बिजनेस स?टैंडर?ड - ब्रांड बाजार में जलवा है बरकरार
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ब्रांड बाजार में जलवा है बरकरार
सायंतनी कर/ सोहिनी दास/मासूम गुप्ते/प्रवाल बसाक / नई दिल्ली October 06, 2014

लगभग पांच दशक के फिल्मी करियर के बाद अब अमिताभ बच्चन एक बड़े ब्रांड बन गए हैं, तो ललिताजी ऐसी शख्सियत हैं जिनका नाम आते ही उनसे जुड़े ब्रांड की यादें ताजा हो जाती हैं। बाजार में ऐंबेसडर जैसी कार भी आई, जो अपनी कंपनी से बड़ा ब्रांड बन गई और लोग इसे आज भी याद करते हैं। वहीं अमूल भी ऐसे ही ब्रांड के रूप में सामने आया जिसने देश के सहकारिता आंदोलन को नई दिशा दी। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने कुछ ऐसे ही खास ब्रांडों का जायजा लिया...

फिल्मों से ब्रांड बाजार तक का कामयाब सफर

भले ही अमिताभ बच्चन के अभिनय करियर की शुरुआत बहुत आसान नहीं रही हो लेकिन इसके उलट विज्ञापनों की दुनिया ने उन्हें हाथोंहाथ लिया है। हालांकि 70 के दशक से अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले बच्चन को इसके लिए 90 के दशक तक इंतजार करना पड़ा, जब विज्ञापन कंपनियों ने इस महानायक के करिश्माई व्यक्तित्व को अपने ब्रांड्स के लिए इस्तेमाल करने के बारे में सोचा। और तब से लेकर अभी तक बच्चन ने बेहद आसानी से विज्ञापनों में एक के बाद एक नया रूप धारण किया है, चाहे वह पियर्स ब्रॉसनन की जगह रीड ऐंड टेलर के विज्ञापन करना हो या फिर कैडबरी मिल्क के मीठे पल साझा करने के लिए मिस पालमपुर या राधा की तारीफ करने वाले ग्वाले की भूमिका हो। वह परिवार के किसी बड़े की भूमिका में नए माता-पिता को नवजात शिशुओं व बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स की दो बूंद पिलाने की सलाह देते हुए दिखे हैं और ऐसे दादा की भूमिका में भी दिखे हैं, जो चीनी की जगह डाबर हनी का इस्तेमाल करने की सलाह देता हुआ दिखता है।

जब 1973 में 'जंजीर' की रिलीज के साथ हिंदी फिल्मों ने रोमांस से हटकर क्राइम और थ्रिलर की श्रेणी में कदम रखा और बच्चन ऐंग्री यंग मैन बनकर पर्दे पर आए तो उस समय विज्ञापन की दुनिया भी अंग्रेजी से देसीपन की ओर कदम बढ़ा रही थी। बच्चन ने पहला विज्ञापन 1995 में बीपीएल के लिए किया था। इस विज्ञापन कैंपेन पर काम करने वाले धार ऐंड हून के सह-संस्थापक अजित हून बताते हैं, 'आर्थिक उदारवाद के बाद उस समय पैनासोनिक और सोनी भारत में कदम रख रहे थे। इसलिए बच्चन और बीपीएल के बीच समान बात थी आत्मविश्वास।' बीपीएल के तत्कालीन उपाध्यक्ष (ब्रांड मैनेजमेंट) संजय प्रभु बताते हैं, 'यह कॉर्पोरेट कैंपेन किसी खास उत्पाद को लेकर नहीं था।' प्रभु अब रेडियो इंडिगो की मालिक इंडिगो के प्रमुख हैं।  प्रभु बताते हैं, 'हम बीपीएल-वीडियोकॉन-ओनिडा सर्कल से निकलकर एक बहुराष्टï्रीय कंपनी के तौर पर पहचान बनाना चाहते थे। हमने बच्चन के साथ 6 करोड़ रुपये में करार किया था। यह उस समय एशिया में सबसे बड़ा करार था।'

व्यक्तित्व में बदलाव

नई सदी के साथ ही बच्चन के करियर में भी नया बदलाव आया। 1999 में बच्चन की कंपनी एबीसीएल ने दिवालियापन के लिए आवेदन किया और इस दौरान रिलीज हुई फिल्मों में बच्चन भी अपनी पहचान को लेकर संकट से जूझते नजर आए मानो उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि वह एक युवा व्यक्ति का किरदार निभाएं या फिर एक मध्य आयु वाले व्यक्ति का किरदार निभाएं। एक विशेषज्ञ कहते हैं, 'बच्चन भी उस स्तर का अभिनय नहीं कर रहे थे, जिनके लिए वह मशहूर हैं।' इस दौरान उन्होंने मेजबान के रूप में छोटे पर्दे का रुख किया और वर्ष 2000 में स्टार टीवी पर प्रसारित क्विज शो 'कौन बनेगा करोड़पति' ने बच्चन के करियर को नया जीवनदान दिया और बदलाव उनके प्रायोजनों में भी तुरंत दिखाई दिया। फ्यूचर ब्रांड्स इंडिया के एमडी एवं सीईओ संतोष देसाई कहते हैं, 'केबीसी ने उन्हें समानुभूति रखने वाले उम्रदराज व्यक्ति के तौर पर पेश किया। इसके साथ ही उनकी छवि एक युवा, गुस्सैल व्यक्ति के बजाय एक पितातुल्य व्यक्ति की बन गई, जो प्रगतिशील सोच रखने वाला हितैषी है।'

