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बंगाल विस्फोट के सुलझते सवाल
साहिल मक्कड़ और प्रवाल बसाक / कोलकाता November 10, 2014

पश्चिम बंगाल में वर्धमान के खागरागढ़ में 2 अक्टूबर को हुए विस्फोट से भारतीय खुफिया विभाग और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है। कुछ साल पहले जांचकर्ताओं ने आशंका जताई थी कि बांग्लादेश में आतंकी संगठनों पर सख्ती के मद्देनजर ये संगठन सुरक्षित जगह की तलाश में भारत की ओर रुख करते हुए स्थानीय लोगों को भड़का सकते हैं। सुरक्षा एजेंसियों की इस आशंका की पुष्टिï तब हुई जब वर्धमान विस्फोट में बांग्लादेश के नागरिक शकील अहमद और सुवन मंडल मारे गए थे। इस विस्फोट में एक भारतीय नागरिक हसन साहब भी गंभीर रूप से घायल हो गया था। ये लोग बम बना रहे थे और उनका संबंध जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश यानी जेएमबी से था जिस पर 2005 में बांग्लादेश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था।

अधिकारियों का कहना है कि असम और पश्चिम बंगाल से सटे बांग्लादेश सीमा के जरिये कई लोगों ने अवैध तरीके से भारत में घुसपैठ की है। यहां आकर वे खुद को भारतीय नागरिक बताते हैं। आतंकी संगठनों की तहकीकात करने वाली भारत की सबसे बड़ी एजेंसी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने पाया कि वर्धमान मामले में फरार 12 अभियुक्तों में से चार बांग्लादेशी हैं। इस मॉड्यूल को चलाने वाला सज्जाद भी बांग्लादेशी है। शनिवार को उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पहले दो महिलाएं- नदिया के करीमपुर निवासी राजिरा बीवी और मुर्शिदाबाद के लालबाग निवासी अमीना बीवी को विस्फोट स्थल से गिरफ्तार किया गया था।

राजिरा बीवी अहमद की विधवा है जबकि अमीना बीवी हसन साहब की पत्नी है। एनआईए सूत्रों का कहना है कि भारत में प्रवेश करने से पहले इन घुसपैठियों को किसी स्थानीय गरीब महिला से शादी करने की सलाह दी जाती है ताकि कानूनी दस्तावेज हासिल करने में कोई अड़चन न आने पाए। सज्जाद ने फातिमा से शादी की थी जो संभवत: उन चार महिलाओं में से एक है जो विस्फोट स्थल से करीब 40 किलोमीटर दूर सिमुलिया मदरसा और मुर्शिदाबाद के मुकिमनगर मदरसा में छात्रों को गुमराह करते हुए प्रशिक्षण देती थीं।

छानबीन के दौरान इन दोनों मदरसों पर छापा मारा गया। छापे के दौरान अरबी, उर्दू और बांग्ला भाषाओं में जो दस्तावेज बरामद किए गए उनमें बताया गया था कि किस प्रकार अच्छी मौत हासिल की जा सकती है। इसे कथित तौर पर उन युवा लड़कियों को पढ़ाया जाता था जो मदरसे के छात्रावास में रहती थीं। सिमुलिया गांव के निवासी इस्माइल शेख कहते हैं, 'वहां करीब 30 छात्राएं रहती थीं लेकिन वे सभी बाहरी थीं।' फिलहाल उनमें से किसी भी लड़की की पहचान नहीं हो पाई है। शेख ने कहा, 'मदरसे में पढऩे के लिए करीब 1,400 रुपये मासिक शुल्क का भुगतान करना पड़ता था और इसलिए ग्रामीण अपने बच्चों को तालीम के लिए स्थानीय मस्जिदों में भेजना पसंद करते थे क्योंकि वहां मौलवी छात्रों को मुफ्त में पढ़ाते हैं।'

