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ITR Filing 2026: फ्रीलांसिंग का कर रहे हैं काम तो रिटर्न भरते समय रखें ध्यान

फ्रीलांसर के लिए रिटर्न फॉर्म तो अलग होते ही हैं, छूट का दावा करने के लिए कई तरह के कागजी सबूत भी रखने पड़ते हैं। साथ ही आयकर नियमों का भी रखना पड़ता है पूरा ध्यान

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ऋषभ राज   
Last Updated- August 16, 2026 | 9:47 PM IST

कभी फ्रीलांसिंग को जेब-खर्च या नियमित कमाई से अलग कुछ पैसे कमाने का जरिया माना जाता था। मगर अब लाखों लोग इसे फुल-टाइम करियर के तौर पर अपना रहे हैं। आईटी कंसल्टेंट, ग्राफिक डिजाइनर सेलेकर कंटेंट राइटर और चार्टर्ड अकाउंटेंट तक बड़ी तादाद में फ्रीलांसर देश की अर्थव्यवस्था में योगदान कर रहे हैं। लेकिन जब कमाई पर कर चुकाने और आयकर रिटर्न दाखिल करने की बात आती है तो कई फ्रीलांसर्स के लिए यह काम कुछ मुश्किल हो जाता है।

कई बार फ्रीलांसर्स खुद को आम वेतनभोगी करदाताओं की तरह समझ लेते हैं। इसी वजह से वे गलत रिटर्न फॉर्म चुन लेते हैं या रिटर्न गलत तरीके से दाखिल कर देते हैं। नतीजे में उन्हें आयकर विभाग से नोटिस मिल सकता है। फ्रीलांसर्स के रिटर्न से जुड़े नियम, सही रिटर्न फॉर्म, कर में छूट और सामान्य रूप से होने वाली गलतियों को समझाने के लिए कर मामलों के विशेषज्ञों की राय पर नजर डालना जरूरी है।

फ्रीलांसर्स के लिए कौन सा रिटर्न फॉर्म है सही?

क्लियरटैक्स की कर विशेषज्ञ और चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) चांदनी आनंदन कहती हैं कि फ्रीलांसिंग से होने वाली कमाई को आयकर कानून के तहत ‘कारोबार या व्यवसाय से आय’ माना जाता है, न कि ‘अन्य स्रोतों’ से आय। इसलिए फ्रीलांसर्स के लिए सबसे पहला और सबसे जरूरी कदम सही रिटर्न फॉर्म का चुनाव करना होता है। उनके मुताबिक, फ्रीलांसर्स को मुख्य रूप से आईटीआर-3 और आईडीआर-4 के बीच चुनाव करना होता है।

आईटीआर-4 (सुगम)

यह फॉर्म उन निवासी फ्रीलांसर्स के लिए सबसे आसान विकल्प है, जो धारा 44एडीए के तहत ‘प्रिजम्पटिव टैक्सेशन स्कीम’ का फायदा लेना चाहते हैं। अगर आपकी कुल सालाना कमाई तय सीमा के अंदर है और ज्यादातर कमाई डिजिटल माध्यम से होती है तो आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें खर्चों का विस्तृत हिसाब रखने की जरूरत नहीं होती।

आईटीआर-3

अगर कोई फ्रीलांसर धारा 44एडीए के दायरे में नहीं आता, अपने वास्तविक खर्चों का पूरा हिसाब दिखाकर छूट लेना चाहता है, कारोबार में हुए नुकसान को आगे के सालों में कैरी-फॉरवर्ड करना चाहता है या उसके पास विदेश में संपत्ति और पूंजीगत लाभ जैसी मुश्किल जानकारी है, तो उसे आईटीआर-3 ही चुनना होगा।

टैक्सस्पैनर के मुख्य कार्य अधिकारी (सीईओ) और सह-संस्थापक सुधीर कौशिक का कहना है कि फ्रीलांसर्स को अपना रिटर्न नौकरीपेशा लोगों की तरह आईटीआर-1 में कभी नहीं भरना चाहिए। ऐसा करना सीधे तौर पर गलत फाइलिंग माना जाएगा।

