रेमडेसिविर की आपूर्ति बढ़ाने पर जोर

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 15, 2022 | 4:10 AM IST

कोविड मरीजों के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अहम दवाओं की कमी देखी जा रही है और ऐसे में केंद्र ने रेमडेसिविर जैसी दवाओं के उत्पादन को बढ़ाने के लिए दबाव बढ़ाया है। सूत्रों के मुताबिक जुलाई में रेमडेसिविर के 3.65 लाख खुराक की आपूर्ति होनी थी जबकि अगस्त में इसके निर्माताओं ने 8.15 लाख खुराक की आपूर्ति करने का वादा किया है।
रेमडेसिविर दवा के निर्मातों के साथ लाइसेंस समझौता कर भारतीय कंपनियां यह दवा बना रही हैं। यह दवा मूल रूप से इबोला के लिए तैयार की जा रही है और इसे कोविड-19 के लिए तैयार किया गया है और दवा का कोई विकल्प न होने की स्थिति में इसे मरीजों को दिया जा रहा है। सिप्ला, हेटेरो, जुबिलैंट लाइफसाइंसेज, माइलैन,  डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज, कैडिला हेल्थकेयर जैसी प्रमुख दवा कंपनियों ने यहां के साथ-साथ कुछ अन्य देशों में भी दवा बनाने और मार्केटिंग के लिए गिलियड के साथ करार किया है। अब तक हेटेरो, माइलैन और सिप्ला ने अपने-अपने ब्रांड के रेमडेसिविर की पेशकश की है जिनकी कीमत 4,000 रुपये प्रति शीशी से लेकर 5,400 रुपये प्रति शीशी तक है।
यह दवा अपने अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से 6-7 गुना पर बिक रही है क्योंकि इसकी कालाबाजारी की वजह से आपूर्ति कम हो गई। औषधि विभाग (डीओपी) ने इसको लेकर निर्माताओं के साथ बैठक की और उन्हें जल्द ही इस दवा का उत्पादन बढ़ाने को कहा है। उत्पादन की प्रक्रिया सरल नहीं है और इस दवा को बनाने के लिए करीब 14 सक्रिय दवा सामग्री का इस्तेमाल करने के साथ-साथ 20 से अधिक कई कदम शामिल हैं। इसकी वजह से निर्माण प्रक्रिया में काफी वक्त लगता है और यह महंगा भी हो जाता है।
दवा निर्माता भी इस दवा को थोक में बनाने से हिचकते हैं क्योंकि इसके लिए केवल तीन महीने तक की अनुमति दी गई है। नाम न बताने की शर्त पर एक दवा निर्माता ने कहा, ‘हम तेजी से आपूर्ति बढ़ा रहे हैं। हालांकि इस दवा को महामारी की वजह से दवा नियामक की तरफ से आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी मिली है लेकिन जब तक आगे का डेटा जमा नहीं किया जाता तब तक तीन महीने की अनुमति ही हमारे पास है। ऐसे में ज्यादा मात्रा में इस दवा को बनाने पर और भी जोखिम होगा।’
हालांकि सरकार ने दवा निर्माताओं के साथ कई बैठकें की हैं और यह कालाबाजारी की गतिविधियों पर शिकंजा कसने को लेकर कार्रवाई भी कर रही है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘यह दवा कई डॉक्टर धड़ल्ले से लिख रहे हैं। प्राइवेट अस्पतालों, नर्सिंग होम और डॉक्टरों के एक समूह ने इसे एक आकर्षक कारोबार के माध्यम के तौर पर देखना शुरू कर दिया है। कुछ अमीर लोग इसकी कमी की आशंका की वजह से इसे रख रहे हैं।’ उनका कहना है कि सरकार विभिन्न स्रोतों से डेटा एकत्र कर पता कर रही है कि किस वजह से मुनाफाखोरी शुरू हुई है। उनका कहना है, ‘अगर किसी चीज की मियाद महज तीन महीने है तो उसको रखने का क्या मतलब है?’
अधिकारी ने आगे बताया कि जुलाई में निर्धारित आपूर्ति 3.65 लाख खुराक है। उन्होंने कहा, ‘प्रत्येक मरीज को छह खुराक दी जाती है ऐसे में इसके जरिये 50,000 मरीजों को सेवाएं दी जा सकती है। क्या अभी आईसीयू में 50,000 लोग हैं?’ अधिकारी ने कहा  कि अगस्त में  निर्माताओं ने लगभग 8.15 लाख खुराक का वादा किया है और इसके जरिये बाजार में मांग का पर्याप्त ध्यान रखा जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जुलाई की आपूर्ति में जुबिलैंट के आंकड़े शामिल नहीं है क्योंकि इसे हाल ही में मंजूरी मिली है।
रेमडिसिविर की कीमतों में और कमी आने की उम्मीद है जबकि हेटेरो ने इसे 5,400 रुपये प्रति शीशी के हिसाब से लॉन्च किया था  वहीं सिप्ला ने इसे 4,000 रुपये प्रति शीशी के हिसाब से बाजार में उतारा।

First Published : July 28, 2020 | 11:18 PM IST