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नवकलेवर के लिए नए तेवर
जयजित दास और दिलीप सत्पथी /  March 13, 2015

हिंदुओं के लिए धार्मिक रूप से बेहद अहम शहर पुरी में 1996 के बाद पहली बार इस साल नवकलेवर उत्सव आयोजित होने जा रहा है। इसकी तैयारी के लिए शहर में कई बदलाव दिख रहे हैं। उसकी प्रक्रिया, तैयारी और माहात्म्य से रूबरू करा रहे हैं जयजित दास और दिलीप सत्पथी

हिंदू धर्म के चार प्रमुख धामों में से पुरी भी एक है। यहां जुलाई के दौरान करीब 50 लाख श्रद्घालु डेरा डालेंगे। कहा जाता है कि एक हिंदू को अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार तो पुरी जरूर आना चाहिए। श्रद्घालु जुलाई के दौरान पुरी में आयोजित होने वाले नवकलेवर त्योहार का हिस्सा बनने के लिए यहां जुटेंगे। इस त्योहार में करोड़ों भक्तों के पूजनीय भगवान जगन्नाथ नया रूप लेते हैं, जो पुनर्जन्म के सिद्घांत यानी मृत्यु व जीवन के चक्र का प्रतीक हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार पुरी की आबादी 5 लाख से भी कम है, लेकिन माना जा रहा है कि यह त्योहार ओडिशा के इस तटीय शहर का रंग-रूप बदल देगा। शहर भी श्रद्घालुओं का स्वागत करने की तैयारी काफी जोर-शोर से कर रहा है। शहर के बुनियादी ढांचे के साथ ही यहां की अर्थव्यवस्था जैसे होटल, रेस्तरां, दुकानें, रिक्शा चालक और पुजारियों को उम्मीद है कि  भारी संख्या में श्रद्घालुओं के आने से सुस्त पड़े उनके कारोबार में भी बहार आएगी।
कुल मिलाकर यह त्योहार पुरी में निवास करने वाले भगवान जगन्नाथ का है। नवकलेवर यानी नया शरीर। इसमें विश्वविख्यात जगन्नाथ मंदिर में रखे भगवान जगन्नाथ, बालभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की पुरानी मूर्ति को नई मूर्ति से बदला जाता है। इसका आयोजन तब होता है, जब हिंदू कैलेंडर में आषाढ़ के दो महीने होते हैं, जैसा कि इस साल हो रहा है। ऐसा संयोग 12 या 19 वर्षों में एक बार होता है। आखिरी नवकलेवर वर्ष 1996 में मनाया गया था। भगवान की नई मूर्तियां नीम की विशेष किस्म की लकड़ी से बनाई जाती है, इसे स्थानीय भाषा में दारु ब्रह्मïा कहते हैं। इस समारोह में न सिर्फ मूर्तियां बदली जाती हैं बल्कि रहस्यमयी अनुष्ठïान के जरिये 'महान शक्ति' भी पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में स्थानांतरित की जाती है।
इस प्रक्रिया की शुरुआत जगन्नाथ को दोपहर का भोग लगाने के बाद होती है। भगवान व उनके भाई-बहनों के लिए विशेष तौर पर 12 फुट की माला, जिसे धन्व माला कहते हैं, तैयार की जाती है। पूजा के बाद यह माला 'पति महापात्र परिवार' को सौंप दी जाती है, जो पुरी से 50 किलोमीटर दूर स्थित काकतपुर तक मूर्तियों के लिए लकड़ी खोजने वाले दल की अगुआई करते हैं। काकतपुर में मां मंगला का मंदिर है। वृक्षों की खोज पर निकला दल यात्रा के दौरान पुरी के पूर्व राजा के महल में रुकता है। सबसे बड़ा दैतापति (सेवक) मंदिर में ही सोता है और माना जाता है कि देवी उसके सपने में आकर उन नीम के वृक्षों की सही जगह की जानकारी देती हैं, जिनसे तीनों मूर्तियां बननी हैं।
