बिजनेस स?टैंडर?ड - घोषणाओं पर अमल से ही तय होगा बजट का स्वरूप
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घोषणाओं पर अमल से ही तय होगा बजट का स्वरूप
शंकर आचार्य /  March 15, 2015

आम बजट को औसत से बेहतर करार दिया जा सकता है लेकिन इसका असल आकलन तो क्रियान्वयन पर ही निर्भर करता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं शंकर आचार्य
गत 28 फरवरी को मैं एक टेलीविजन स्टूडियो में बैठा वित्त मंत्री अरुण जेटली का बजट भाषण सुन रहा था और विशेषज्ञों के पैनल के साथ बजट घोषणाओं पर त्वरित टिप्पणी पेश कर रहा था। मेरे साथ मौजूद अधिकांश लोगों ने बजट को शानदार बताया लेकिन मैं उसे बमुश्किल औसत से बेहतर ही करार दे सका। तकरीबन दो सप्ताह बाद अब जो टिप्पणियां आ रही हैं उनको देखकर यही लग रहा है कि बजट को लेकर शुरुआती उल्लास कम हो चला है और मेरा शुरुआती आकलन कमोबेश सही साबित हो रहा है। बहरहाल मैं बजट आकलन के दौरान अतिउत्साह से क्यों बचा उसकी वजह इस प्रकार है:
समग्र नीतिगत कदम
वर्ष 2015-16 के दौरान राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.6 फीसदी के करीब लाने की पुरानी प्रतिबद्धता के बावजूद वित्तमंत्री ने इस लक्ष्य में थोड़ी गुंजाइश रखी और वर्ष 2014-15 के 4.1 फीसदी के लक्ष्य के मुकाबले वर्ष 2015-16 के लिए 3.9 फीसदी का लक्ष्य तय किया। क्या वह इससे बेहतर कदम नहीं उठा सकते थे? यकीनन वे कर राजस्व बढ़ाकर ऐसा कर सकते थे। वह सामान्य सेनवैट की दर को बढ़ाकर 13 फीसदी कर सकते थे और कच्चे तेल पर सीमा शुल्क के 5 फीसदी के पुराने स्तर को बहाल कर सकते थे। इसके अलावा वित्त आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वे राज्यों को दी जाने वाली केंद्रीय सहायता को और कम कर सकते थे।
इतना ही नहीं उनको मौजूदा और भविष्य के आर्थिक और राजकोषीय परिदृश्य के मद्देनजर घाटे के लक्ष्य में और कमी करनी चाहिए थी। वित्त मंत्री ने लक्ष्य को शिथिल करने की दो वजहें बताईं, पहला वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के क्रियान्वयन में देरी और सातवें वित्त आयोग की वजह से राजकोष पर पडऩे वाला बोझ। लेकिन गौरतलब है कि इसका बोझ वर्ष 2016-17 में पड़ेगा न कि अगले वर्ष। हालांकि इन बातों के मद्देनजर सरकार को कोशिश करनी चाहिए थी कि वह इस वर्ष घाटे के लक्ष्य को कम करते जबकि आने वाले सालों में इसमें रियायत की जा सकती थी।
व्यय नीतियां
14वें वित्त आयोग की सिफारिशों में केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाने की जो अनुशंसा की गई है उसे देखते हुए बजट में बेहतर तरीके से कदम उठाए गए हैं। बुनियादी ढांचागत क्षेत्र के लिए आर्थिक सहायता बढ़ाई गई है। खासतौर पर सड़क और रेल के लिए 70,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषण की गई है और यह भी अच्छा कदम है। हालांकि कुल पूंजीगत खर्च में जीडीपी के संदर्भ में महज 0.2 फीसदी का इजाफा किया गया। यह पिछले बजट के 1.5 फीसदी से बढ़कर 1.7 फीसदी हो गया।
वहीं दूसरी ओर राजस्व खर्च की बात करें तो वह जीडीपी के संदर्भों में 0.9 फीसदी घटा और 11.8 फीसदी से घटकर 10.9 फीसदी हो गया। इसके पीछे दो वजहें थीं: राज्यों को योजना खर्च के लिए किए जाने वाले हस्तांतरण में कमी और प्रमुख केंद्रीय सब्सिडी में 0.4 फीसदी की कटौती। हालांकि सब्सिडी में कमी का संबंध नीतिगत सुधारों से नहीं बल्कि अंतरराष्टï्रीय बाजार में तेल कीमतों में आई कमी से है। वित्त मंत्री ने अपने भाषण में जाम (जन धन योजना, आधार और मोबाइल) के जरिये सब्सिडी कार्यक्रमों की लीकेज कम करने की बात कही थी लेकिन इस व्यवस्था को मौजूदा खाद्य, उर्वरक और केरोसिन सब्सिडी में लागू करने का कोई उल्लेख नहीं नजर आया। न ही शांता कुमार समिति द्वारा खाद्यान्न खरीद, भंडारण और वितरण के पुनर्गठन संबंधी अनुशंसा का कोई जिक्र देखने को मिला। व्यय आयोग की अंतरिम रिपोर्ट का भी जिक्र नहीं आया जबकि ये दोनों प्रमुख सब्सिडी में प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण के लाभ की बात करती हैं। क्या प्रमुख सुधारों के मोर्चे पर यह धीमापन दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुई जबरदस्त पराजय की वजह से है?
