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सीखने होंगे नेहरू के गणतंत्र वाले मंत्र!
मिहिर शर्मा / नई दिल्ली November 16, 2014

अगर नरेंद्र मोदी हमारी स्मृतियों में जवाहरलाल नेहरू का स्थान लेना चाहते हैं तो उनको नेहरू की सफलताओं और विफलताओं से सीख लेनी चाहिए। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं मिहिर शर्मा

जवाहरलाल नेहरू को कई बातों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है और ज्यादातर के पीछे उचित वजह नहीं है। उनको कश्मीर समस्या, चीन के हाथों पराजय, हिंदू विकास दर और यहां तक कि इंदिरा गांधी के उदय के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जाता है। वे इन मामलों में ज्यादा से ज्यादा आंशिक रूप से ही जिम्मेदार थे। उनको लेकर गुस्सा कई तरह का है। मसलन नेहरू ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने पटेल और सुभाष चंद्र बोस जैसे क्षेत्रीय दिग्गजों को अनुचित रूप से सीमित रखा और वह मुस्लिमों और चीन को लेकर अतिरिक्त नरमी दिखाते थे। भारतीय गणराज्य पिछले 67 सालों से नेहरूवादी गणराज्य रहा है। देश ने इस बीच जो भी प्रगति की है वह किसी न किसी तरह नेहरू का ही नजरिया था। उसी नजरिये ने हमारी सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व किया। इसने हमें अंतरराष्ट्रीय संबंध बनाने को प्रेरित किया, हमें तार्किक, धर्मनिरपेक्ष और समान बनाने के अलावा उदार भी बनाया।

नेहरू की विरासत पर केवल कांग्रेस का कब्जा नहीं है हालांकि वह उसके अधिकांश हिस्से पर अपना दावा पेश कर सकती है। नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने जबकि पटेल नहीं बन पाए, इसकी वजह यह थी कि वह गांधी के बाद देश के सबसे लोकप्रिय नेता थे। वह कांग्रेस से अधिक लोकप्रिय थे। उनकी मौत के पहले और बाद का चुनाव परिणाम इस बात की पुष्टिï करता है। हालांकि यह भी सही है कि उनकी पार्टी की पहचान उनसे अलग थी। यह बात तब से अब तक दोबारा देखने को नहीं मिली। इंदिरा गांधी भले ही कांग्रेस से बड़ा कद रखती हों लेकिन इसकी कीमत पार्टी को अपनी पहचान खोकर चुकानी पड़ी। उनकी पुत्री ने हमारी आजादी और संस्थाओं की ताकत को जो नुकसान पहुंचाया और उनके नाती ने हमारी धर्मनिरपेक्ष पहचान की नैतिकता पर जो घाव दिए, उनके बावजूद नेहरू का नजरिया हमारी आकांक्षाओं का प्रतीक बना रहा। यह भी सच है कि हम धीरे-धीरे इससे दूर होते गए। अंतरराष्ट्रीय संबधों की बात करें तो हम गुटनिरपेक्षता से दूर होते गए लेकिन इसके बावजूद हम नेहरूवादी गणराज्य के नागरिक बने रहे।

इस बीच ऐसे लोगों में भी इजाफा हुआ जो नेहरू के दृष्टिकोण से सहमत नहीं थे। ईएमएस नंबूदरीपाद अथवा अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता जिन्हें एक समय खतरनाक कट्टरपंथी माना जाता था, के समाज में स्वीकार्य हो जाने की भी वजह है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने भी देश के भविष्य के नेहरू के नजरिये को आत्मसात कर लिया। तमाम असहमतियों के बावजूद वे भी नेहरूवादी गणराज्य का हिस्सा बने रहे। नरेंद्र मोदी किसी भी तरह नेहरू के कदमों का अनुसरण करना नहीं चाहते। हां, वह यह जरूर चाहते हैं कि आज से 50 साल बाद दीवार पर महात्मा गांधी की तस्वीर के बगल में जवाहरलाल की जगह उनकी तस्वीर लगी हो। देश के नए प्रधानमंत्री को मिले भारी जनादेश के पीछे लोग अनेक वजहें देखते हैं। अनेक लोगों का मानना है कि यह नकारात्मक जनादेश है जो पिछली सरकार से मोहभंग का नतीजा है। यह सच नहीं है। काफी हद तक यह जनादेश भारतीय गणराज्य से मोहभंग का नतीजा है। यह जनादेश इस बात का था कि हम काफी समय नेहरू के भारत में रह लिए, अब हमें कोशिश करनी चाहिए किसी और के गणराज्य में जीवन बिताने की। नरेंद्र मोदी ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिनकी रिहाइश नेहरू के सोच पर बने गणराज्य में नहीं है।

