आपका पैसा

नए ई-कॉमर्स नियमों से बदल जाएगा ऑनलाइन शॉपिंग का पूरा तरीका, लेकिन आपके लिए क्या बदलेगा?

सरकार ने ऑनलाइन शॉपिंग में नकली डिस्काउंट, गुमराह करने वाले सर्च रिजल्ट, छिपे चार्ज और डार्क पैटर्न रोकने के लिए नए ई-कॉमर्स नियम बनाए हैं, जो 2027 से लागू होंगे

Published by
ऋषभ राज   
Last Updated- September 14, 2026 | 8:33 PM IST

ऑनलाइन शॉपिंग करते समय बड़ी छूट देखकर खुश होना आसान है, लेकिन अब यह सवाल पूछना भी जरूरी होगा कि यह छूट वाकई कितनी बड़ी है। जिस प्रोडक्ट पर ’60 परसेंट डिस्काउंट’ दिख रहा है, क्या उसकी कीमत पहले सच में इतनी थी? सर्च करने पर सबसे ऊपर वही प्रोडक्ट क्यों आता है, जो आपकी जरूरत से ज्यादा महंगा है? और जो सामान आपने खरीदा ही नहीं, उसकी कोई अतिरिक्त फीस आखिर आपके बिल में कैसे जुड़ गई?

इन सवालों से जुड़े नियम अब बदलने जा रहे हैं। सरकार ने ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए नए नियम जारी किए हैं, जिनका मकसद ऑनलाइन खरीदारी में पारदर्शिता बढ़ाना और ग्राहकों को गुमराह करने वाले तरीकों पर लगाम लगाना है। सरकार के मुताबिक, ये नए नियम 1 जनवरी 2027 से लागू होंगे। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि इन नियमों में क्या बदलाव किए गए हैं और इनका आम ग्राहक पर क्या असर पड़ेगा।

अब असली पुरानी कीमत भी दिखानी होगी

अब तक कई बार ऐसा होता था कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म किसी प्रोडक्ट की बहुत ज्यादा कीमत दिखाकर उस पर बड़ा डिस्काउंट बता देते थे। जरूरी नहीं था कि वह प्रोडक्ट हाल में कभी उस कीमत पर बिका भी हो।

नए नियमों के तहत अब जब किसी प्रोडक्ट की कीमत घटाई जाएगी, तो प्लेटफॉर्म को नई कीमत के साथ उसकी ‘पुरानी कीमत’ भी दिखानी होगी। PIB के मुताबिक, पुरानी कीमत का मतलब वह सबसे कम कीमत है, जिस पर वह प्रोडक्ट या सेवा पिछले 30 दिनों में बेची गई हो।

इससे ग्राहकों के लिए यह समझना आसान होगा कि उन्हें दिखाया जा रहा डिस्काउंट असली में कितना है और कहीं सिर्फ बड़ी छूट दिखाने के लिए कीमत तो नहीं बढ़ाई गई थी।

सर्च रिजल्ट के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकेंगे प्लेटफॉर्म

कई बार ऐसा होता है कि आप कोई प्रोडक्ट सर्च करते हैं, लेकिन सबसे ऊपर दिखने वाले नतीजे या तो ज्यादा महंगे होते हैं या फिर प्लेटफॉर्म की अपनी ब्रांडेड कंपनी के प्रोडक्ट होते हैं। नए नियमों में साफ किया गया है कि कोई भी ई-कॉमर्स कंपनी सर्च रिजल्ट में इस तरह बदलाव नहीं कर सकती, जिससे ग्राहक गुमराह हो या दिखाए गए नतीजों का उसकी खोज से संबंध कमजोर हो जाए।

इसका मतलब है कि सर्च रिजल्ट ग्राहक की जरूरत और उसकी खोज से जुड़े होने चाहिए, न कि सिर्फ किसी कंपनी के मुनाफे को ध्यान में रखकर तय किए जाने चाहिए।

Also Read: लोन चुकाने के बाद बैंक खो दे असली प्रॉपर्टी पेपर्स, तो तुरंत उठाएं ये कदम और पाएं हर्जाना

स्पॉन्सर्ड प्रोडक्ट पर साफ-साफ लिखा होगा ‘पेड’

ऑनलाइन शॉपिंग करते समय कई बार विज्ञापन बिल्कुल सामान्य सर्च रिजल्ट की तरह दिखाई देते हैं। ऐसे में ग्राहक के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कोई प्रोडक्ट उसकी सर्च से मेल खाने की वजह से दिख रहा है या किसी सेलर ने उसे ऊपर दिखाने के लिए पैसे दिए हैं।

PIB के मुताबिक, अब पेड या स्पॉन्सर्ड लिस्टिंग की जानकारी साफ और स्पष्ट रूप से देनी होगी। इससे ग्राहक आसानी से पहचान सकेंगे कि कौन सा प्रोडक्ट विज्ञापन के तौर पर दिखाया जा रहा है और कौन सा सामान्य सर्च रिजल्ट है।

गुमराह करने वाले डिजाइन पर अब कसेगा शिकंजा

ई-कॉमर्स कंपनियों को अब ‘गाइडलाइंस फॉर प्रिवेंशन एंड रेगुलेशन ऑफ डार्क पैटर्न्स, 2023’ का पालन करना होगा। इसके साथ ही कंपनियों को हर साल खुद अपना ऑडिट करना होगा और कंप्लायंस सर्टिफिकेट भी साफ तौर पर दिखाना होगा।

