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एजेंसी कमीशन कर कटौती योग्य नहीं है
बीएस संवाददाता /  March 15, 2015

उच्चतम न्यायालय ने बीते सप्ताह दिए फैसले में कहा कि एल्कोहल युक्त पेय पदार्थों के विनिर्माता शराब की आपूर्ति के ऑर्डर की खरीद के लिए अपने कमीशन एजेंटों से पाबंदी का लाभ पाने के हकदार नहीं हैं। केरल उच्च न्यायालय ने आयकर अधिनियम के अंतर्गत किए गए दावे को खारिज कर दिया था और उच्चतम न्यायालय ने प्रीमियर ब्रुअरीज लि. बनाम सीआईटी, कोच्चि के मामले में दिए गए उस फैसले को बरकरार रखा है। केरल और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने विपणन निगमों की स्थापना की है, जो विशेष रूप से शराब के थोक विक्रेता हैं और सभी विनिर्माताओं को उन्हें अपने उत्पाद बेचने पड़ते हैं। उसके बाद निगम रिटेलरों को शराब की बिक्री किया करते थे। विनिर्माताओं ने इसकी वकालत करते हुए कहा कि उन्हें रिटेलरों और निगमों के साथ समन्वय कायम करने के लिए एजेंटों को जोडऩा पड़ता है, जिससे उपभोक्ताओं को शराब की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इसके बाद उन्हें अधिनियम की धारा 37 के अंतर्गत लाभ का दावा करना पड़ता है। राजस्व अधिकारियों ने दावा खारिज कर दिया और शीर्ष अदालत ने इस पर अपनी मुहर लगा दी।

पे ऑर्डर बाउंस नहीं हो सकता
यदि एक बैंक किसी अन्य बैंक के पे ऑर्डर पर भुगतान रोक देता है तो तीसरा पक्ष जो एक खाताधारक है, निगोशिएबिल इंस्ट्रुमेंट्स अधिनियम के अंतर्गत चेक का भुगतान नहीं करने के लिए शिकायत दर्ज नहीं कर सकता। उच्चतम न्यायालय ने आईएनजी वैश्य बैंक बनाम बैंक ऑफ राजस्थान मामले में दिए फैसले में ऐसा कहा। इस मामले में आईएनजी ने सिटी बैंक, न्यूयॉर्क के नाम पर खाताधारक जया एंटरप्राइजेज के लिए एक पे ऑर्डर जारी किया था। बाद में सिटी से एक संदेश मिलने के बाद आईएनजी ने भुगतान रोक दिया। तब खाताधारक ने आईएनजी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। न्यायाधीश ने इसका संज्ञान लिया। बैंक राजस्थान उच्च न्यायालय में चला गया, जहां उसकी याचिका खारिज हो गई। उच्चतम न्यायालय ने यह कहकर निचली अदालतों के फैसलों को खारिज कर दिया कि आईएनजी और खाताधारक के बीच कोई लेनदेन नहीं हुआ था। शीर्ष अदालत ने कहा कि बैंक को आपराधिक अदालत में खींचना 'स्पष्ट रूप से अदालती शक्ति प्रक्रिया का दुरुपयोग है।'

मुआवजे की गलत गणना
उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर से सड़क हादसों में पीडि़तों के नुकसान के आकलन में मोटर वाहन हादसा न्यायाधिकरणों और उच्च न्यायालयों को गलत माना। जाकिर हुसैन बनाम साबिर मामले में वाहन चालक साबिर ने एक दुर्घटना में अपना दायां हाथ गंवा दिया और चिकित्सकीय प्रमाण जाहिर करते हैं कि इससे उसकी कमाई की क्षमता में 55 फीसदी की कमी आ गई थी। हालांकि न्यायाधिकरण ने महज 4.38 लाख रुपये के मुआवजे की व्यवस्था की। उच्चतम न्यायालय ने नुकसान की फिर से गणना की और बीमा कंपनी से पीडि़त को 17.60 लाख रुपये का भुगतान करने के लिए कहा। कहा गया कि न्यूनतम वेतन हमेशा जरूरी नहीं होता और ड्राइविंग एक विशेष कौशल वाला काम है। अदालत ने भविष्य की आय के लिए 8.64 लाख रुपये और 2 लाख रुपये चिकित्सकीय खर्च व भविष्य के चिकित्सकीय खर्च के लिए अन्य 2 लाख रुपये तय किए। बीमा कंपनी को छह साल के लिए 9 फीसदी ब्याज का भुगतान भी करना होगा। न्यू इंडिया इंश्योरेंस बनाम सुकांता कुमार के एक अन्य मामले में न्यायाधिकरण ने एक दुर्घटना में भिलाई संयंत्र के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी को स्थायी अपंगता के लिए 4 लाख रुपये दिए जाने का फैसला सुनाया। उड़ीसा उच्च न्यायालय ने इस रकम को 55 लाख रुपये तक बढ़ा दिया, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस धनराशि को घटाकर 35 लाख रुपये कर दिया क्योंकि उच्च न्यायालय ने यह आदेश 'बिना विचार-विमर्श और गणना' के दिया।