अगर मोदी सफल हुए तो उनमें से कई चीजें आने वाले सालों में खत्म हो जाएंगी जिन्हें हम अब तक हल्के में लेते आए हैं। हममें से कुछ ही लोग असहमत होंगे। पिछले दिनों जब उन्होंने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे को भगवत गीता दी तो मुस्कराते हुए यह कहना न भूले कि उनके इस कदम से देश में उनके धर्मनिरपेक्ष मित्र काफी नाराज होंगे। लेकिन यहां पूरी खामोशी व्याप्त थी। अब तो उन्होंने गीता को लगभग अपना आधिकारिक तोहफा ही बना लिया है। पिछले दिनों मुझे मीडिया के नियमन पर एक सीमित बहस में हिस्सा लेने का मौका मिला जिसमें एक प्रमुख टेलीविजन चैनल के वरिष्ठ संपादक ने नाराजगी से कहा कि आत्मनियमन पर्याप्त है क्योंकि टेलीविजन समाचार चैनल पर्याप्त जिम्मेदारी से पेश आते हैं। संपादक महोदय ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर ऐसा नहीं होता तो दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा को इतना सीमित कवरेज मिलता? ऐसी बातों से यह संकेत मिलता है कि नेहरूवादी गणराज्य की इमारत बहुत लंबे समय तक कायम नहीं रहेगी। बहरहाल, अगर मोदी नेहरू का स्थान लेना चाहते हैं तो उन्हें नेहरू के मूल्यों और उनकी विफलताओं दोनों के बारे में स्पष्टï जानकारी रखनी होगी। उनके पास नेहरू से सीखने को काफी कुछ होगा।

पहला तो यही कि वह व्यावहारिक और अंतरराष्ट्रवादी हों। नेहरू की आर्थिक गलतियों के बारे में सब जानते हैं। लेकिन अक्सर उनको बढ़ाचढ़ाकर पेश किया जाता है। अगर आप भी ऐसे भ्रम के शिकार रहे हैं तो मैं आपको सुझाव दूंगा कि आप जगदीश भगवती और अरविंद पनगढिय़ा की किताब इंडियाज ट्राइस्ट विद डेस्टिनी का पहला खंड पढ़ें। कम से कम इनको तो वामपंथी नहीं करार दिया जा सकता है। इन लेखकों के मुताबिक नेहरू पहले एक व्यावहारिक व्यक्ति थे और उसके बाद समाजवादी। उनका मुख्य लक्ष्य समाजवाद नहीं बल्कि आत्म निर्भरता और कारोबार पर निर्भरता कम करना था।

उस वक्त शुल्क कम थे, आयात लाइसेंस हासिल करना आसान था, उपभोक्ता वस्तुओं का आयात किया जाता था, विदेशी कंपनियों को राष्ट्रीय दर्जा दिया जा रहा था। नेहरू सरकार निजी निवेश से इतनी अधिक मित्रवत थी कि दूसरी पंचवर्षीय योजना में निजी निवेश परियोजना स्तर को भी पार कर गया था। उस वक्त धुर समाजवादियों को केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया। प्रोफेसर भगवती और पनगढिय़ा के मुताबिक आत्म निर्भरता की ओर रुख करना उनकी असली गलती थी न कि उनकी बेटी के कार्यकाल में हकीकत बनकर सामने आया नकली समाजवाद।

दूसरी बात, नेहरू दंभी थे लेकिन खुद के बारे में पूरी मालूमात भी रखते थे। अपनी विफलताओं की समझ ने ही उनको दूसरों पर भरोसा करना सिखाया। खासतौर पर शास्त्री का उदाहरण हमारे सामने है जिनको अपना स्वास्थ्य खराब होने पर उन्होंने बिना विभाग का मंत्री बनाया। भारत में कम ही लोग इस तरह अपने उत्तराधिकार की योजना तैयार करेंगे। नेहरू को अपने बारे में अच्छी समझ थी। नेहरू की मौत के बाद जिस तरह सत्ता का हस्तांतरण हुआ वह चमत्कार ही था।

नेहरू के बारे में सबसे रोचक जानकारियेां में से एक यह है कि कैसे नेहरू ने गुप्त रूप से कलकत्ता मॉडर्न रिव्यू में अपनी विफलताओं के बारे में एक चेतावनी लिखी थी। इसमें उन बातों का जिक्र था जो एक तानाशाह का निर्माण करती हैं- जबरदस्त लोकप्रियता, स्पष्टï उद्देश्य, ऊर्जा, गौरव, संगठनात्मक क्षमता, सख्ती और लोगों के बीच प्यार, दूसरों को सहन न कर पाना और कमजोर तथा अक्षम लोगों के लिए एक हद तक अवमानना का भाव। काम कराने को लेकर उनकी उत्सुकता, नापसंदगी को खुद से दूर रखना और नए का निर्माण, ये सारी बातें लोकतंत्र की लंबी प्रक्रिया के लिए शायद ही बरदाश्त के काबिल हों। क्या यह संभव नहीं कि जवाहरलाल नेहरू खुद को एक राजा की तरह देखते हों? अब यह मोदी को तय करना है कि क्या यह बात उनको किसी ऐसे व्यक्ति की याद दिलाती है जिसे वह जानते हैं?

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