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समझदारी भरा है बजट, क्रियान्वयन पर दारोमदार
पार्थसारथि शोम /  March 19, 2015

आम बजट को बेहद समझदारी से तैयार किया गया है लेकिन यह कितना प्रभावी होगा, यह बात प्रावधानों के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। विस्तार से बता रहे हैं पार्थसारथि शोम

आम बजट को पेश हुए तकरीबन तीन सप्ताह हो चुके हैं और उसके प्रस्तावों की अच्छाइयों और बुराइयों पर काफी बहस हो चुकी है। इस बहस के बीच भी मुझे भी कुछ बातें कहने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
बजट से पहले की प्राथमिक चिंता यह थी कि कारोबारी फैसलों से जुड़े कराधान के अत्यधिक नकारात्मक पहलुओं को कैसे दूर किया जाए? ये वो पहलू हैं जिन्होंने घरेलू और विदेशी निवेशकों को देश से दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। कारोबारी जगत को दो दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें से पहली है जोखिम। निवेशकों के सामने जोखिम को लेकर दो तरह की धारणा होती है, या तो वह जोखिम से बचता है या जोखिम उठाता है। दूसरी दिक्कत है अनिश्चितता। निवेशक को अनिश्चितता का आकलन करने में वक्त लगता है क्योंकि उसे इसके निर्धारक तत्त्वों का पता नहीं होता। ऐसे में वह तय नहीं कर पाता है कि कोई संभावित निवेश उसके लिए लाभदायक है अथवा नहीं। वर्ष 2009-12 के दौरान कर कानूनों ने निवेश के माहौल को अनिश्चित बना दिया। यह अनिश्चितता केवल भविष्य से संबंधित नहीं थी बल्कि कानून उसे अतीत तक ले गए। इससे वैश्विक स्तर पर निवेश के लिए उपयुक्त स्थान के रूप में भारत की छवि को धक्का पहुंचा।
बजट ने इस अनिश्चितता से निपटने की कोशिश की। उसने जीएएआर को दो साल के लिए टाल दिया। लेकिन इससे तब तक कोई मदद नहीं मिलेगी जब तक कि कर अधिकारियों को इसे इस्तेमाल करने को लेकर गहन प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है।
दूसरी बात, वित्त मंत्री ने घोषणा की कि अप्रत्यक्ष हस्तांतरण के कराधान के मामले सीबीडीटी देखेगा और इसके लिए स्पष्टïीकरण वाला परिपत्र जारी किया जाएगा। यह भी स्वागतयोग्य है। बहरहाल, इस बारे में कुछ नहीं कहा गया कि आखिर क्यों उन्होंने इसके लिए प्राथमिक कानून की घोषणा नहीं की यह जानते हुए भी कि ऐसा परिपत्र केवल अप्रत्यक्ष हस्तांतरण से ही ताल्लुक रखेगा जबकि कानून के जरिये व्यापक अतीतगामी कराधान को रोका जा सकता था। फिर भी इससे अनिश्चितता दूर करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा 2012 में अप्रत्यक्ष हस्तांतरण के कराधान से संबंधित की समिति ने दो बातों पर चेतावनी दी थी। एक तो उसने कहा था कि भारत अभी भी पूंजी आयात करने वाला देश है, ऐसे में उसे संधि उल्लंघन से बचना चाहिए और दूसरा उसे पंजीकृत कंपनियों और शेयर बाजार में सूचीबद्घ कंपनियों के अप्रत्यक्ष हस्तांतरण पर कर लगाने से भी बचना चाहिए।
तीसरी बात, वित्त मंत्री ने कहा कि कर प्रशासन सुधार आयोग (टीएआरसी) की अनुशंसाओं को इस वर्ष लागू किया जाएगा। यह भी स्वागतयोग्य कदम है। टीएआरसी का जोर है कि जवाबदेही सुनिश्चित की जाए जबकि देश के कर विवादों की संख्या को देखकर लगता नहीं कि ऐसा किया जाता है। ऐसे में अगर भारत का कुल आंकड़ा शेष विश्व के आंकड़े को पार भी कर जाए तो भी कोई अचरज की बात नहीं। वित्त मंत्री ने जिस विवाद विधेयक की बात कही है वह भी स्वागतयोग्य है लेकिन विस्तृत जानकारी की प्रतीक्षा है।