ये कोई साधारण नीम के वृक्ष नहीं होते। चूंकि भगवान जगन्नाथ का रंग सांवला है, इसलिए जिस वृक्ष से उनकी मूर्ति बनाई जाएगी वह भी उसी रंग का होना चाहिए। हालांकि भगवान जगन्नाथ के भाई-बहन का रंग गोरा है इसलिए उनकी मूर्तियों के लिए हल्के रंग का नीम वृक्ष ढूंढा जाता है। जिस वृक्ष से भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बनाई जाएगी, उसकी कुछ खास पहचान होती है, जैसे उसमें चार प्रमुख शाखाएं होनी जरूरी हैं। ये शाखाएं नारायण की चार भुजाओं की प्रतीक होती हैं। वृक्ष के समीप ही जलाशय, श्मशान और चीटियों की बांबी हो यह बहुत जरूरी होता है। वृक्ष की जड़ में सांप का बिल होना चाहिए और वृक्ष की कोई भी शाखा टूटी या कटी हुई नहीं होनी चाहिए। वृक्ष चुनने की अनिवार्य शर्त होती है कि वह किसी तिराहे के पास हो या फिर तीन पहाड़ों से घिरा हुआ हो। उस वृक्ष पर कभी कोई लता नहीं उगी हो और उसके नजदीक ही वरुण, सहादा और बेल के वृक्ष हों (ये वृक्ष बहुत आम नहीं होते हैं)। और चिह्निïत नीम के वृक्ष के नजदीक शिव मंदिर होना भी जरूरी है।
मूर्तियों के लिए नीम के वृक्षों की पहचान करने के बाद एक शुभ मुहुर्त में मंत्रों के उच्चारण के बीच उन्हें काटा जाता है। इसके बाद इन वृक्षों की लकडिय़ों को रथों पर रखकर दैतापति जगन्नाथ मंदिर लाते हैं, जहां उन्हें तराशकर मूर्तियां बनाई जाती हैं। मूर्तियां बदलने का यह समारोह मशहूर रथ यात्रा से तीन दिन पहले होता है, जब 'ब्राह्मïण' या पिंड को पुरानी मूर्तियों से निकालकर नई मूर्तियों में लगाया जाता है। मूर्तियां बदलना इतना आसान नहीं है और इसके लिए कड़े नियम होते हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य है। नियमानुसार मूर्तियां बदलने के लिए चुने गए दैतापतियों की आंखों पर पट्टïी बांध दी जाती है, पिंड बदलने से पहले उनके हाथ कपड़े से बांध दिए जाते हैं और लकड़ी की खोज शुरू होने के पहले ही दिन से उन्हें बाल कटवाने, दाढ़ी बनाने या मूंछ कटाने की अनुमति नहीं होती है। मध्यरात्रि में दैतापति अपने कंधों पर पुरानी मूर्तियां लेकर जाते हैं और भोर से पहले उन्हें जमीन के अंदर दबा दिया जाता है। यह ऐसी रस्म है, जिसे कोई देख नहीं सकता और अगर कोई देख ले तो उसका मरना तय होता है। इसी वजह से राज्य सरकार के आदेशानुसार इस रस्म के दौरान पूरे शहर की बत्ती गुल कर दी जाती है। अगले दिन नई मूर्तियों को 'रत्न सिंहासन' पर बैठाया जाता है। इस साल यह रस्म 16 जुलाई को होगी। दो दिन बाद मशहूर रथ यात्रा के साथ इस आयोजन का समापन हो जाएगा। करीब 58 दिन के अंतराल के बाद एक बार फिर मंदिर में कामकाज सामान्य हो जाएगा।
तार्किक ढंग से सोचने वाले लोगों को यह सब कुछ बेतुका लग सकता है। लेकिन भगवान जगन्नाथ में पुरी के लोगों की अटूट आस्था है। यह आस्था इतनी मजबूत है कि इस त्योहार का गड़बड़ी रहित और सफल समापन सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है। इस तरह की भारी-भरकम भीड़ का स्वागत करने के लिए बड़े पैमाने पर बंदोबस्त की दरकार होती है। इसमें यात्रियों की सुविधाएं, चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति और उचित शौचालय व्यवस्था शामिल है। समारोह में शिरकत करने वाले श्रद्घालुओं की तादाद के अनुसार ये सुविधाएं मुहैया कराने पर राज्य सरकार को करीब 2,000 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे।
इस निवेश का एक बड़ा हिस्सा पुरी की बिजली व्यवस्था को नया रूप देने में जाएगा। जगन्नाथ मंदिर के ऊर्जा सचिव व विशेष प्रशासक सुरेश सी महापात्र कहते हैं, 'पुरी-कोणार्क मरीन ड्राइव के साथ ही समगारा गांव में भी विशेष पावर ग्रिड लगाई जा रही है। इसे समुद्री तूफानों जैसी प्राकृतिक आपदा से सुरक्षित रखने के लिए बिजली के तारों का भूमिगत नेटवर्क बिछाया जा रहा है।' इसके अतिरिक्त भुवनेश्वर से पुरी के बीच की 67.25 किलोमीटर सड़क का भी विस्तार किया जा रहा है। मालतीपतापुर पर नए बस टर्मिनल का निर्माण करने के साथ ही दोपहिया व चौपहिया वाहनों की पार्किंग के लिए 20 जगह चिह्निïत की जा रही हैं और 7 ओवरहेड पानी के टैंकों का निर्माण चल रहा है।
