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हटेंगे हाथ के रिक्शे, बदलेंगे किस्मत के पहिए!
कमलिका घोष /  January 20, 2015

कोलकाता में हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे की मौजूदगी की वजह से शायद इस शहर की कुछ मौजूदा परेशानियां थोड़ी कम जरूर हो जाती हैं। यह एक ऐसा महानगर है जिसने अपनी अनूठी वास्तुकला वाली औपनिवेशिक विरासत को अविरत बनाए रखने में अब तक कामयाबी पाई है लेकिन देश के बाकी हिस्से की तरह इसे अपनी रफ्तार बनाए रखने में खासी मशक्कत करनी पड़ती है। अराजकता और अव्यवस्था कोलकाता की पहचान बन चुकी है। आधुनिक समाज के दबाव को अपनाने की कोशिश में जुटे इस शहर के लिए रिक्शा प्रतीकात्मक है।

साल 2005 से ही ऐसी कोशिशें जारी हैं कि इस मेट्रो शहर की सड़कों को आधुनिक रंग-रूप में पेश किया जाए। वर्ष 2005 में ही वाम मोर्चे की पूर्ववर्ती सरकार ने हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था क्योंकि सरकार का मानना था कि यह व्यवस्था आदमी के आत्मसम्मान का मखौल उड़ाती है। विरोध के बीच ही सरकार ने राज्य विधानसभा में कलकत्ता हैकनी कैरिज (संशोधन) विधेयक, 2006 का प्रस्ताव रख ऐसे रिक्शे के अस्तित्व को खत्म करने का रास्ता तैयार कर दिया। तत्कालीन सरकार ने यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि इस बदलाव के बाद गरीब रिक्शा चालकों के लिए जीविका का वैकल्पिक जरिया क्या होगा। हालांकि इस विधेयक को चुनौती दी गई और कलकत्ता हाई कोर्ट ने इसके लिए स्थगन आदेश दे दिया। हालांकि कोलकाता नगरपालिका ने साल 2005 से ही कोई नया लाइसेंस जारी नहीं किया है।

मौजूदा सरकार ने प्रतिबंध में थोड़ी तब्दीली करते हुए हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा की जगह आधुनिक रिक्शा लाने का फैसला किया जिससे रिक्शाचालकों के आत्म सम्मान को कोई ठेस न पहुंचे। वर्ष 2006 में विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने ही जोरदार तरीके से हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे को हटाने के फैसले का विरोध किया था। इस पार्टी के विधायकों ने तो विधानसभा की उस बैठक का भी बहिष्कार किया था जिसमें इससे जुड़े कानून में संशोधन के लिए चर्चा की जानी थी। जब पार्टी ने वर्ष 2010 में कोलकाता नगरपालिका का चुनाव जीता तब मेयर शोभन चटर्जी ने यह घोषणा की कि नगरपालिका रिक्शा चालकों के लिए फोटो आईडी कार्ड जारी करेगी।

इस साल नगरपालिका के चुनाव होने हैं और विधानसभा चुनाव वर्ष 2016 में होना तय है। ऐसे में नए तरह के रिक्शे की पेशकश करने का सरकार का यह फैसला निश्चित तौर पर लोकलुभावन कदम है हालांकि इसका कुछ खास फायदा सरकार को नहीं मिल सकता है क्योंकि सारदा घोटाले से सरकार की विश्वसनीयता को गहरा धक्का लगा है। सरकार के नए कदम का रिक्शा चालकों और उनके परिवार पर क्या असर पड़ेगा यह तो अब वक्त ही बताएगा।

बैटरी की ताकत

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शे की जगह कौन लेगा। ऑल बंगाल रिक्शा यूनियन के उपाध्यक्ष मुख्तार अली का कहना है कि दो सीट वाला बैटरी चालित वाहन ही इन रिक्शे की जगह लेगा और उन्हें उम्मीद है कि इससे बेहतर कारोबार होगा। मुख्तार अली का कहना है, 'पहले रिक्शाचालक औसतन रोजाना 100-150 रुपये कमा लेते थे लेकिन अब वे एक दिन में 300 रुपये की कमाई कर सकते हैं क्योंकि नया वाहन हाथ वाले रिक्शे के मुकाबले तेज चलेगा। एक नए और तेज मॉडल का अर्थ यह होगा कि रोजाना ज्यादा लोग इससे कहीं आना-जाना करेंगे।'

हालांकि हैरानी की बात यह है कि रिक्शाचालकों की बिरादरी में इस बात को लेकर ज्यादा उत्साह नहीं है। करीब 70 साल के मंसूर अली बिहार से आने के बाद लगभग 50 सालों से सड़कों पर कड़ी मेहनत करते रहे हैं और उन्होंने मलिक बाजार के पास मौजूद झुग्गी-झोपड़ी वाली बस्ती को अपना घर बनाया है। वह कहते हैं, 'गांव में लोग कहते थे, कलकत्ता बड़ा शहर है, वहां कुछ न कुछ काम मिल जाएगा।'

उनके पास अपनी रिक्शा खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। उन्होंने कमाने के लिए एक रिक्शा किराए पर लिया। क्या उन्हें इस बात से सचमुच राहत नहीं मिली है कि अब उन्हें कोलकाता की संकरी गलियों में ग्राहकों को रिक्शे पर बिठाकर और उसे खींचकर नहीं ले जाना पड़ेगा?  वह कहते हैं, 'क्या आप यह सोचती हैं कि 70 साल का कोई बुजुर्ग अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव में बैटरी वाली गाड़ी चलाना सीखेगा?'

