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चीन की बराबरी से पहले जरूरी है नारी की भागीदारी
तर्क-वितर्क
राहुल जैकब /  December 14, 2014

हाल ही में गोल्डमैन सैक्स की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर एक रिपोर्ट आई। इसमें कहा गया कि भारत की आर्थिक विकास दर जल्द ही चीन से आगे निकल जाएगी। हालांकि वास्तविकता कुछ और ही है। चीन का जीडीपी 9 ट्रिलियन (9,000 अरब)डॉलर है, जबकि भारत का 1.8 ट्रिलियन डॉलर है। अगर चीन की विकास दर धीमी रही तो भी यह मजबूत आधार के कारण भारत से एक या दो शताब्दी आगे निकल जाएगा।
कुछ समय पहले एक रिपोर्ट में अर्थशास्त्री लैरी समर्स और लैंट प्रिचिट ने इस बात का अनुमान लगाया कि अगर भारत और चीन मौजूदा रफ्तार से आगे बढ़ते रहे तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को इससे क्या फायदा होगा। उनका आकलन है कि दोनों देशों की विकास दर अधिक तेज रही तो 2033 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था के आकार में 56 ट्रिलियन डॉलर का इजाफा हो सकता है जिसमें चीन की हिस्सेदारी 51 ट्रिलियन डॉलर और भारत की 5 ट्रिलियन डॉलर होगी। हालांकि  ये आंकड़े कागजी हैं, क्योंकि इस बात की संभावना खासी कम है कि चीन पिछले कुछ दशकों की तरह आगे भी तेजी से विकास कर पाएगा। भारत के लिए चीन की बराबरी करना आसान नहीं है और इसके पीछे कई कारण हैं। इनमें से एक है चीन की लिंग समानता में बढ़त। यह अलग बात है कि इस पर उतनी चर्चा नहीं होती है। हाल की 'सेव द चिल्ड्रन' रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्टï्र विकास कार्यक्रम के लिंग असमानता सूचकांक में भारत 132वें स्थान पर था। यहां तक कि इस मामले में भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे था। श्रीलंका 75वें पायदान पर था। लिंग असमानता सूचकांक में कई मापदंड हैं, जैसे किशोरावस्था में ही महिलाओं को पैदा हुई संतानों की संख्या, संसद में काम करने वाली महिलाओं की संख्या के मुकाबले माध्यमिक स्तर पर शिक्षा प्राप्त महिलाओं की तादाद आदि (इस सूची में चीनी भारत से 100 पायदान आगे हैं)।
द वल्र्ड ऑफ इंडियाज गल्र्स रिपोर्ट में भारत में लड़कियों के आगे बढऩे की राह में आने वाली चुनौतियों का जिक्र है।  समाज के सबसे धनी वर्ग में कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएं सर्वाधिक देखने को मिलती हैं। करीब एक चौथाई लड़कियां पांचवीं कक्षा से आगे नहीं बढ़ पाती हैं, जबकि 41 प्रतिशत आठवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती हैं। भारत में 18 साल की उम्र होते-होते करीब आधी लड़कियों का विवाह हो जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लड़कियों की सुरक्षा के प्रति चिंता इसके पीछे एक बड़ी वजह है। महिला शिक्षकों की संख्या भी 2001 की 31 प्रतिशत से कम होकर 2012 में 31 प्रतिशत रह गई।  लड़कियों की चुनौतियां यहीं खत्म नहीं होती हैं। पांच साल के बाद लड़कियों के संघर्ष का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत में करीब 3.8 करोड़ महिलाएं 'लापता' हैं। विश्व में किसी देश में यह तादाद इतनी नहीं है। रिपोर्ट में दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाली 11-15 साल के बीच वाली लड़कियों का साक्षात्कार लिया गया। उन्होंने बताया कि वे आगे चलकर पुलिस में भर्ती होना चाहती हैं। इसकी वजह के बारे में वे कहती हैं कि महिलाओं के प्रति प्रताडऩा रोज की बात हो गई है। उनका कहना है कि वे अपने भाइयों के मुकाबले पढ़ाई में अच्छा करती हैं तो भी उनके आगे की पढ़ाई करने का मौका नहीं मिल पाता है। इससे बड़ी विडंबना तब होती है जब लड़के अपने-पिता के पूर्वग्रहों का प्रकटीकरण करते हैं। ओडिशा में युवावस्था की दहलीज पर खड़ा एक किशोर कहता है, 'लड़कियों को मोबाइल रखने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। लड़कियां लड़कों से बात करने के लिए मोबाइल रखती हैं। ऐसे में यह पता करना मुश्किल हो जाता है कि वे कि नसे बात कर रही हैं।'
मैंने लेस्ली चैंग की किताब 'फैक्टरी गल्र्स' टटोली जिसमें दक्षिण चीन की व्यस्ततम फैक्टरियों में काम करने वाली महिलाओं का लेखा-जोखा दिया गया है। वर्ष 2000 के शुरू में वहां फैक्टरी में काम करने वालों में महिलाओं की तादाद 70 प्रतिशत थी। चीन महिलाओं के आगे बढऩे की कहानी बयां करता है। चैंग ने पाया कि वहां की महिलाओं में पुलिस का भय नहीं था। चीन के दक्षिणी शहर शेनजेन और डौंगम में 2010-2013 के बीच पाया कि दिन का काम समाप्त करने के बाद महिलाएं वहां 11 बजे रात से लेकर मध्य रात्रि तक खरीदारी करती हैं और रेस्तरां में खाना खाती थीं (नई दिल्ली में कड़ी सुरक्षा वाली जगहों पर भी महिलाओं का अकेली दिखना लगभग असंभव है। उनमें असुरक्षा की भावना प्रबल है।)
मुझे चीन में मानव संसाधन प्रबंधकों की बातें याद आती हैं जब वे इस बात की शिकायत करते थे कि वे जितनी संख्या में महिलाओं की भर्ती करना चाहते हैं उतनी नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि खुदरा, रेस्तरां आदि  में महिलाओं को अधिक अवसर मिल रहे हैं जिससे उनकी उपलब्धता कम पड़ जाती है (तब तक फैक्टरी में पुरुष और महिलाओं का अनुपात कम होकर करीब 50-50 रह गया था)। चीन और भारत की महिलाओं की तुलना करें तो एक बड़ी खाई दिखाई देती है।
दिल्ली में एक महिला के साथ बलात्कार की घटना हमें याद दिलाती है कि हमें महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में कितना सफर तय करना है। टैक्सी सेवाएं बंद करना एक समझ-बूझ वाले कदम का विकल्प दिखाई देता है जिससे समस्या का स्थायी समाधान होता नहीं दिखता। अगर सार्वजनिक परिवहन की ही बात करें तो हमारी सरकार महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कितनी गंभीर है? सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुरक्षा पुख्ता करने के लिए इस साल के शुरू में पेश बजट में न्यूनतम राशि का प्रावधान किया गया। बहुचर्चित 'बेटी बचाओ आंदोलन' कार्यक्रम को महज 100 करोड़ रुपये मिले, जबकि इतनी ही राशि मणिपुर में एक खेल विश्वविद्यालय की स्थापना के मद में दी गई।
दूसरे कई ऐसे देश भी हैं जहां महिलाओं की स्थिति और भी खराब है लेकिन कम से कम वे चीन की बराबरी करने का दंभ भी तो नहीं भरते हैं।

Keyword: China, Women, Goldman Sachs,
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