मदरसा के समीप नारंगी रंग की एक टाटा नैनो कार खड़ी थी जिसकी पंजीकरण संख्या पश्चिम बंगाल की थी, लेकिन संयोग से वह पंजीकरण संख्या एक दोपहिये की थी जिसे नैनो के आने से करीब तीन साल पहले 2006 में जारी की गई थी। मदरसे का संचालन पिछले कुछ साल से हो रहा था लेकिन वह अब तक मान्यताप्राप्त नहीं हुआ था। अधिकारियों का कहना है कि अकेले पश्चिम बंगाल में इस प्रकार के बिना मान्यताप्राप्त मदरसों की संख्या करीब 3,000 है।

एनआईए फिलहाल 40 से 50 अन्य सदस्यों के अलावा ऐसे मदरसों में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले 13 जोड़ों की तलाश कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि इन संदिग्धों को बंदूक व तीर-धनुष चलाने, बम बनाने, भाषण देने और वीडियो संदेश के जरिये लोगों को प्रभावित करने का प्रशिक्षण दिया गया है। वे देश के किसी भी भाग में हो सकते हैं और इसलिए जेएमबी देसी आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) की तरह तात्कालिक साबित खतरा हो सकता है। एक भारतीय सुरक्षा एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'वे भारतीय धरती से अपनी सरकार के खिलाफ जंग छेडऩे वाले केवल दक्षिणपंथी चरमपंथी ही नहीं हैं बल्कि वे पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, नदिया और मालदा जिलों में लोगों को भड़का भी रहे हैं।' ये तीनों जिले भारत-बांग्लादेश सीमा पर हैं। नाम जाहिर न करने की शर्त पर अधिकारी ने कहा, 'जेएमबी का तात्कालिक निशाना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद हैं जो अपने देश में जेएमबी और अन्य धार्मिक कट्टïरपंथियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही हैं।'

नई दिल्ली के सुरक्षा विशेषज्ञ अजय साहनी का कहना है कि 2005 में बांग्लादेश के सीरियल धमाके के बाद जेएमबी और इस तरह के अन्य संगठन भारत की ओर पलायन करने लगे। जेएमबी करीब 300 जगहों पर धमाके कर चुका है। उसके मुखिया को बाद में फांसी पर लटका दिया गया था। इसके बाद हसीना सरकार के सुरक्षा बलों ने आतंकी संगठनों का जमकर सफाया किया। इसी क्रम में भारत को भी कई वांछित आतंकवादियों को सौंपा गया था।

साहनी ने कहा, 'जेएमबी को फिलहाल भारत के लिए बड़ा खतरा नहीं माना जा रहा है, जबकि वास्तविक खतरा एक अन्य बांग्लादेशी आतंकी संगठन हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (हूजी) से है। इसका संबंध विदेशी खुफिया एजेंसियों से है और भारत में हुए कई आतंकी हमलों के लिए वह जिम्मेदार है।' उन्होंने कहा, 'यह समस्या कई गुना तब बढ़ जाती है जब जेएमबी जैसे समूह हूजी और ऐसे अन्य संगठनों को लॉजिस्टिक्स और काडर मुहैया कराते हैं।'

तब सवाल यह है कि भारत और बांग्लादेश की खुफिया एजेंसियों द्वारा बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद भारत कोई कार्रवाई क्यों नहीं करता है? पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई कहते हैं, 'नहीं, हम चुपचाप बैठे नहीं थे।' उन्होंने कहा, 'हमने अवैध घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए राज्य सरकारों को बार-बार लिखा था। लेकिन राज्य पुलिस ने अपने राजनैतिक आकाओं के डर से कोई कार्रवाई नहीं की।' पिल्लई कहते हैं, 'हमने यह सुझाव देते हुए आम सहमति कायम करने की कोशिश भी की थी कि बांग्लादेशी प्रवासियों को सिंगापुर-मलेशिया मॉडल की तर्ज पर काम के लिए परमिट दिए जाने चाहिए। इससे हमें बांग्लादेश से भारत में प्रवेश करने वाले लोगों की वास्तविक संख्या का पता चल सकता था, लेकिन कोई भी राजनैतिक दल इसके लिए राजी नहीं हुआ।'