नवकलेवर त्योहार को ध्यान में रखते हुए पूर्व तटीय रेलवे ने पुरी में नए शेड का निर्माण करने का प्रस्ताव दिया है। भुवनेश्वर में दो अतिरिक्त प्लेटफॉर्म बनाए जा रहे हैं। पूर्व तटीय रेलवे ने भुवनेश्वर में एक अत्याधुनिक स्टेशन बनाने का प्रस्ताव रखा है। करीब 80 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस स्टेशन पर यात्रियों के लिए बेहतर सुविधाएं होंगी। ओडिशा सरकार ने इस परियोजना के लिए 40 करोड़ रुपये देने की सहमति जता दी है। रेलवे इस त्योहार के लिए जिन अन्य लाइनों की क्षमता बढ़ा रही है, उनमें कटक-भुवनेश्वर-खुर्दा पुरी रेल लाइन और खुर्दा-भुवनेश्वर-बारंग मार्ग पर तीसरी लाइन बिछाना शामिल है। इस त्योहार के लिए इंतजाम चाक-चौबंद हों इसलिए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के निर्देश पर वरिष्ठï अफसरों का एक दल सभी कार्यों पर नजर रख रहा है। मुख्यमंत्री ने पुरी के जिला प्रशासन को इस आयोजन के लिए पूरी तरह चौकस रहने का निर्देश दिया है और साथ ही भगदड़, आग लगने या भारी संख्या में लोगों के एकत्रित होने के कारण किसी बीमारी की स्थिति से निपटने के लिए परिचालन प्रक्रिया के साथ तैयार रहने को कहा है। स्वास्थ्य मंत्री अतनु साब्यसाची नायक कहते हैं कि राज्य सरकार ने पुरी व उसके आसपास के शहरों के अस्पतालों में अतिरिक्त 500 बिस्तर लगवाए हैं। इसके साथ ही 100 प्राथमिक चिकित्सालय और 120 एंबुलेंस का इंतजाम किया गया है। श्रद्घालुओं की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की देखरेख के लिए 900 से अधिक स्वास्थ्यकर्मी तैनात किए जाएंगे। यह आयोजन पटनायक के प्रशासनिक कौशल की परीक्षा से कम नहीं है।
इतना भव्य आयोजन सुरक्षा एजेंसियों के लिए किसी दुस्वप्न से कम नहीं होता। लोगों के इस हुजूम को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने पुरी को पांच घेरे का सुरक्षा कवर देने का फैसला किया है। शहर की प्रमुख जगहों पर सीसीटीवी लगाए जाएंगे, जैसे ग्रांड रोड (रथ यात्रा का स्थल), बस टर्मिनल, रेलवे स्टेशन, श्रद्घालुओं के रुकने की जगह और पार्किंग स्थल। इस त्योहार के लिए एक केंद्रीय सुरक्षा यूनिट भी लगाई जाएगी। इस यूनिट के पास चौपहिया बुलेट प्रूफ वाहन होंगे और आधुनिक हथियारों के साथ ही सैटेलाइट फोन भी होंगे। भीड़ के बेहतर प्रबंधन के लिए शहर भर में 30 बड़ी डिजिटल स्क्रीन लगाई जाएंगी और कुंभरपाड़ा पुलिस स्टेशन परिसर में स्थित एक विशेष कार्यालय से एक यातायात नियंत्रण यूनिट परिचालन करेगी।
पुरी एक तटीय शहर है, जिससे यहां नवंबर 2008 में मुंबई में समुद्री रास्ते से हुए आतंकी हमले जैसी वारदात होने की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए त्योहार शुरू होने से पहले चार समुद्री पुलिस स्टेशन अस्तरंगा, रामचंडी, चक्रतीर्थ और अरखकुड़ा को अत्याधुनिक उपकरणों व पर्याप्त स्टाफ से सुसज्जित किया जाएगा। दो इंटरसेप्टर नाव पुरी की तटीय रेखा पर गश्त लगाएंगी। सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए राज्य सरकार केंद्रीय नागरिक उड्डïयन मंत्रालय से जगन्नाथ मंदिर के ऊपर के हवाई मार्ग को 'उड़ान वर्जित क्षेत्र' घोषित करने की गुजारिश करने पर भी विचार कर रही है। ओडिशा के पुलिस महानिदेशक संजीव मारिक बताते हैं, 'अत्याधुनिक सिस्टम की मदद से मंदिर परिसर में सुरक्षा और मजबूत की जा रही है।' जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश द्वार पर सामान की जांच करने के लिए स्कैनर लगाए जाएंगे।