चौथी बात, जीएसटी को 2016 में लागू करने की घोषणा के बाद अब वक्त आ गया है कि किसी भी प्रस्तावित ढांचे पर सभी अंशधारकों के साथ चर्चा की जाए और जीएसटी को केवल सरकार के स्तर पर केंद्र-राज्य चर्चा के आधार पर पेश करने से बचा जाए। सरकारें जीएसटी पर करदाताओं के साथ चर्चा करती हैं और भारत सरकार को भी ऐसा करना चाहिए। अप्रत्यक्ष कर का मौजूदा ढांचा केवल तभी काम करेगा जब जीएसटी के जरिये निवेश और कारोबार को आसान बनाया जाए। अब तक जीएसटी के ढांचे तक पर कोई श्वेत पत्र नहीं आया है उन गहन तकनीकी पहलुओं की बात तो छोड़ ही दी जाए जो करदाताओं और केंद्रीय और कर प्रशासन से ताल्लुक रखते हैं।
पांचवीं, वित्त मंत्री द्वारा यह भी कहा गया है कि सरकार निगम कर को चरणबद्घ तरीके से कम करने जा रही है। यह सही दिशा में उठाया गया एक साहसी कदम है।
छठा, समृद्घि पर लगने वाले कर करने का विचार अच्छा था क्योंकि इससे शायद ही कोई राजस्व आता हो लेकिन भारत जैसे गरीब देश में यह सवाल उठता है कि क्या वाकई सरकार को इस कर को पूरी तरह समाप्त कर देना चाहिए या उसे इसे नए सिरे से तैयार करना चाहिए जिसमें दरें कम हों लेकिन इसका आधार प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) 2013 की तरह बढ़ा हुआ हो।
सातवीं बात, वित्त मंत्री ने कहा कि डीटीसी को इसलिए नहीं लागू किया जा रहा है क्योंकि उसके प्रस्तावों को पहले ही आयकर अधिनियम में शामिल कर लिया गया है। यह कदम सही नहीं है। वित्त मंत्री को इस बात पर पुनर्विचार करते हुए डीटीसी 2013 का पुनर्परीक्षण करना चाहिए। कर विशेषज्ञों से भी इस पर विचार कराया जाना चाहिए।
आठवां, कर राजस्व को भूमिगत अर्थव्यवस्था के कारण भी नुकसान पहुंचा है। बजट में कालेधन पर नियंत्रण की जो बात कही गई वह किसी भी भारत सरकार द्वारा की गई सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। देखना है कि सरकार इस दिशा में कितना आगे बढऩा चाहती है। अगर ऐसा हुआ तो कर राजस्व में बढ़ोतरी होगी और कर प्रशासन लोगों के साथ अधिक सहज होगा। यहां पर स्वैच्छिक अनुपालन सुनिश्चित करना अहम होगा।
नौवीं बात, सरकार ने पर्यावरण की हालत में आ रही गिरावट को कम करने की दिशा में एक छोटा प्रयास करते हुए कोयले पर लगने वाले स्वच्छ ऊर्जा उपकर को 100 रुपये प्रति टन से बढ़ाकर 200 रुपये कर दिया। यह अच्छी बात है लेकिन अपर्याप्त है। कारों की बढ़ती संख्या देखते हुए लगता है कि कार्बन कर को और अधिक व्यापक बनाना होगा। यह जरूरी है।
दसवीं बात, मैं तीन ऐसी बातों पर जोर देना चाहूंगा जो इस बजट में अहम हैं। पहला, निवेश, खासतौर पर बुनियादी निवेश को लेकर कर प्रोत्साहन पर ध्यान केंद्रित करना अच्छा है क्योंकि वहां बड़ा अंतर मौजूद है। दूसरा, ऐसे वक्त में राजकोषीय घाटे की प्राप्ति के लक्ष्य को एक साल आगे बढ़ाना समझदारी भरी बात है जब विकास अर्थव्यवस्था की सबसे अहम जरूरत हो। तीसरा, सरकार ने व्यय सब्सिडी को एकदम गरीब लोगों तक पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित किया है।
सरकार ने अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं और समग्रता में देखा जाए तो बजट में गंभीरता झलकती है। अब सारा दारोमदार इस बात पर निर्भर है कि घोषणाओं का क्रियान्वयन किस प्रकार किया जाता है।

Keyword: General budget, Arun jaitley, Finance minister,
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