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सरकारी बैंकों में अधिकारियों की नियुक्ति की क्या हो युक्ति!
सुबीर रॉय / नई दिल्ली November 05, 2014

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने सरकारी बैंकों में अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) के पद पर 8 तथा कार्यकारी निदेशकों के पद पर 14 नियुक्तियों को रद्द करने का फैसला किया है। ये नियुक्तियां संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की पिछली सरकार ने की थी। नई सरकार इन पदों पर नए लोगों की नियुक्ति करना चाहती है। नई सरकारें पुरानी सरकारों द्वारा अपने कार्यकाल के अंतिम समय में लिए गए फैसलों को अगर समुचित तरीके से बदल सकती हैं तो वे बदल देती हैं। अगर वह व्यवस्थागत खामियों का ठीकरा भी अपनी पूर्ववर्ती सरकार के सर पर फोड़ सकी तो और भी अच्छा।

सरकार का कहना है कि चयन प्रक्रिया में बदलाव लाया जा रहा है। सरकार के मुताबिक केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने उसे बताया है कि रिश्वत लेने के मामले में पकड़े गए सिंडिकेट बैंक के सीएमडी की नियुक्ति के दौरान भी कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी। नियुक्ति की प्रक्रिया पर एक समिति ने भी रिपोर्ट पेश की थी जिसमें रिजर्व बैंक के गवर्नर भी शामिल थे। अब सरकार एक नई प्रक्रिया का पालन करेगी जिसमें आरबीआई गवर्नर तथा उनके द्वारा नामित एक व्यक्ति भी शामिल होगा। अगर संप्रग सरकार सत्ता में होती तो भी क्या सीबीआई ने ऐसा ही कहा होता? खुद सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर तमाम बातें कही जाती हैं और मौजूदा निदेशक की नियुक्ति को ही संदेहास्पद बताया जाता है।

संप्रग सरकार के हटने तक शीर्ष बैंकरों का चयन पहले तो एक समिति द्वारा किया गया था जिसमें वित्तीय सेवा सचिव, आरबीआई के एक डिप्टी गवर्नर और कुछ स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल थे। उनकी पसंद को मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति के पास भेजा गया। समिति ने उन नामों में से किसी को शायद ही नकारा हो क्योंकि संभावना यही थी कि नकारे जाने लायक नाम वहां भेजे ही न गए हों। आखिर यह कैसे सुनिश्चित किया गया? जाहिर है इस प्रक्रिया में हर किसी ने वित्तीय सेवा सचिव की विचार प्रक्रिया को ध्यान में रखा होगा।

नई व्यवस्था के तहत आरबीआई और नौकरशाह की पुरानी जोड़ी के अलावा चार स्वतंत्र विशेषज्ञ होंगे। इन सब को मिलाकर दो सदस्यों की तीन उपसमितियां बनाई जाएंगी जो अपने-अपने स्तर पर नामों के साथ सामने आएंगी। इन नामों को आरबीआई गवर्नर, वित्तीय सेवा सचिव और स्वतंत्र विशेषज्ञों की समिति के पास भेजा जाएगा। यह समिति नामों को अंतिम रूप देगी और उसे मंजूरी के लिए मंत्रिमंडल सचिव के पास भेजा जाएगा। अब इन छह लोगों की चयन समिति नामों का चयन वोटिंग के आधार पर करेगी या सहमति के आधार पर? इतना ही नहीं मंत्रिमंडल समिति चयन समिति की पसंद का ध्यान रखने के लिए किस हद तक बाध्य होगी, खासतौर पर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि आरबीआई गवर्नर अपनी मंजूरी की मोहर लगा चुके हैं?

इसमें कोई दो राय नहीं कि बैंकरों के चयन की पिछली प्रक्रिया में खामी थी। भारतीय स्टेट बैंक के एक प्रतिष्ठिïत पूर्व अध्यक्ष ने तो कहा कि वह प्रक्रिया अक्सर 'शर्मनाक' होती थी। लेकिन यह सोचना सही नहीं कि नई प्रक्रिया में खामी नहीं होगी या इसमें समझौते नहीं होंगे। इसकी सकारात्मक बात है आरबीआई की बड़ी तथा उसके गवर्नर की अहम भूमिका। मौजूदा आरबीआई गवर्नर को काफी प्रतिष्ठा हासिल है लेकिन चयन प्रक्रिया की सफलता का अनुमान किसी एक व्यक्ति की मौजूदगी को आधार बनाकर नहीं लगाया जा सकता है। आरबीआई गवर्नर भी अलग-अलग क्षमताओं के हो चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी एक वक्त आरबीआई गवर्नर थे और अंतत: वह एक ऐसी सरकार के मुखिया बने जिसने एक खामीयुक्त व्यवस्था बनाई। सबसे रोचक मामला है वित्तीय सेवा सचिव का। मार्च में पद संभालने के बाद वह चयन प्रक्रिया में शामिल रहे, उसके बाद वह संशोधन के दौरान भी अपनी भूमिका निभाते रहे फिर अचानक उनका स्थानांतरण हो गया।

इसके बाद चयन समिति में स्वतंत्र विशेषज्ञों का भी मसला है। इन सभी का चयन सरकार को करना है। इसमें भी अंतिम तौर पर फैसला मंत्रिमंडल समिति का होगा जो सत्ताधारी राजनेताओं को मिलाकर बनती है। राजनीति को इस पूरी प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता है और देश के राजनीतिक दलों की अवस्था को देखकर यह कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में भी हमें एक ही तरह के राजनेताओं के साथ समय बिताना है। निर्वाचन आयोग द्वारा संसदीय चुनाव में हुए खर्च संबंधी वक्तव्य मांगे अरसा बीत गया लेकिन न तो कांग्रेस और न ही भाजपा ने अब तक उसकी बात मानी है। भाजपा ने बीती मई तक कर्नाटक विधानसभा के चुनावों के खर्च संबंधी दस्तावेज तक नहीं दिये थे जबकि ये गत वर्ष जुलाई में हुए थे। जाहिर है यह सारा वक्त हिसाब किताब में लग रहा है।

जिस व्यवस्था में चुनाव में काले धन की अहम भमिका हो उसमें राजनीतिक नेतृत्व से यह उम्मीद करना कितना सही है कि वह सरकारी बैंकों के नेतृत्व के लिए सक्षम और पेशेवर लोगों का चयन करेगा? विकास में इन बैंकों की भूमिका समाप्त हो गई है। वे वित्तीय समावेशन के नए लक्ष्य को हासिल करने में उतनी मदद नहीं कर सकते जितनी आरबीआई द्वारा बनाए गए नए बैंक, सूक्ष्म वित्त संस्थान और कारोबारी प्रतिनिधि कर सकते हैं। इन बैंकों को सरकारी बनाए रखने से यह सवाल पैदा होगा कि क्या राजग सरकार भी पिछली सरकार की तरह इनको राजनीतिक तौर पर लोगों को उपकृत करने का जरिया बनाए रखना चाहती है।

Keyword: NDA, BJP, bank, CMD,,
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