खनन पट्टों में और गोलमाल
कर्नाटक सरकार और उसके खनन निदेशक द्वारा बेल्लारी जिले में वन अधिनियम और खनिज रियायत नियमों का उल्लंघन करते हुए डालमिया सीमेंट लिमिटेड से अन्य खनन कंपनी को बड़ी खनन भूमि के हस्तांतरण पर पिछले सप्ताह उच्चतम न्यायालय ने उंगली उठाई। मुनीर एंटरप्राइजेज बनाम रामगढ़ मिनरल्स ऐंड माइनिंग लिमिटेड के मामले उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए न्यायालय ने कहा, 'राष्ट्रीय संपदा के वितरण में नियमों का कड़ाई से पालन होना चाहिए और राज्य एवं उसके प्रशासन का कार्य निंदा करने योग्य है और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करता है।' शीर्ष अदालत ने कहा कि निदेशक ने डालमिया सीमेंट द्वारा छोड़ी गई जमीन के रामगढ़ कंपनी को हस्तांतरण की मंजूरी देकर वन अधिनियम के उल्लंघनों को छिपाया है। 100 पृष्ठ के फैसले में प्रतिस्पर्धी खनिकों के बीच जटिल सौदों का जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है, 'रामगढ़ मिनरल्स के पक्ष में आदेश जारी करते समय यू-टर्न लेने में सरकार ने ईमानदारी नहीं बरती।' उच्च न्यायालय के आदेश को पलटते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि केंद्रीय कानूनों का पालन किए बिना जारी किया जाने वाला पट्टा या इसका नवीनीकरण अवैध होगा।

आदेश न रोके मध्यस्थता को
अगर मध्यस्थता समझौता का विकल्प है तो दीवानी अदालत को नागरिक प्रक्रिया संहिता का हवाला देते हुए दोनों पक्षों के बीच विवाद में हस्तक्षेप और आदेश जारी नहीं करने चाहिए। सुंदरम फाइनैंस लिमिटेड बनाम टी थांकाम मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि मध्यस्थता और समझौता अधिनियम की धारा 8 के मुताबिक विवाद में मध्यस्ता अनिवार्य है। इस मामले में एक महिला ने ऋण लेकर कार खरीदी। विवाद पैदा होने पर वह वाहन को जब्त करने पर फाइनैंस कंपनी के खिलाफ आदेश जारी करवाने को लेकर दीवानी अदालत पहुंची। इस पर न्यायालय ने यह आदेश जारी किया। कंपनी निचली अदालत का फैसला पलटवाने के लिए केरल उच्च न्यायालय गई। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आदेश के लिए याचिका को मुख्य विवाद से अलग किया जा सकता है और अधिनियम दीवानी अदालत को आदेश जारी करने से नहीं रोक सकता। फाइनैंस कंपनी उच्चतम न्यायालय पहुंच गई। न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि मध्यस्थता अधिनियम एक विशेष कानून है, जो सामान्य दीवानी कानून से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और धारा 8 का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए न्यायालय ने कहा, 'अन्यथा यह विवादों के निपटाने में देरी करेगा और मामलों के हल को जटिल बनाएगा और निस्संदेह न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या बढ़ाएगा।'

 क्षेत्राधिकार पर विवाद
पिछले सप्ताह उच्चतम न्यायालय ने हारमनी इनोवेशन शिपिंग लिटिमेड की केरल उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील खारिज कर दी। केरल उच्च न्यायालय ने यह फैसला हारमनी इनोवेशन शिपिंग के गुप्ता कोल इंडिया लिमिटेड के साथ विवाद में दिया था। मसला यह था कि क्या यह विवाद भारतीय न्यायालयों के क्षेत्राधिकार में आता है, क्योंकि माल इंडोनेशिया से भारत भेजा गया था और वाद का स्थान लंदन तय किया गया था। केरल की जिला अदालत ने गुप्ता कोल को निर्देश दिया कि वह 6.60 करोड़ रुपये की सिक्योरिटी देकर माल को कुर्क कर ले। अपील पर उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसलों को पलट दिया। वहीं शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा।

Keyword: Law, Supreme court, decision,
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