क्या इस त्योहार के सफल आयोजन के लिए इतना काफी है? नवकलेवर त्योहार की तैयारी के बारे में जगन्नाथ मंदिर के सेवक जगन्नाथ स्वान महापात्र कहते हैं, '1996 में आयोजित नवकलेवर बेहद सफल रहा था और उसमें कोई भी अप्रिय घटना नहीं हुई थी।  इस बार भी हम कुछ ऐसा ही समारोह आयोजित करने की कोशिश कर रहे हैं।' 1996 में आयोजित नवकलेवर के दौरान 20 लाख श्रद्घालु पुरी आए थे और इस बार यह आंकड़ा करीब 50 लाख रहने की उम्मीद की जा रही है। ओडिशा के विधि मंत्री अरुण साहू के अनुसार इस समारोह के सफल आयोजन के लिए युद्घस्तर पर कार्य चल रहा है, जिसमें सड़क निर्माण, पार्किंग स्थल, जल निकासी तंत्र, जल आपूर्ति और चिकित्सकों के लिए अस्थायी कियोस्क बनाने का कार्य समारोह शुरू होने से एक महीना पहले यानी जून तक पूरा कर लिया जाएगा। ओडिशा में कई लोगों को यह शिकायत है कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2015-16 के आम बजट में नवकलेवर के लिए रकम आवंटित नहीं की। योजना आयोग ने वर्ष 2013 में प्रयाग में आयोजित कुंभ मेले के लिए 800 करोड़ रुपये की रकम आवंटित की थी, इसी बात को आधार बनाकर ओडिशा ने भी पूर्ववर्ती योजना आयोग के समक्ष प्रस्ताव जमा कर केंद्र से 740 करोड़ रुपये का विशेष अनुदान मांगा था। लेकिन अब राज्य को अपने दम पर यह समारोह आयोजित करना पड़ रहा है। ओडिशा में ही विपक्ष ने सुरक्षा इंतजामों और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए हो रहे कार्य पर सवालिया निशान लगा दिया है। ओडिशा में कांग्रेस इकाई के अध्यक्ष प्रसाद हरिचंदन ने हाल में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था, 'यह सरकार नवकलेवर की तैयारी को लेकर बहुत गंभीर नहीं है। जिस रफ्तार से काम चल रहा है उसे देखते हुए तो यही लगता है कि समारोह से पहले उसका पूरा होना मुश्किल है।'
हालांकि स्थानीय कारोबारी इस त्योहार के साथ होने वाले कारोबार की संभावना को लेकर बहुत उत्साहित हैं। इस त्योहार के दौरान अनुमानित कमाई के बारे में ओडिशा के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री अशोक पांडा कहते हैं कि राज्य में औसतन देसी पर्यटक प्रतिदिन 1,357 रुपये खर्च करते हैं, जबकि विदेशी पर्यटक 2,255 रुपये प्रतिदिन खर्च करते हैं। त्योहार के लिए 50 लाख लोगों के आने का मतलब है कि राज्य को पर्यटन से कई सौ करोड़ रुपये की  आय होगी।
इंडियन एसोसिएशन ऑफ टूर ऑपरेटर्स के चेयरमैन (ओडिशा चैप्टर) व ट्रैवल लिंक के प्रबंध निदेशक बेंजामिन साइमन कहते हैं, 'अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले उडिय़ा मूल के प्रवासी भारतीयों को नवकलेवर त्योहार के दौरान आकर्षित किया जा सकता है। यह राज्य के प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ संपर्क  बनाने का शानदार अवसर है।' उन्होंने कहा, 'देश में ओडिशा बेंगलूरु, गुजरात और हैदराबाद से जुड़ा हुआ है। इसके अतिरिक्त दिल्ली, चेन्नई और मुंबई जैसे शहरों पर भी ध्यान दिया जा सकता है। पुरी हिंदू धर्म में बताए गए चार धाम में से एक है। इस पावन अवसर पर अन्य धाम जिसमें उत्तर में बदरीनाथ, पश्चिम में द्वारका और दक्षिण में रामेश्वरम शामिल है, से भी श्रद्घालुओं के पुरी आने की उम्मीद है।' पुरी आने वाले कुल श्रद्घालुओं में से करीब 75 फीसदी राज्य से ही होंगे। गाइड, दुकानदार, रेस्तरां, कलाकार, रिक्शा चालक, ऑटो रिक्शा वालों को भी नवकलेवर के दौरान अच्छा काम मिलेगा। पुरी के होटल संगठन के अध्यक्ष आर के दास महापात्र कहते हैं, 'हमें होटलों, धर्मशालाओं, आश्रमों और हॉलिडे होम्स के कमरे 100 फीसदी बुक होने की उम्मीद है।' पुरी में करीब 480 होटल, 200 लॉज, 12 धर्मशाला, 80 आश्रम और 100 से ज्यादा हॉलिडे होम्स हैं।
    (साथ में निर्माल्य बेहड़ा)

Keyword: Odisha, Puri, navakalevara,
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