धारा 44एडीए और कर

फ्रीलांसर्स के लिए आयकर अधिनियम की धारा 44एडीए काफी मददगार है। एसके पटोदिया ऐंड एसोसिएट्स एलएलपी में एसोसिएट डायरेक्टर (डायरेक्ट टैक्सेज) मिहिर तन्ना कहते हैं कि यह धारा खास तौर पर विधिक, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, वास्तुकला, लेखा, तकनीकी परामर्श और इंटीरियर डेकोरेशन जैसे पेशों पर लागू होती है। इसके तहत फ्रीलांसर्स अपनी कुल सकल कमाई का 50 फीसदी हिस्सा मुनाफा मानकर उस पर कर चुका सकते हैं। बाकी 50 फीसदी हिस्से को बिना किसी बिल या रसीद के कारोबार पर हुआ खर्च मान लिया जाता है।

कमाई की सीमा

कौशिक बताते हैं कि धारा 44एडीए का फायदा लेने के लिए आम तौर पर कुल सालाना कमाई की सीमा 50 लाख रुपये है। लेकिन डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इसमें बड़ी राहत दी है। अगर आपकी कुल कमाई में नकद लेनदेन 5 फीसदी या उससे कम है तो यह सीमा बढ़कर 75 लाख रुपये हो जाती है।

यह विकल्प घर से काम करने वाले आईटी कंसल्टेंट की तरह उन फ्रीलांसर्स के लिए काफी फायदेमंद है, जिनके वास्तविक खर्च बहुत कम होते हैं और जिनकी ज्यादातर कमाई बैंक खाते या यूपीआई के जरिये आती है।

धारा 44एडीए वाले भी रखें रिकॉर्ड?

चांदनी कहती हैं कि अक्सर फ्रीलांसर्स मान लेते हैं कि धारा 44एडीए चुनने के बाद उन्हें किसी भी तरह का रिकॉर्ड रखने की जरूरत नहीं है। इस धारा में भले ही विस्तृत ‘बुक्स ऑफ अकाउंट्स’ नहीं रखने होते मगर फ्रीलांसर को ‘पार्टी-वार बिक्री’ और मिले या किए गए भुगतान का बुनियादी रिकॉर्ड जरूर रखना चाहिए।

कौशिक के हिसाब से अगर किसी फ्रीलांसर का असली मुनाफा कुल कमाई के 50 फीसदी से कम है और वह 50 फीसदी से कम आय दिखाना चाहता है, तो नियम काफी सख्त हैं। अगर उसकी कुल आय छूट की मूल सीमा से अधिक है तो उसे पूरी ‘बुक्स ऑफ अकाउंट्स’ तैयार करनी होगी और धारा 44एबी के तहत कर ऑडिट भी कराना होगा।

किन खर्चों पर छूट नहीं?

चांदनी और तन्ना सलाह देते हैं कि व्यक्तिगत खर्चों, बिना बिल के दावों और किसी भी तरह के जुर्माने को कारोबारी खर्च में शामिल न करें। साथ ही लैपटॉप या फर्नीचर जैसी उन चीजों के पूरे खर्च पर छूट भी एक साथ नहीं मांग सकते, जिनका इस्तेमाल 12 महीने से ज्यादा समय तक होता है। इन पर सिर्फ मूल्यह्रास यानी डेप्रिसिएशन का दावा किया जा सकता है। 

लेकिन धारा 44एडीए चुनने वाले करदाता इन खर्चों पर छूट का दावा अलग से नहीं कर सकते क्योंकि 50 फीसदी छूट में ये सभी खर्च शामिल माने जाते हैं।

कौन-कौन से कागज रखें तैयार?

तीनों विशेषज्ञ मानते हैं कि फ्रीलांसर्स को रिटर्न भरने की अंतिम तारीख से काफी पहले ही सभी क्लाइंट के बिल, करार, बैंक स्टेटमेंट, फॉर्म 26एएस, एआईएस और टीआईएस स्टेटमेंट, टीडीएस सर्टिफिकेट (फॉर्म 16ए), खर्चों के बिल, पूंजीगत लाभ का ब्योरा, बैंक के ब्याज सर्टिफिकेट, जीएसटी रिटर्न और अग्रिम कर की रसीदें तैयार रख लेनी चाहिए।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि समय पर सही जानकारी के साथ रिटर्न दाखिल नहीं किया तो विलंब शुल्क, बकाया कर पर ब्याज, रिफंड में विलंब और नुकसान को आगे कैरी-फॉरवर्ड नहीं कर पाने जैसी दिक्कतों से जूझना पड़ सकता है। गलत जानकारी दी तो आयकर विभाग डिफेक्टिव रिटर्न या कर मांग का नोटिस भी भेज सकता है।

