दवा पर चौकस हुए अंकल सैम

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 10, 2022 | 1:35 AM IST

देश की जिन दवा कंपनियो की कमाई का एक तिहाई से अधिक हिस्सा अमेरिका से आता है, उन्हें अब अगले वित्त वर्ष में 20 फीसदी की विकास दर बनाए रखने के लिए यूएसएफडीए से अधिक प्रमाणन की जरूरत होगी।
उल्लेखनीय है कि रैनबैक्सी, डॉ. रेड्डीज, सन फार्मा, ग्लेनमार्क के साथ कुछ और दवा कंपनियों की कमाई का एक तिहाई से अधिक हिस्सा अमेरिका से आता है। यह नौबत ऐसे समय आई है, जब दुनिया का सबसे बड़े दवा बाजार अमेरिका इस समय आर्थिक मंदी से जूझ रहा है।
वहीं भारत की बड़ी दवा कंपनियों में शामिल रैनबैक्सी और ल्यूपिन नियमों के उल्लंघन के आरोप में यूएसएफडीए की जांच का सामना कर रही है। हाल में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, सन फार्मा, ग्लेनमार्क और डॉ रेड्डीज को अमेरिका में 20 फीसदी की विकास दर हासिल करने के लिए कम से कम 12-14 प्रमाणन की जरूरत होगी।
इस रिपोर्ट के मुताबिक, एफडीए की जांच का सामना कर रही रैनबैक्सी और ल्यूपिन के लिए 20 फीसदी की विकास दर हासिल करना मुश्किल ही है। उल्लेखनीय है कि देश की कई दवा कंपनियों की कुल कमाई का 20 से 30 फीसदी हिस्सा अमेरिका से आता है।
इस लिहाज से भारत के बाद अमेरिका इन कंपनियों के लिए दूसरा महत्वपूर्ण बाजार है। पिछले तीन साल से यहां कई प्रमुख दवा कंपनियां 20 फीसदी की दर से विकास कर रही थीं। मौजूदा वित्त वर्ष के नौ महीनों में तो इनकी औसत विकास दर 22 फीसदी की रही।
आईएमएस के अनुमान के मुताबिक, अगले पांच साल में जेनेरिक दवाओं की बिक्री बढ़कर 75 अरब डॉलर हो जाएगी। इस दौरान इनकी संयुक्त विकास दर 14-17 फीसदी रहने का अनुमान है। 

इंटरलिंक मार्केटिंग कंसल्टेंसी के प्रबंध निदंशक डॉ. आर बी स्मार्टा के अनुसार, अमेरिका में जेनेरिक दवाओं का भविष्य दवाओं के सही चयन, कम प्रतिस्पद्र्धा और अनूठी विपणन रणनीति पर निर्भर करेगा।
यूएसएफडीए सामान्यत: किसी दवा की पेटेंट अवधि पूरा होने के कुछ महीने पहले उसके लिए आवेदन स्वीकार करती है। अनुमान है कि 2009 के आखिर तक 100 से अधिक दवा कंपनियो की पेटेंट सुरक्षा खत्म हो जाएगी। इनमें ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन, फाइजर, नोवार्टिस और टैकेडा आदि शामिल हैं।
2008 अंत में कई महंगी दवाओं का पेटेंट अधिकार खत्म हो गया। इनमें मर्क ऐंड स्पेंसर की फोसामैक्स, फाइजर की कैम्प्टोसर और वेथ की इफेक्सर एक्सआर आदि हैं। भारतीय जेनेरिक दवा कंपनियां अमेरिका में कुल मार्केटिंग आवेदन के 40 फीसदी से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं।
केपीएमजी इंडिया के कार्यकारी निदेशक हितेश गजरिया ने बताया, ”जिन कंपनियों के पास अच्छे उत्पाद हैं, अमेरिकी बाजार में वे ही दावेदार हैं। वहीं यूरोप में इसका कारोबार निकट भविष्य में प्रभावित होने की उम्मीद नहीं है। कंपनी के कारोबार और इसका भविष्य चुने जाने वाले उत्पादों पर निर्भर करेगा।”
बढ़ता दबाव
रैनबैक्सी और ल्यूपिन जैसी कंपनियां कर रही हैं यूएसएफडीए की जांच का सामना 

अमेरिका देसी कंपनियों के लिए है अहम बाजार

First Published : February 18, 2009 | 11:11 PM IST