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सहस्राब्दी विकास लक्ष्य कहीं पूरा कहीं आधा
सुबीर गोकर्ण / नई दिल्ली December 01, 2014

सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को हासिल करने के मामले में भारत का रिकॉर्ड मिला-जुला रहा है। जरूरी हो चला है कि हम इन्हें लेकर अपनी नीतिगत प्राथमिकताएं तय करें। इनके बारे में बता रहे हैं सुबीर गोकर्ण

वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र ने सहस्राब्दी  शिखर बैठक का आयोजन किया था। उस सम्मेलन में सदस्य देशों ने सहस्राब्दी  विकास लक्ष्य (एमडीजी)तय किए थे। ये लक्ष्य गरीबी, लिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण आदि क्षेत्रों में तय किए गए थे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को वर्ष 2015 तक इनसे जुड़े लक्ष्यों को हासिल करना था।

इसके लिए जो ढांचा तय किया गया उसमें इनसे जुड़े आठ व्यापक लक्ष्यों की बात थी। अपने हालिया संस्करण में उसने इनकी संख्या बढ़ाकर 21 कर दी है। इनको हासिल करने के लिए 60 संकेतक निर्धारित हैं। अब जबकि हम इसके लिए तय समय-सीमा की ओर बढ़ रहे हैं तो सरकार और विकास एजेंसियां यह आकलन करने में लगी हैं कि कौन से लक्ष्य हासिल किए गए हैं और कौन से नहीं।

वर्ष 2015 के बाद के लक्ष्य और उनको हासिल करने के लिए नीतियों को लेकर भी चर्चा चल पड़ी है। सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने हाल ही में वर्ष 2014 की सांख्यिकी वार्षिकी प्रकाशित की है। इसका एक अध्याय अगले वर्ष आठ लक्ष्यों को लेकर देश की उपलब्धियों पर केंद्रित है। पहला लक्ष्य है अत्यधिक गरीबी और भूख को हटाना। भारत की बात की जाए तो मापन और अवधारणात्मक सीमाओं के बावजूद यहां गरीबी के अनुपात का मापन सबसे व्यावहारिक तरीके से किया जाता है। देश में वर्ष 1990 से 2015 के बीच गरीबी के अनुपात को घटाकर आधा करने का लक्ष्य तय किया गया था। वर्ष 2011-12 के सबसे ताजातरीन अनुमानों पर ध्यान दिया जाए तो यह लक्ष्य हमारी पहुंच में नजर आता है।

बहरहाल, इससे संबंधित दूसरा लक्ष्य था भूख से पीडि़त लोगों की संख्या को घटाकर आधा करना। इस लक्ष्य पर हमारी गति तयशुदा से काफी धीमी है। इस परिदृश्य को ध्यान में रखें तो हमें खाद्य सुरक्षा और उसे हासिल करने के बेहतरीन तरीकों के बारे में समुचित जानकारी मिलती है। खासतौर पर लक्ष्य तय करने, आपूर्ति और लागत के बारे में। दूसरा लक्ष्य है सबके लिए प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित करना। इसके बारे में भी कहा गया है कि हम सही राह पर चल रहे हैं।

इसका मुख्य संकेतक है स्कूलों में बच्चों का नामांकन। हालिया अनुमान इसे 90 फीसदी के ऊपर बता रहे हैं। यह बात स्पष्टï है कि कमोबेश सभी युवा भारतीयों को स्कूली शिक्षा मिल रही है। हालांकि उस शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर तमाम तरह की चिंताएं जताई जा रही हैं। गुणवत्ता में सुधार की बात की जाए तो उसे अगले लक्ष्य में शामिल किया जा सकता है। इस बीच सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा मुहैया कराने के मामले में व्यवस्था को श्रेय दिया जा सकता है। बहरहाल इस चरण के बाद किस्से में नाटकीय बदलाव आता है क्योंकि माध्यमिक स्तर पर बच्चों के स्कूली नामांकन में करीब एक तिहाई की गिरावट आती है।

बच्चों के स्कूली शिक्षा से बाहर जाने का यह स्तर चिंताजनक है और समान और समावेशी विकास की राह में बड़ी बाधा भी। जाहिर है इसे ध्यान में रखते हुए हमें सही नीतिगत प्रतिक्रिया तैयार करनी होगी। तीसरा लक्ष्य है शिक्षा के सभी स्तरों पर लैंगिक असमानता को दूर करना। इसका आकलन भी यही कहता है कि प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर हम इस लक्ष्य को हासिल करने के क्रम में सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन उच्च शिक्षा में इसकी गति धीमी है। आंकड़ों की बात छोड़ भी दें तो पर्यवेक्षण हमें यही बताता है कि देश में इन संकेतकों में काफी विचलन देखने को मिलता रहा है। एक मजबूत हल तलाश करने के लिए हमें एक समुचित व्यवस्था निर्मित करनी होगी।