टीडीएस कटौती के अलग-अलग नियम

फ्रीलांसिंग में अक्सर कमाई के एक से ज्यादा रास्ते होते हैं। टैक्सस्पैनर के सीईओ सुधीर कौशिक के मुताबिक किसी फ्रीलांसर को पिछले वित्त वर्ष में 50 लाख रुपये से ज्यादा की कुल प्राप्ति हुई हो तो उसे वेंडरों या कंसल्टेंट्स को किए गए कुछ भुगतान पर टीडीएस भी काटना पड़ेगा। दूसरे माध्यमों से भी कमाई होने पर फ्रीलांसर को रिटर्न में इन्हें सही जगह दिखाना होगा।

1. फ्रीलांस आय: इसे कारोबार या व्यवसाय से लाभ की सूची में दर्ज करें

2. बैंक ब्याज और लाभांश: बचत खाते, एफडी के ब्याज और शेयर लाभांश को अन्य स्रोतों से आय की सूची में दिखाएं

3. शेयर और म्यूचुअल फंड: शेयर बाजार से या म्यूचुअल फंड बेचने से हुआ नफा-नुकसान पूंजीगत लाभ की सूची में
दर्ज करें

4. किराया या वेतन: अंशकालिक नौकरी से मिलने वाले वेतन या मकान से आने वाले किराये को सही सूची में दिखाएं

आईटीआर-3 में कौन-कौन से दावे?

कौशिक बताते हैं कि आईटीआर-3 चुनने पर फ्रीलांसिंग से कमाई के लिए किए गए सभी वास्तविक और जरूरी खर्चों पर कर छूट का दावा किया जा सकता है। सीए चांदनी आनंदन और मिहिर तन्ना बता रहे हैं कि किन खर्चों पर छूट का दावा किया जा सकता है:

1. डिजिटल और मार्केटिंग खर्च: गूगल/मेटा विज्ञापन, डिजिटल विज्ञापन, प्रिंट मीडिया और प्रचार पर हुआ खर्च।

2. सॉफ्टवेयर और टूल्स: काम के लिए इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर, सॉफ्टवेयर ऐज अ सर्विस टूल्स, डोमेन, होस्टिंग और कारोबार से जुड़े सबस्क्रिप्शन का खर्च।

3. वर्क फ्रॉम होम और दफ्तर का खर्च: को-वर्किंग स्पेस या दफ्तर का किराया, इंटरनेट और बिजली का बिल। घर से काम करने पर तय अनुपात में इन खर्चों का एक हिस्सा कारोबारी खर्च के तौर पर दावे में डाल सकते हैं।

4. परामर्श और यात्रा: सब-कॉन्ट्रैक्टर या कंसल्टेंट को दिया गया शुल्क, पेशेवर संगठनों का सदस्यता शुल्क और काम के सिलसिले में की गई यात्राओं का खर्च।

भूलकर भी न करें ये 7 बड़ी गलतियां

कौशिक और चांदनी की सलाह है कि फ्रीलांसर्स को रिटर्न जमा करने से पहले कागजी तैयारी एकदम पूरी रखनी चाहिए। उन्होंने 7 ऐसी आम गलतियां बताई हैं, जिनसे हर फ्रीलांसर को बचना चाहिए:

1. गलत रिटर्न फॉर्म भरना: फ्रीलांसिंग से आय को वेतन से आय मानकर आईटीआर-1 भर देना।

2. निजी खर्चे मिला देना: निजी और कारोबारी खर्चों तथा बैंक से हुए लेनदेन को आपस में मिला देना।

3. अग्रिम कर न देना: अगर टीडीएस कटने के बाद आपकी सालाना कर देनदारी 10,000 रुपये या उससे ज्यादा बनती है और आप समय पर अग्रिम कर नहीं भरते हैं तो धारा 234बी और 234सी के तहत ब्याज भरना पड़ सकता है।

4. एआईएस/टीआईएस की अनदेखी: आयकर विभाग के वार्षिक सूचना विवरण (एआईएस), टीआईएस और फॉर्म 26एएस में दिए आंकड़ों का अपने बैंक खातों से मिलान नहीं करना।

5. सबूत के लिए दस्तावेज न रखना: खर्चों के बिल या रसीदें संभालकर नहीं रखना।

6. आय गलत तरीके से दिखाना: फ्रीलांसिंग से हुई पूरी कमाई को अन्य स्रोतों से हुई आय की सूची में दिखाकर गलत दावा करना।

7. अंतिम तारीख से चूकना: तय तारीख के बाद रिटर्न फाइल करना।

First Published : August 16, 2026 | 9:47 PM IST