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योजनाओं के बाद भी बुनकर बदहाल
अजय मिश्र / वाराणसी December 02, 2014

वाराणसी समेत पूर्वांचल के बुनकरों के विकास के लिए सरकार भले ही सजगता दिखा रही हो और उनके लिए तमाम योजनाओं की घोषणा की जा रही हो लेकिन यहां के बुनकरों का कहना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंच रहा है। उनका कहना है कि सरकार की ओर हर साल-छह महीने में योजनाओं की घोषणा कर खानापूर्ति कर दी जाती है लेकिन इसे सक्रियता से क्रियान्वित नहीं किया जाता, जिससे उनका विकास बाधित है।

बुनकरों के लिए राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारों द्वारा सब्सिडी मुहैया कराई जाती है, बावजूद इसके बुनकरों की स्थिति बदतर होती जा रही है। वाराणसी के बुनकर बिरादराना तंजीम चौदहों के सरदार मकबूल हसन ने बताया कि सरकार संसाधनों में कुछ मदद करती है लेकिन महंगाई के चलते कच्चे माल की कीमतें बुनकरों को तबाह कर जाती हैं। हसन ने कहा कि बुनकरों को सस्ता रेशम और बाजार चाहिए, न कि आर्थिक पैकेज।

हालांकि अधिकारियों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाओं से काफी संख्या में बुनकरों को फायदा पहुंचाया जा रहा है। राज्य हथकरघा निगम के क्षेत्रीय प्रबंधक अनिल सिंह व बुनकर सेवा केंद्र के अधिकारी तपन शर्मा के अनुसार वर्तमान में केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय की कुछ योजनाएं लागू हैं, जिनमे एक मेगा हैंडलूम क्लस्टर योजना है जिसके अंतर्गत 80 फीसदी अनुदान पर बुनकरों को हथकरघा उपकरण मुहैया कराए जाते हैं। इससे वाराणसी के लगभग 12 हजार बुनकर लाभान्वित हो रहे हैं। वहीं बुनकर क्रेडिट कार्ड योजना के तहत 2400 बुनकरों को बैकों के जरिए ऋण दिया गया है।

बुनकर स्वास्थ्य बीमा योजना के द्वारा वाराणसी परिक्षेत्र के वाराणसी समेत मिर्जापुर, चंदौली, भदोही और जौनपुर के 69 हजार बुनकरों को जोड़ा गया है। एक अन्य योजना महात्मा गांधी बुनकर सामूहिक बीमा योजना भी चल रही है जिसमे बुनकरों से 80 रुपये लेकर सामूहिक बीमा कराया जाता है। इसमें सामान्य मौत पर 60 हजार रुपये और दुर्घटना में मौत पर डेढ़ लाख रुपये दिया जाता है। इसके अलावा, कई अन्य योजनाओं पर भी काम चल रहा है। छूट के आधार पर बुनकरों के लिए सौर ऊर्जा सयंत्र स्थापित करने की तैयारी चल रही है।

लेकिन बुनकरों का कहना है कि इन योजनाओं का फायदा जरूरतमंदों को नहीं मिल पा रहा है। उनका कहना है कि बिचौलये उनका वाजिब हक मार ले रहे हैं और सरकार इस ओर ध्यान देने को तैयार ही नहीं है। अगर बुनकरों से सरकार या कोई एजेंसी सीधे साड़ी की खरीदारी करे तो बुनकरों को अपने उत्पाद बेचने के लिए बिचौलियों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। हालात यह है कि कई बुनकर रोजी रोटी की तलाश में शहर का रुख कर रहे हैं।

हथकरधा बुनकर सिकंदर अंसारी ने बताया कि बुनकरों की मेहनत का वास्तविक फायदा तो गिरस्ता (साड़ी व्यवसायी) उठाते हैं। दूसरी तरफ नियामत अहमद और बुजुर्ग बुनकर अली अहमद ने बताया कि हम बुनकरों की मजदूरी 120 वर्षों में भी नहीं बढ़ी है। ताना-बाना की रंगाई करने की जो मजदूरी दशकों पहले मिलती थी वही आज भी मिल रही है। एक साड़ी की रंगाई की मजदूरी 35 रुपये मिलती है, जबकि 15 रुपये का खर्च ही आ जाता है। सरकार ने नया हैंडलूम लगाने के लिए अनुदान देने की घोषणा की है लेकिन इसकी लागत करीब 50 हजार रुपये खर्च आती है और केंद्र की ओर से 10 रुपये अनुदान मिलता है।

Keyword: uttar pradesh, GOVT, handloom, हस्तशिल्प,
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