर्कुलर जारी कर एन्युटी सर्विस प्रोवाइडर्स (ASPs) यानी बीमा कंपनियों को कुछ खास हालातों में पॉलिसी सरेंडर करने की मंजूरी दे दी है।
NPS के मौजूदा ढांचे के मुताबिक, जब कोई कर्मचारी रिटायर होता है, तो उसे अपने कुल जमा फंड का कम से कम 40 फीसदी हिस्सा एक एन्युटी प्रोडक्ट खरीदने में लगाना पड़ता है। इसी एन्युटी के बदले उसे हर महीने एक तय पेंशन मिलती है। एक बार यह एन्युटी खरीद ली गई, तो यह पूरी तरह लॉक हो जाती थी और इसे बीच में बंद करके पैसा वापस नहीं निकाला जा सकता था।
इस कड़े नियम की वजह से कई रिटायर्ड कर्मचारियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, खासकर तब जब अचानक घर में किसी की तबीयत खराब हो जाए और इलाज के लिए बड़े फंड की जरूरत पड़े। PFRDA ने खुद माना है कि उसे कई ऐसे आवेदन मिले थे जिनमें लोगों ने इस पाबंदी की वजह से होने वाली गंभीर परेशानियों का जिक्र किया था।
इसके अलावा, कई लोगों ने यह भी मांग की थी कि अगर पेंशनर्स या उसके परिवार में किसी को कोई गंभीर बीमारी (Critical Illness) हो जाए, तो उन्हें इस पैसे को निकालने की इजाजत मिलनी चाहिए। बुजुर्गों की इसी परेशानी को देखते हुए रेगुलेटर ने अब इस बेहद कड़े नियम को थोड़ा आसान बना दिया है।
दरअसल, अक्टूबर 2024 में PFRDA ने एन्युटी से जुड़े नियमों को काफी सख्त कर दिया था। उस समय जारी सर्कुलर में साफ कहा गया था कि पॉलिसी खरीदने के शुरुआती कुछ दिनों यानी ‘फ्री लुक’ पीरियड के बाद किसी भी हाल में एन्युटी को सरेंडर या कैंसल नहीं किया जा सकता। तब रेगुलेटर का तर्क था कि बुजुर्गों की बुढ़ापे की कमाई और उनकी लॉन्ग टर्म इनकम को सुरक्षित रखने के लिए ऐसा करना जरूरी है। लेकिन इस सख्ती का नुकसान यह हुआ कि मेडिकल इमरजेंसी या भारी आर्थिक संकट के समय भी लोग अपनी ही जमा पूंजी का इस्तेमाल नहीं पा रहे थे।
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अब नए सर्कुलर के जरिए PFRDA ने उस सख्ती को कम करते हुए मुख्य रूप से दो हालातों में सरेंडर की छूट दे दी है:
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह राहत ऑटोमेटिक नहीं मिलेगी। गंभीर बीमारी के मामलों में, बीमा कंपनी (Annuity Service Provider) सबसे पहले अपने नियमों और पॉलिसी फ्रेमवर्क के हिसाब से आवेदन की जांच करेगी और संतुष्ट होने के बाद ही सरेंडर को मंजूरी देगी।
किसी भी तरह के विवाद से बचने और पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए रखने के लिए PFRDA ने एक सिस्टेमैटिक स्ट्रक्चर तैयार किया है। इसके तहत बीमा कंपनियों को किसी भी एन्युटी को सरेंडर करने से पहले कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे:
जब सब्सक्राइबर अपनी लिखित मंजूरी दे देगा, उसके बाद ही सरेंडर की राशि को उसके बैंक खाते में ट्रांसफर किया जाएगा। इसके साथ ही, रेगुलेटर ने निर्देश दिया है कि बीमा कंपनियों को ऐसे हर सरेंडर केस की जानकारी 7 वर्किंग डेज (कार्य दिवसों) के भीतर सेंट्रल रिकॉर्डकीपिंग एजेंसी (CRA) को देनी होगी। ये सारे मामले PFRDA को भेजी जाने वाली मंथली कैंसिलेशन रिपोर्ट का भी हिस्सा होंगे।
भले ही रेगुलेटर ने नियमों में ढील देकर बुजुर्गों को एक इमरजेंसी एग्जिट ऑप्शन दे दिया है, लेकिन जानकारों का मानना है कि रिटायर्ड कर्मचारियों को एन्युटी सरेंडर करने से पहले इसके नफा-नुकसान को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। एन्युटी का मुख्य मकसद बुढ़ापे में जीवनभर एक निश्चित आय की गारंटी देना है। इसे समय से पहले बंद करने से दूरगामी आर्थिक सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, खासकर तब जब इलाज के बाद बचा हुआ पैसा जल्दी खत्म हो जाए।
इसके अलावा, सरेंडर करने पर कई तरह के चार्ज और टैक्स कटते हैं, जिससे मिलने वाली रकम मूल वैल्यू से काफी कम हो सकती है। यह बात भी साफ रहनी चाहिए कि यह छूट सिर्फ विशेष परिस्थितियों (गंभीर बीमारी और पुराने चुनिंदा कॉन्ट्रैक्ट) के लिए ही है, इसे NPS एन्युटी से सामान्य रूप से पैसे निकालने की सुविधा नहीं समझा जाना चाहिए। PFRDA ने स्पष्ट किया है कि पुराने सर्कुलर की बाकी सभी शर्तें पहले की तरह ही पूरी तरह लागू रहेंगी।