भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी में वेस्टास

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 14, 2022 | 10:22 PM IST

डेनमार्क की विंड टर्बाइन निर्माता वेस्टास विंड सिस्टम्स की इकाई वेस्टास इंडिया यहां अपनी उपस्थिति बढ़ाने की संभावना तलाश रही है और उसने इस बाजार के लिए अनुकूल उत्पाद भी तैयार किए हैं। कंपनी ने हाल में भारत में लो-विंड साइटों के लिए अनुकूल नया विंड टर्बाइन जेनरेटर पेश किया है।
कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत करते हुए कहा कि वेस्टास के उत्पादों का इस्तेमाल आगामी निविदाओं के लिए किया जा सकता है, जो मुख्य तौर पर हाइब्रिड परियोजनाओं के लिए हैं। वेस्टास इंडिया के उपाध्यक्ष (बिक्री) विक्रम जाधव ने कहा, ‘सभी अच्छी साइटें समाप्त हो चुकी हैं और पुरानी साइटें को पुन: चालू करना अब पूरी तरह संभव नहीं है। इसलिए, पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आ रहीं नई साइटों में लो-प्रोफाइल की विंड है। हमारे द्वारा पेश टर्बाइन इसके लिए उपयुक्त हैं। दूसरा कारण यह है कि ज्यादातर नीलामियां हाइब्रिड परियोजनाओं के जरिये होती हैं। इसमें पूरे वर्ष, पूरे दिन के ऊर्जा उत्पादन का खास प्रोफाइल शामिल है। यह टर्बाइन लो विंड पॉकेटों को अच्छी तरह से पकड़ता है। इसलिए यह सभी के लिए बेहद अनुकूल है।’
इस उत्पाद को भारतीय तापमान और हवा की स्थिति को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, लेकिन इसमें दुनिया भर में वैश्विक लो-विंड साइटों को भी ध्यान में रखा गया है।
वेस्टास के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (उत्पाद प्रबंधन) थॉमस स्कैरिंसी ने कहा, ‘हम उत्पादों का स्थानीयकरण कर रहे हैं और इसे भारत में निवेश से समर्थन मिला है। एक फाउंडेशन के तौर पर भी हमारी भारत में अच्छी उपस्थिति है। हमारी फैक्टरियों, शोध डिजाइन केंद्रों ने इस उत्पाद को भारतीय बाजार में लाने में अहम योगदान दिया है।’
इसके साथ, कंपनी अपनी तीन इकाइयों – अहमदाबाद, चेन्नई और कोयंबटूर में रोजगार अवसरों में भी इजाफा दर्ज करेगी।
स्कैरिंसी ने कहा, ‘भारत में हमारे पास 2,600 कर्मचारी पहले से ही हैं और इस नए उत्पाद के साथ हम करीब 1,000 लोगों को जोड़ेंगे। अपने तीन संयंत्रों में, हम नए उत्पादों और वैश्विक तौर पर वेस्टास को समर्थन देने वाली अन्य गतिविधियों के लिए गतिविधि स्तर में इजाफा करेंगे।’
डेनमार्क की इस कंपनी की विस्तार योजनाएं ऐसे समय में चलाई जा रही हैं जब भारत ने पिछले वित्त वर्ष के दौरान अपनी सबसे कम पवन ऊर्जा क्षमता वृद्घि दर्ज की। भारत ने 2019-20 के दौरान 1,800 मेगावॉट की पवन ऊर्जा जोड़ी, जो उसके पिछले वर्ष के मुकाबले आधी थी। वर्ष 2017 में, केंद्र ने पवन ऊर्जा के ठेके देने के लिए 25 वर्ष पुरानी फीड-इन-टैरिफ (एफआईटी) व्यवस्था समाप्त की और प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया शुरू की थी।
क्षमता वृद्घि घटकर समान अवधि के दौरान 650 मेगावॉट के निचले स्तर पर रह गई। लेकिन दरें भी मौजूदा दरों से करीब 50 प्रतिशत तक घटकर 2.5 रुपये मेगावॉट रह गईं। एफआईटी व्यवस्था के तहत, विद्युत नियामक ने दरों को तय किया था।
इससे प्रमुख विंड टर्बाइन निर्माताओं और सुजलॉन एनर्जी और आईनॉक्स विंड जैसी प्रख्यात कंपनियों के पास बगैर बिके माल में इजाफा हुआ जिससे 2018-19 में लागत कटौती और कर्मचारी छंटनी को बढ़ावा मिला।
जाधव ने कहा, ‘हमने विंड सेगमेंट में अब तक आवंटित की गई 13 गीगावॉट (बोली प्रक्रिया व्यवस्था के तहत) में से करीब 600 मेगावॉट को हासिल किया है। हमने इनमें से ज्यादातर परियोजनाएं समय पर पूरी की हैं, खासकर उस समय को छोड़कर, जब ग्राहकों को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन यदि आप इस पूरे क्षेत्र पर विचार करें तो पता चलता है कि 13 गीगावॉट में से, 2 गीगावॉट से ज्यादा अब तक शुरू नहीं हुई है।’
जाधव ने कहा, ‘लोग अब कुछ ज्यादा सतर्कता बरतेंगे और बोली लगाने से पहले परियोजनाओं पर अच्छी तरह से सोच-विचार करेंगे। इसके अलावा, केंद्रीय एजेंसियों ने भी पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए चालू करने की अवधि 12-18 महीने से बढ़ाकर 24-30 महीने कर दी है।’

First Published : October 21, 2020 | 12:27 AM IST