प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारतीय बैंकिंग तंत्र में बड़े आकार की जमा पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की तरफ से जारी नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक भारत की बैंकिंग प्रणाली में अब 5 करोड़ रुपये एवं उससे अधिक जमा रकम की हिस्सेदारी कुल सावधि जमा (टर्म डिपॉजिट) में एक तिहाई से अधिक हो गई है।
आरबीआई के वित्त वर्ष 2025-26 के सालाना मूल सांख्यिकीय विवरण (बीएसआर) से पता चला है कि मार्च 2026 के अंत तक कुल सावधि जमा में 1 करोड़ रुपये एवं उससे अधिक की जमा की हिस्सेदारी 46.3 फीसदी थी। भारी भरकम डिपॉजिट की हिस्सेदारी पिछले कुछ वर्षों से लगातार बढ़ रही है। मार्च 2025 के आखिर में ऐसी जमा रकम का हिस्सा 45.07 फीसदी हो गया। यह मार्च 2024 के अंत में 43.66 फीसदी थी। इस श्रेणी में बैंकिंग प्रणाली में मार्च 2026 के अंत तक कुल सावधि जमा में 34.8 फीसदी हिस्सेदारी अकेले 5 करोड़ रुपये एवं उससे अधिक की जमा रकम की थी।
संख्या के हिसाब से यह बड़ी जमा राशि कुल सावधि जमा खातों का मात्र 0.05 फीसदी थी। यानी कुछ बड़े जमाकर्ताओं के एक छोटे समूह का ही दबदबा रहा है। आंकड़ों से यह भी पता चला कि लगभग 38 फीसदी सावधि जमा 3 करोड़ रुपये और उससे अधिक के थे ( ये श्रेणियां खुदरा जमा से बाहर हैं जिसमें आम तौर पर 2 करोड़ रुपये तक की जमा राशि आती हैं)। इसके उलट मार्च 2026 के अंत तक कुल सावधि जमा में 5 लाख रुपये तक की सावधि जमा राशि की हिस्सेदारी केवल 17.8 फीसदी थी।
इन आंकड़ों पर निजी क्षेत्र के एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी ने कहा, ‘अधिक मूल्य वाली सावधि जमाओं में वृद्धि मुख्य रूप से ब्याज दर से जुड़े हालात और मूल्य निर्धारण पर निर्भर करती है। जब ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद दिखाई देती है तो निवेशक बॉन्ड की तुलना में बैंक जमा जैसे निश्चित आय वाले साधनों को प्राथमिकता देते हैं।
इसकी वजह यह है कि बॉन्ड पोर्टफोलियो को बढ़ती ब्याज दर के कारण मार्क-टु-मार्केट नुकसान का सामना करना पड़ता है।’ उन्होंने कहा कि बैंक 5 करोड़ रुपये से अधिक की जमा राशि पर शानदार ब्याज भी दे रहे हैं।
उन्होंने कहा,‘वर्तमान में सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट पर ब्याज दरें लगभग 7.5 से 7.75 फीसदी हैं जिस वजह से वे डेट म्युचुअल फंड या गिल्ट फंड के मुकाबले अधिक लुभावने लगते हैं। हालांकि, बैंक आम तौर पर बड़ी जमा राशि की तुलना में छोटी खुदरा जमा राशि को लेकर अधिक सहज महसूस करते हैं।’
यह बदलाव ऐसे समय में दिख रहा है जब बैंकों में खुदरा जमा के लिए काफी होड़ दिख रही है।
केयरएज रेटिंग्स के एसोसिएट डायरेक्टर सौरभ भालेराव ने कहा, ‘यह रुझान कॉरपोरेट या थोक जमा पर बैंकों की निर्भरता को उजागर करता है। कंपनियों ने नकदी प्रबंधन रणनीतियों के तहत बड़ी रकम बैंक सावधि जमा (एफडी) में जमा की होगी, साथ ही लिक्विड म्युचुअल फंडों में भी निवेश किए होंगे।
मार्च के दौरान कॉरपोरेट सर्टिफिकेट पर ब्याज दरें अधिक थीं। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण भी कंपनियों ने अपनी कुछ रकम इस खंड में झोंकी होंगी।
इसके अलावा, खुदरा जमा जुटाने में चुनौतियों के बीच कुछ बैंक 1 करोड़ रुपये और उससे अधिक की जमा राशि पर ऊंची ब्याज दर की पेशकश कर रहे हैं। इससे उनकी लागत बढ़ जाती है।’ मार्च 2026 के अंत तक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों में जमा में वृद्धि दर पिछले वर्ष के 10.6 फीसदी की तुलना में बढ़कर 11.5 फीसदी हो गई। जमा वृद्धि व्यापक रही जिसमें सभी समूहों में बैंक शाखाओं ने दोहरे अंक की वृद्धि दर्ज की।
आंकड़ों से पिछले पांच वर्षों में जमा की संरचना में आए बदलाव का भी संकेत मिलता है। कुल जमा में बचत खाता जमा का हिस्सा मार्च 2022 में 34.6 फीसदी से घट कर मार्च 2026 में 28.7 फीसदी हो गया।
इसके उलट, इसी अवधि में सावधि जमा का हिस्सा 55.2 फीसदी से बढ़कर 61.6 फीसदी हो गया जो इस बात का संकेत है कि जमाकर्ता अधिक ब्याज वाले निश्चित आय योजनाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं।
वित्त वर्ष 2026 के दौरान जमा रकम में हुई वृद्धि में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का अहम योगदान रहा। उन्होंने कुल जमा वृद्धि में 50.8 फीसदी योगदान दिया। निजी क्षेत्र के बैंकों की हिस्सेदारी इसमें 38.6 फीसदी रही। हालांकि, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की जमा जुटाने में हिस्सेदारी चार साल पूर्व के 3.2 फीसदी से घट कर मार्च 2026 में 2.9 फीसदी रह गई।
जमाओं की परिपक्वता अवधि में भी अहम बदलाव दिख रहा है। एक से तीन वर्ष की मूल परिपक्वता अवधि वाली सावधि जमा का हिस्सा मार्च 2022 में 50.4 फीसदी से बढ़कर मार्च 2026 में 69.8 फीसदी हो गया।
वहीं, एक वर्ष तक की परिपक्वता अवधि वाली जमा का अनुपात 16.7 फीसदी से घट कर 8.8 फीसदी रह गया। आंकड़ों से यह भी पता चला कि 7 फीसदी से कम ब्याज दर वाली सावधि जमा की हिस्सेदारी पिछले वर्ष के 27.3 फीसदी से बढ़कर मार्च 2026 में 61.8 फीसदी हो गई।
परिवारों द्वारा जमा की गई राशि लगातार सबसे बड़ा स्रोत रही है। मार्च 2026 के अंत तक कुल जमा में पारिवारिक बचत (डिपॉजिट) की हिस्सेदारी 59.3 फीसदी रही थी। हालांकि, हाल के वर्षों में उनकी हिस्सेदारी में कुछ कमी आई है।
गैर-वित्तीय क्षेत्र से जमा राशि एक वर्ष पूर्व के 17.7 फीसदी से बढ़ कर 18.5 फीसदी हो गई जबकि वित्तीय निगमों की हिस्सेदारी 6.8 फीसदी से बढ़कर 7.8 फीसदी हो गई। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक पिछले चार वित्त वर्षों में कुल जमा में वरिष्ठ नागरिकों की हिस्सेदारी लगभग स्थिर रही और मार्च 2026 में यह 20 फीसदी थी।