खुफिया एजेंसियों का कहना है कि रोजाना करीब 8,000 लोग विभिन्न चेक पोस्ट के जरिये भारत-बांग्लादेश सीमा पार करते हैं। उनमें से करीब 20 फीसदी लोग हमेशा के लिए यहीं रुक जाते हैं। सूत्रों के अनुसार, इन लोगों को राजनैतिक संरक्षण मिलता है क्योंकि इन्हें काफी अहम वोट बैंक के तौर पर देखा जाता है। साहनी और पिल्लई दोंनों का कहना है कि ऐसे वोटर पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) के समर्थक थे जो अब सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस का समर्थन करने लगे हैं। साहनी ने कहा, 'यही कारण है कि राज्य की मुख्यमंत्री एनआईए जैसी कहीं अधिक पेशेवर एजेंसी को इस मामले की जांच में लगाना नहीं चाहती थीं। ऐसे समूह राजनैतिक संरक्षण में ही फलफूल रहे हैं।'

राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के पूर्व अधिकारी दीपंजन चक्रवर्ती ने कहा, 'हर कोई जानता है कि महज राजनैतिक लाभ के लिए राजनैतिक पार्टियां जाने या अनजाने तरीके से इस प्रकार के समूहों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर मदद करती हैं।' उधर, राजनैतिक पार्टियां इन आरोपों का खंडन करती हैं। मापका नेता मोहम्मद सलीम कहते हैं, 'यह अवैध तरीके से प्रवास का मामला है लेकिन यह कहना कि उनमें 20 फीसदी यहीं रुक जाते हैं, आंकड़े को बढ़ाचढ़ाकर पेश करना होगा।' उन्होंने कहा, 'यह कहना गलत होगा कि हम कभी उसे वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

हाल की तस्वीर यह है कि भारतीय जनता पार्टी हिंदू प्रवासियों को रिझाने की कोशिश कर रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस मुसलमान प्रवासियों को। इससे पहले असम में भी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसी प्रकार की राजनीति की थी।' यह महज संयोग है कि शकील अहमद के यहां किराये पर रहने वाला नुरुल हसन चौधरी का संबंध तृणमूल कांग्रेस से था। वह उस मकान की पहली मंजिल पर रहता था और भूतल पर विस्फोट हुआ जिसका इस्तेमाल चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस के चुनाव कार्यालय के रूप में किया गया था। सरकार ने 2011 के धार्मिक आंकड़े को अब तक जारी नहीं किया है जबकि वह कई महीनों से बनकर तैयार है। उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि असम और बंगाल के कई हिस्सों में बांग्लादेशी मूल के मुसलमानों की आबादी में 5 से 7 फीसदी की वृद्धि हुई है।

हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों के दौरान ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रॉन्ट ने तीन मुसलमाल बहूल सीटों- करीमगंज, ढुबरी और असम के बारपेटा- पर जीत दर्ज की। बताया जाता है कि इन क्षेत्रों में भारी तादाद में बांग्लादेशी मुसलमान रहते हैं। अवैध आव्रजन का हमेशा विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार यहां सात सीटों पर जीत दर्ज की है। इस बीच, खागरागढ़ के निवासियों का कहना है कि उन्हें बाहरी लोगों की करतूत का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है जबकि वे उन्हें पहचानते तक नहीं हैं। धमाका स्थल के सामने चाय की दुकान चलाने वाले सरस्वती मल ने कहा, 'तीन पुरुष और दो महिला पिछले कुछ महीने से उस मकान में किराये पर रहते थे।'

खागरागढ़ निवासी बेली बीवीने कहा, 'हमने उनका चेहरा तक नहीं देखा है। महिलाएं हमेशा बुर्का में रहती थीं जबकि पुरुष बाइक से आतेजाते थे। मैंने उन्हें देखा जरूर है लेकिन हेलमेट के साथ।' बहरहाल, वर्धमान में हुआ धमाका भले ही गैर इरादतन दुर्घटना रहा हो लेकिन यह देश के लिए गंभीर सुरक्षा मुद्दों पर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान आकर्षित करता है। अब समय आ गया है कि राष्टï्रीय सुरक्षा को राजनैतिक लाभ से ऊपर देखा जाए।

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