चौथा लक्ष्य है बाल मृत्युदर में कमी लाना। इस लक्ष्य के तहत वर्ष 1995 से 2015 के बीच पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में दो तिहाई की कमी करनी है। इसके बारे में भी यही जानकारी है कि यह आमतौर पर सही ढर्रे पर है। इस संबंध में यह दलील दी जा सकती है कि यह लक्ष्य अपने आप में बहुत महत्त्वाकांक्षी है इसलिए इसे हासिल करना कठिन काम है। वहीं दूसरी ओर, यह हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच की भी पोल खोलता है। पोषण और सफाई जैसे संरक्षणात्मक कारक भी बाल मृत्युदर कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में हमें अधिक समग्रता से सोचना होगा ताकि हम एक प्रभावी पैकेज तैयार कर सकें।

पांचवां लक्ष्य है मातृ स्वास्थ्य में सुधार लाना। इसके लिए भी चौथे लक्ष्य की तरह की चीजें निर्धारित थीं यानी 1990 से 2015 के बीच माताओं की मृत्यु दर में दो तिहाई की कमी लाना। इस लक्ष्य को हासिल करने में हम निराशाजनक ढंग से पीछे हैं। बाल मृत्युदर की ही भांति इस मामले में भी सुधार के लिए हमें स्वास्थ्य सेवा, पोषण और साफ-सफाई का समुचित इस्तेमाल करना होगा। यह चिंता का विषय है कि हम इस लक्ष्य के मामले में बाल मृत्यु दर के मुकाबले भी पीछे हैं। छठा लक्ष्य एचआईवी/एड्स, मलेरिया और अन्य बीमारियों से निपटने से ताल्लुक रखता है। एचआईवी/एड्स के मामले में लक्ष्य है पहले इसे रोकना और फिर 2015 तक मामलों में कमी लाना। इस क्षेत्र में भी मामला पटरी पर नजर आ रहा है।

इस मामले में हमारी सफलता की वजह मुख्यत: संवेदनशील तबाकें के बीच व्यवहारात्मक परिवर्तन, बचाव और नियंत्रण आदि है। इसके उलट मलेरिया और अन्य बड़ी बीमारियों के आकलन के मामले में हम थोड़ा कमजोर नजर आ रहे हैं। ये बीमारियां पर्यावरण और प्रकृति की वजह से भी जन्म लेती हैं और यही वजह है कि इनसे निपटने के लिए अधिक तालमेल भरे कदमों की आवश्यकता है। यही वजह है कि हम इन मोर्चों पर पीछे हैं।

सातवां लक्ष्य है पर्यावरण की स्थिरता सुनिश्चित करना। एक लक्ष्य है देश की नीतियों और कार्यक्रमों में स्थायित्व को जगह दिलाना। इस क्षेत्र में भी हम लक्ष्य प्राप्ति की ओर संतोषजनक ढंग से बढ़ रहे हैं। लेकिन यह ध्यान देना जरूरी है कि इरादों और कार्य व्यवहार के बीच काफी अंतर है। सफाई की कमी और साफ पेयजल तक पहुंच हासिल करने के लिए जूझ रहे लोगों की संख्या को 1990 से 2015 के बीच घटाकर आधा करने का लक्ष्य था। पानी की बात की जाए तो मामला पटरी पर नजर आ रहा है जबकि सफाई के मामले में हम लक्ष्य से पीछे हैं।

जब जीवन की गुणवत्ता के आकलन का वक्त आएगा तो ये बातें काफी मानीखेज साबित होंगी। आखिर में बात करते हैं आठवें लक्ष्य की। वह लक्ष्य है विकास की वैश्विक साझेदारी तय करना। इस लक्ष्य को हासिल करने में निजी क्षेत्र भागीदार है। ऐसा इसलिए ताकि प्रौद्योगिकी, खासतौर पर सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का लाभ हासिल किया जा सके। इसका कोई स्पष्टï मापन नहीं है लेकिन सरसरी तौर पर यही पता चलता है कि विकास की प्रक्रिया में निजी क्षेत्र की भागीदारी में काफी इजाफा हुआ है। संक्षेप में कहें तो सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों को हासिल करने के बारे में भारत में स्थिति आधी-आधी है। लेकिन यह आकलन सरकार को वर्ष 2015 के आगे की प्राथमिकताएं तय करने की आजादी देता है।

Keyword: सहस्राब्दी शिखर बैठक, MDG, development,,
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