राजस्व नीतियां
गत माह मैंने इस समाचार पत्र में ही कहा था कि जीडीपी के अनुपात में केंद्र का सकल कर राजस्व बढ़ाना अहम है। यह अनुपात वर्ष 2007-08 के 12 फीसदी के उच्चतम स्तर से घटकर वर्ष 2014-15 में 10 फीसदी से नीचे आ गया। बजट में इसे बढ़ाकर 10.3 फीसदी करने का लक्ष्य उल्लिखित है जो स्वागतयोग्य है। सकल कर राजस्व में 16 फीसदी की बढ़ोतरी का जो अनुमान जताया गया है खासतौर पर आय कर राजस्व में 18 फीसदी वृद्घि का अनुमान वह कुछ ज्यादा ही आशावादी प्रतीत होता है। जेटली ने जीएसटी को अप्रैल 2016 तक लागू करने का लक्ष्य रखा है जो वास्तव में सराहनीय है। लेकिन बाकी चुनौतियां अभी शेष हैं। मिसाल के तौर पर संविधान संशोधन विधेयक को दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से पारित कराना और कम से कम आधी राज्य विधानसभाओं की मंजूरी। बजट में निगम कर को अगले चार साल में 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी करने का वादा भी किया गया है। हालांकि चरणबद्घ कमी की यह घोषणा तब और अधिक विश्वसनीय और प्रभावी हो जाती यदि आने वाले साल में कर दर में वास्तव में कुछ कमी की जाती। लेकिन इसके बजाय अधिभार को 10 फीसदी से बढ़ाकर 12 फीसदी कर दिया गया। गैर कर राजस्व की बात करें तो वर्ष 2015-16 का बजट व्यापक तौर पर स्पेक्ट्रम नीलामी से होने वाली प्राप्तियों (करीब 40,000 करोड़ रुपये) और विनिवेश (करीब 70,000 करोड़ रुपये) पर निर्भर है। स्पेक्ट्रम से होने वाली नीलामी हर साल तो नहीं हासिल होने वाली जबकि दूसरी प्राप्ति यानी विनिवेश के मामले में हम लक्ष्य हासिल करने से चूकते रहे हैं। ऐसे में अगले साल और उसके बाद राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर खरा उतर पाना मुश्किल लगता है।
व्यापक नीतिगत पहल
अरुण जेटली ने पहली बार पूरे साल के लिए बजट पेश किया है और यह व्यापक नीतिगत घोषणाओं से परिपूर्ण है। इसमें समाज के गरीब तबके के लिए बीमा और सामाजिक सुरक्षा योजना की बात कही गई है। इसके अलावा सोने के नकदीकरण की योजना, बुनियादी निवेश को बढ़ावा देने के उपाय, काले धन के विरुद्घ नया कानून और आर्थिक और वित्तीय गतिविधियों के लिए नीतिगत ढांचा मजबूत बनाने और कारोबारी माहौल को सहज बनाने जैसी घोषणाएं शामिल हैं।
विधायी मोर्चे पर बात करें तेा अंतिम श्रेणी में नया दिवालिया कानून, सरकारी खरीद संबंधी नया कानून, सार्वजनिक अनुबंधों के विवाद निस्तारण के लिए नया कानून, वायदा बाजार आयोग को भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड में विलय करना, विभिन्न बुनियादी क्षेत्रों में सामंजस्य के लिए नया नियामकीय सुधार कानून, नई वित्त संहिता और आरबीआई अधिनियम में संशोधन के जरिये नई मौद्रिक नीति समिति बनाकर नए मौद्रिक नीति ढांचा समझौते को क्रियान्वित करना आदि शामिल हैं।
इनमें से तमाम विधायी पहल सैद्घांतिक तौर पर सराहनीय हैं, हालांकि इस पर कोई अंतिम निर्णय तब तक नहीं दिया जा सकता है जब तक कि मसौदा देखने को नहीं मिल जाता। उदाहरण के लिए काले धन के विरुद्घ प्रस्तावित विधेयक यकीनन कठोर प्रतीत होता है और इसके साथ यह जोखिम जुड़ा है कि प्रवर्तन एजेंसियां मनमाना व्यवहार कर सकती हैं। यह सीमा पार के वित्तीय और कारोबारी लेनदेन को भी हतोत्साहित कर सकता है। कुलमिलाकर देखा जाए तो यह बजट औसत से बेहतर है। कितना बेहतर है, यह बात बजट घोषणाओं के क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।

Keyword: General budget, Arun jaitley, Finance minister,
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