डार्क पैटर्न ऐसे डिजाइन तरीके होते हैं, जिनका इस्तेमाल करके ग्राहक को ऐसा फैसला लेने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसे वह अपनी मर्जी से शायद नहीं चुनता। 2023 की गाइडलाइंस में ऐसी कई प्रैक्टिस शामिल हैं। इनमें झूठी अर्जेंसी दिखाना, जैसे: ऑफर खत्म होने में सिर्फ 5 मिनट बाकी,
सिर्फ 2 आइटम बचे हैं, चेकआउट के दौरान बिना बताए कोई सामान जोड़ देना, जिसे ‘बास्केट स्नीकिंग’ कहा जाता है, कैंसिलेशन को मुश्किल बनाना, विज्ञापन को छिपाना और जरूरी जानकारी को दबा देना शामिल हैं।

नए नियमों में डार्क पैटर्न को लेकर कोई नई व्यवस्था नहीं बनाई गई है। इनमें 2023 में जारी की गई मौजूदा गाइडलाइंस का पालन करना अब ई-कॉमर्स रूल्स का हिस्सा बना दिया गया है। इन गाइडलाइंस में ग्राहक को जल्दबाजी में खरीदारी के लिए मजबूर करना, बिना बताए सामान कार्ट में जोड़ देना, कैंसिलेशन को मुश्किल बनाना, बार-बार किसी चीज के लिए कहना, विज्ञापन को सामान्य कंटेंट की तरह दिखाना और कीमत की पूरी जानकारी पहले न देना जैसी कई प्रैक्टिस शामिल हैं।

इसके अलावा सब्सक्रिप्शन ट्रैप, बेट एंड स्विच, ट्रिक क्वेश्चन, सास बिलिंग और रोग मालवेयर जैसे तरीके भी इसमें शामिल हैं।

ई-कॉमर्स शिकायतों पर बढ़ेगी जवाबदेही

अब जब भी कोई ग्राहक शिकायत दर्ज करेगा, तो ई-कॉमर्स कंपनी को उस शिकायत की एक कॉपी ग्राहक को देनी होगी। यह शिकायत ग्रीवांस ऑफिसर के पास रिकॉर्ड की गई होगी। इससे ग्राहक के पास इस बात का साफ रिकॉर्ड रहेगा कि उसने क्या शिकायत दर्ज की थी और कंपनी ने उसे आधिकारिक तौर पर कैसे दर्ज किया।

इसके अलावा, हर ई-कॉमर्स कंपनी को नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन (NCH) के कन्वर्जेंस प्रोसेस से भी जुड़ना होगा। इससे ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म राष्ट्रीय शिकायत निवारण व्यवस्था से सीधे जुड़ सकेंगे।

सरकार के मुताबिक, साल 2025 में NCH को कुल 17,71,622 शिकायतें मिलीं। इनमें से करीब 29 प्रतिशत यानी 5,11,196 शिकायतें ई-कॉमर्स से जुड़ी थीं। सरकार का कहना है कि शिकायतों की इस बड़ी संख्या को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।

Also Read: अचानक आई मेडिकल इमरजेंसी में क्यों डगमगा जाती है मध्यम वर्ग परिवारों की सालों की मेहनत की बचत?

प्रोडक्ट से लेकर इम्पोर्टर तक, हर जरूरी जानकारी देनी होगी

मार्केटप्लेस प्लेटफॉर्म को अब ग्राहकों को सही फैसला लेने में मदद करने वाली जरूरी जानकारियां देनी होंगी। इनमें बेस्ट-बिफोर या यूज-बिफोर डेट, रिटर्न और रिफंड की शर्तें, वारंटी, डिलीवरी और पेमेंट से जुड़ी जानकारी शामिल है।

इसके अलावा, मार्केटप्लेस ई-कॉमर्स कंपनियां ऐसी किसी सेवा के लिए बंडल्ड फीस नहीं ले सकेंगी, जिसका ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से सीधा संबंध नहीं है। हालांकि, लॉयल्टी या मेंबरशिप प्रोग्राम जैसे तय मामलों में यह लागू नहीं होगा। यानी अगर आपने 1,000 रुपये के जूते खरीदे हैं, तो प्लेटफॉर्म बिना बताए उसमें 50 रुपये ‘अकाउंट प्रोटेक्शन’ या किसी दूसरी सर्विस के नाम पर नहीं जोड़ सकता।

इम्पोर्टेड सामान के मामले में प्लेटफॉर्म को इम्पोर्टर का नाम और उससे जुड़ी जानकारी भी देनी होगी। साथ ही यह भी बताना होगा कि प्रोडक्ट किस देश से आया है।

ग्राहक के डेटा का इस्तेमाल अब मर्जी से नहीं होगा

PIB के मुताबिक, मार्केटप्लेस ई-कॉमर्स कंपनियां ग्राहक की जानकारी का इस्तेमाल किसी खास मकसद के लिए तब तक नहीं कर सकेंगी, जब तक ग्राहक ने इसके लिए ‘सहमति’ न दी हो।

यह नियम खास तौर पर तब अहम है, जब किसी ऑनलाइन मार्केटप्लेस या उससे जुड़े सेलर्स के पास ग्राहक की खरीदारी और ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़ा डेटा पहले से मौजूद हो। नए नियमों के तहत कंपनियां इस डेटा का कुछ कमर्शियल इस्तेमाल ग्राहक की सहमति के बिना नहीं कर सकेंगी। यानी ग्राहक की जानकारी का इस्तेमाल करने से पहले उसकी मंजूरी लेना जरूरी होगा।

First Published : September 14, 2026 | 3:24 PM IST