इस शुल्क से तो धुल जाएगा साबुन उद्योग

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 10, 2022 | 12:01 AM IST

पश्चिम बंगाल में 50 सदस्य कंपनियों वाले प्रमुख संगठन ‘स्मॉल स्केल डिटर्जेंट ऐंड सोप्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन’ (एसएसडीएसएमए) ने लिनियर अल्काइल बेंजीन (एलएबी) के आयात पर शुल्क थोपे जाने के प्रस्ताव के खिलाफ कड़ा विरोध जताया है।
संगठन का कहना है कि इस शुल्क की वजह से एलएबी की कीमतों में समान रूप से इजाफा होगा जिसकी डिटर्जेंट के निर्माण में लगभग 50-60 फीसदी की भागीदारी है। एसएसडीएसएमए के सचिव अरूप दास कहते हैं कि इस शुल्क को थोपे जाने से देश में चार एलएबी निर्माताओं के मुनाफे में 800 करोड़ रुपये का तो इजाफा हो जाएगा, लेकिन इससे डिटर्जेंट निर्माताओं को बड़ा नुकसान पहुंचेगा, क्योंकि इससे कीमतें बढ़ जाएंगी और निर्माताओं की बिक्री एवं मार्जिन पर दबाव पड़ेगा।
एलएबी आम लोगों द्वारा कपडा धोने के लिए उपयोग किए जाने वाले घरेलू डिटर्जेंट उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल किया जाने वाला कच्चा माल है। डिटर्जेंट उत्पादों के निर्माण में कच्चे माल पर आने वाली लागत में 50-60 फीसदी अकेले एलएबी पर खर्च किया जाता है। मौजूदा समय में देश के प्रमुख एलएबी निर्माताओं में रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, तमिलनाडु पेट्रो प्रोडक्ट्स और निरमा शामिल हैं।
हाल ही में सरकार ने यह महसूस किया था कि डिटर्जेंट के निर्माण में इस प्रमुख घटक का आयात बढ़ा है और इससे घरेलू एलएबी निर्माताओं को तगड़ा नुकसान पहुंच रहा है। इस पर विचार किया जा रहा है कि क्या घरेलू उद्योग को बचाए रखने के लिए आयात पर शुल्क लगाया जाना चाहिए। पहले साल के लिए 20 फीसदी, दूसरे साल में 15 फीसदी और तीसरे साल 10 फीसदी का शुल्क लगाए जाने की मांग की गई है।
ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ डिटर्जेंट मैन्युफैक्चरर्स (एआईएफडीएम) के अधिकारियों के मुताबिक इस तरह के सेफगार्ड टैरिफ यानी बचाव शुल्क से एलएबी की कीमतें 20 फीसदी तक बढ़ जाएंगी। डिटर्जेंट के लिए कच्चे माल की कीमतों में कम से कम 12 फीसदी का इजाफा हो जाएगा, क्योंकि डिटर्जेंट के निर्माण में एलएबी की भागीदारी 50-60 फीसदी की है।
इससे डिटर्जेंट उत्पादों की कीमतें बढ़ जाएंगी जिससे उपभोक्ताओं की जेब पर बुरा असर पड़ेगा। एआईएफडीएम के अधिकारियों ने कहा, ‘इस कदम से डिटर्जेंट की मांग पर भी प्रभाव पड़ेगा और देश में डिटर्जेंट के निर्माण में लगी कई छोटी एवं मझोली और केवीआईसी इकाइयां बंदी के कगार पर पहुंच सकती हैं।
डिटर्जेंट उद्योग में काम कर रहे 50,000 लोगों की तुलना में चार एलएबी निर्माता महज 500 लोगों की रोजी-रोटी का जरिया हैं। जहां इस तरह का शुल्क लगाए जाने से एलएबी उद्योग को मदद मिलेगी वहीं इससे छोटे और मझोली डिटर्जेंट निर्माता इकाइयां बुरी तरह से प्रभावित होंगी, क्योंकि कीमतें बढ़ जाएंगी और बिक्री एवं मार्जिन में कमी आएगी।’
देश में एलएबी निर्माण में लगी चार प्रमुख कंपनियों ने कहा है कि वे अपनी क्षमता के मुताबिक उत्पादन नहीं कर पा रही हैं जिससे वे बंदी के कगार पर पहुंच चुकी हैं।

First Published : February 5, 2009 | 1:35 PM IST