करीब 30 सालों तक रिपन स्ट्रीट और न्यू मार्केट में काम करने वाले हरि यादव की अपनी ही चिंता है। वह कहते हैं, 'जिनके पास लाइसेंस है उनको ही नया रिक्शा मिलेगा। हमारे पास तो लाइसेंस नहीं है।' कई लोग जो पड़ोसी देश बांग्लादेश से पलायन कर यहां आए हैं उनके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए वैध दस्तावेज नहीं है। इनमें से ज्यादातर लोगों की कंगाली वाली स्थिति हो जाएगी। ये लाइसेंस रहित रिक्शा चालक ही सबसे बड़ी दिक्कत हैं। हालांकि मुख्तार अली का कहना है, 'पुनर्वास कार्यक्रम में लाइसेंसधारी और लाइसेंस रहित रिक्शा चालक दोनों ही शामिल होंगे। एक सूचना यह भी है कि करीब 20-25 फीसदी रिक्शा चालकों के पास लाइसेंस नहीं है।'

पुराने दौर का प्रतीक

कोलकाता के दोपहिया रिक्शा दरअसल दमन और अत्याचार का प्रतीक रहे हैं और अक्सर इसका इस्तेमाल दयनीय स्थिति को दिखाने के लिए किया गया। बिमल रॉय की मशहूर फिल्म 'दो बीघा जमीन' भी नए और स्वतंत्र भारत की भयंकर गरीबी को दर्शाती है। वर्ष 1992 में ओमपुरी अभिनीत फिल्म 'सिटी ऑफ जॉय' भी रिक्शा चालक के कड़े परिश्रम को दर्शाती है। लेकिन फिल्मों और साहित्य में भले ही रिक्शा चालकों की स्थिति को नकारात्मक तरीके से दिखाया गया है, शहर का रूप रंग बदल रहा है लेकिन रिक्शा अब भी गलियों में नजर आ रहे हैं।

परिवहन विभाग के प्रमुख सचिव अलापन बंद्योपाध्याय का कहना है, 'कोलकाता में करीब 6,000 हाथ से खींचने वाले रिक्शाचालक थे। हमारी आखिरी गिनती तक सड़कों पर अब तक करीब 2000 रिक्शाचालक मौजूद हैं।' उनका कहना है कि सरकार ने हाल ही में रिक्शाचालक संघ के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की थी और उन्होंने सरकार की नई योजना से फायदा पाने वाले लोगों से जुड़ी एक विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। उनका कहना है, 'हाल में खत्म हुए बंगाल वैश्विक कारोबार सम्मेलन में हमने नए रिक्शा मॉडल से जुड़ी एक चर्चा काइनेटिक नाम की कंपनी के साथ कराई थी और यह दिलचस्प भी था। इसने हमसे एक व्यावहारिक मॉडल का सुझाव मांगा था। हम संभावनाएं तलाश रहे हैं।'

भले ही ये रिक्शा आदमी के लिए शोषण का प्रतीक लगते हैं लेकिन रिक्शा चालकों का कहना है कि लोग इस सवारी को काफी तरजीह देते हैं खासतौर पर किसी आपात स्थिति या बुजुर्गों के लिए। ऐसी सड़कों पर जहां हमेशा भारी जाम लगा रहता है, ये रिक्शा तबीयत खराब होने जैसी आपात स्थिति में भगवान का दूत साबित होते हैं। यादव कहते हैं, 'पिछले दिनों मैं एक 80 साल की महिला को रिक्शे पर बैठाकर उनकी बेटी के घर छोड़ा क्योंकि उन्हें काफी तेज बुखार था।' बारिश के दिनों में तो कोलकाता की सड़के चलने लायक नहीं रहती हैं। ज्यादातर मुख्य सड़कें जब पानी में डूब जाती हैं तो इस पुराने वाहन को नजरअंदाज करने वाले लोग भी इसकी सवारी करते हैं क्योंकि कारें भी ज्यादा पानी बढऩे पर नहीं चल पाती हैं।

हाथ से खींचने वाले रिक्शे को खत्म करने के प्रस्ताव के साथ ही शहर का इतिहास और इसकी औपनिवेशिक पहचान भी हमेशा से अपनी पहचान खो देगी। हालांकि यह शहर भी बड़ी बेसब्री से एक नई दुनिया को अपनाने के लिए बेताब है और इसे लोगों के विकास की प्राथमिकता देनी होगी। हालांकि इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि हाथ से रिक्शा खींचने वालों का काम अमानवीय तो है लेकिन अगर वे अपना मौजूदा काम छोड़ते हैं तो लोगों की आजीविका का साधन सुनिश्चित तो होना ही चाहिए। ममता सरकार के लिए यही एक चुनौती है।

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