प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
ब्रिक्स देशों ने कृषि के क्षेत्र में अपना सहयोग बढ़ाने के लिए ब्रिक्स एग्रो-इनपुट्स, जेनेटिक रिसोर्सेज ऐंड इन्फॉर्मेशन नेटवर्क (ब्रिक्स एग्रिन) बनाने का प्रस्ताव रखा है। इससे सदस्य देशों के मध्य बीज, जर्मप्लाज्म और कृषि इनपुट के मामले में सहयोग मजबूत होगा। प्रस्तावित ब्रिक्स एग्रिन नेटवर्क सदस्य देशों के बीच जानकारी के आदान-प्रदान, क्षमता निर्माण और तकनीकी सहयोग को भी बढ़ावा देगा, जिससे कृषि जेनेटिक संसाधनों और इनपुट पर बेहतर तालमेल के लिए मंच मिल सकता है। इसे मुख्य शिखर सम्मेलन के घोषणा-पत्र में शामिल किए जाने की संभावना है।
इससे पहले सदस्य देशों ने कृषि से जुड़े जो प्रस्ताव तय किए हैं, उनके अनुसार ब्रिक्स देश कृषि के क्षेत्र में सहयोग को और बढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए वे एग्रो-इकॉलजी (कृषि-पारिस्थितिकी), डिजिटल खेती, कृषि इनपुट और बीज प्रणालियों में किसानों के अधिकारों जैसे कई कदम उठा रहे हैं।
अन्य मुख्य प्रस्तावों में कृषि-पारिस्थितिकी और रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर पर ब्रिक्स सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस का नेटवर्क बनाना शामिल है। इसका मकसद संयुक्त रिसर्च, ज्ञान के आदान-प्रदान और क्षमता निर्माण के लिए सहयोगी मंच तैयार करना है। यह नेटवर्क टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने के लिए कृषि-पारिस्थितिकी, प्राकृतिक खेती और रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर पर ध्यान केंद्रित करेगा। यह समूह खेती में नई तकनीकों के इस्तेमाल में सहयोग बढ़ाने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच डिजिटल कृषि पर एक नेटवर्क भी बनाएगा।
यह नेटवर्क आर्टिफिशल इंटेलिजेंस पर आधारित फैसले लेने में मदद करने वाले सिस्टम, जियोस्पेशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट ऑफ थिंग्स से चलने वाली मॉनिटरिंग और एडवांस्ड डेटा एनालिटिक्स पर ध्यान देगा।
इसका मकसद डिजिटल कृषि के समाधानों के इस्तेमाल को बढ़ाना और सदस्य देशों की उस क्षमता को मजबूत करना है, जिससे वे खेत के स्तर पर फैसले लेने और निगरानी के लिए टेक्नॉलजी का इस्तेमाल कर सकें। इन पहल के साथ-साथ ब्रिक्स देशों ने किसानों, पारंपरिक ज्ञान और बीज प्रणालियों से जुड़ी आम चुनौतियों से निपटने के लिए ‘बीज प्रणालियों में किसानों के अधिकारों पर एक ग्लोबल फोरम’ का प्रस्ताव रखा है।
यह फोरम बीज प्रणालियों से जुड़ी पारंपरिक खेती की जानकारी और तौर-तरीकों को दर्ज करने और उन्हें साझा करने को बढ़ावा देगा। साथ ही, यह किसानों के अधिकारों और पौधों की नई किस्में विकसित करने वालों के अधिकारों के बीच के तालमेल से जुड़े मुद्दों पर भी जोर देगा। यह मुद्दा इसलिए भी अहम हो गया है क्योंकि बीज प्रणालियों को मजबूत करने के साथ-साथ फ़सलों की किस्मों को बचाने और उन्हें विकसित करने में किसानों की पारंपरिक भूमिका को भी सुरक्षित रखने की कोशिशें की जा रही हैं।