बच्चन के साथ काफी काम करने वाले ऑगिल्वी ऐंड मैदर के कार्यकारी चेयरमैन एवं क्रिएटिव डायरेक्टर (भारत और दक्षिण एशिया) पीयूष पांडेय कहते हैं, 'केबीसी के साथ लोगों को लगा कि उनके जैसे महान व्यक्तित्व वाला आदमी मुझसे बात कर रहा है और यह आज भी हो रहा है।' पीयूष पांडेय ने अमिताभ बच्चन के साथ यूनिसेफ के पोलियो अभियान, गुजरात पर्यटन, बिनानी सीमेंट, कैडबरी और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाले दूरदर्शन के  गीत 'मिले सुर मेरा-तुम्हारा' पर काम किया है। इसके बाद देश में अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश में जुटी कैडबरी और रीड ऐंड टेलर के अतिरिक्त पेप्सी, नेस्ले की मैगी और कई अन्य ब्रांड को बच्चन में अपना ऐंबेसडर नजर आया।  केबीसी के पहले सीजन के बाद ही पेप्सी ने बच्चन के साथ अपने करार का नवीकरण किया और उन्हें प्रमुख उत्पाद कोला पेप्सी का ब्रांड ऐंबेसडर बनाया।

1999 तक बच्चन पेप्सी के मिरांडा लेमन के प्रचार विज्ञापनों में छोटी सी भूमिका में उत्पाद की टैगलाइन जोर का झटका ही बोलते हुए नजर आते थे। लेकिन इस साल की शुरुआत में बच्चन ने एक विवाद शुरू कर दिया, जब उन्होंने पेप्सी के साथ अपना इतने साल पुराना रिश्ता खत्म कर दिया। बच्चन ने कहा कि यह विचार उनके जेहन में तब आया, जब एक छोटी सी बच्ची ने उनसे कहा कि यह एक हानिकारक उत्पाद हो सकता है।

रुतबा कायम है

पांडेय कहते हैं, 'बेहद ईमानदार और समझदार व्यक्तित्व वाले बच्चन पर आप भरोसा करना चाहेंगे।' चॉकलेट में कीड़े निकलने के विवादों के बाद जब कैडबरी की साख को नुकसान पहुंचा तो बच्चन ने स्क्रीन पर आकर लोगों से यह कहा कि अब उत्पाद में कुछ भी खराबी नहीं है और इसका असर भी हुआ। कैडबरी के प्रति लोगों का नजरिया रातोंरात बदल गया। यह जरूरी नहीं है कि ब्रांड ऐंबेसडर हमेशा उस उत्पाद का उपभोक्ता भी हो। पांडेय कहते हैं, 'रीड ऐंड टेलर के विज्ञापन में वह खुद एक उपभोक्ता थे लेकिन पोलियो के विज्ञापन में वह एक चिंतित बुजुर्ग के तौर पर दिखे। मैंने उनसे कहा था कि मैं उन्हें एक गुस्सैल बुजुर्ग के रूप में देखना चाहता हूं।'

सब कुछ अच्छा नहीं

बच्चन की लोकप्रियता को देखते हुए क्या ब्रांड बच्चन को जल्दी प्रसिद्घ होने के जरिये के तौर पर देखते हैं? पांडेय कहते हैं, 'कई बार ब्रांड गलती भी करते हैं और उन्हें गलत ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर आप उनके साथ काम कर रहे है तो आपको 10 गुना अधिक मेहनत करनी होगी क्योंकि वह हर पटकथा से लेकर बार बार शॉट देने और रिडबिंग करने के हर कदम पर सबसे बेहतर देना चाहते हैं।'  करार की अवधि के अनुसार यानी कि  काम एक दिन का है या दो दिन का या फिर दो साल का है, बच्चन सालाना 7 करोड़ रुपये से 12 करोड़ रुपये तक फीस लेते हैं।

आत्म-निर्भर बना अमूल

ढीले-ढाले कपड़ों में नजर आने वाली थोड़ी मोटी सी लड़की महज अमूल बटर की शुभंकर प्रतीक (मस्कट) नहीं है। यह अमूल गर्ल शहरी क्षेत्रों प्रवेश कर चुकी है और नियमित तौर पर समकालीन घटनाओं पर मुहावरों के माध्यम से चतुराई से  टिप्पणी करती हुई नजर आती है, जो उसके मातृ संगठन द्वारा आगे बढऩे के लिए किए गए संघर्ष को दर्शाती है। वर्ष 1946 में गुजरात के आणंद की पोलसन डेयरी के अत्याचार के खिलाफ राज्य में सहकारी आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जो कथित तौर पर बेहद कीमत पर किसानों से दूध खरीदती थी और उसे बंबई सरकार को बेचा करती थी। अमूल की शुरुआत की योजना काफी हद तक स्वर्गीय डॉ. वर्गीज (दिलचस्प रूप से अमूल गर्ल की रचना के 50 साल बाद उनकी मृत्यु हुई) ने बनाई थी।

डॉ. वर्गीज एक सरकारी कर्मचारी के रूप में एक डेयरी के प्रबंधन के लिए वर्ष 1949 में आणंद पहुंचे थे। वह वहां किसानों की मशीनरी की मरम्मत के लिए पहुंचे थे और वहां उन्होंने एक सहकारिता आंदोलन ऑपरेशन फ्लड के माध्यम से भारतीय डेयरी उद्योग में क्रांति ला दी। ये उन्हीं के प्रयास थे, जिसके चलते भारत दूध के सकल आयातक से दुनिया के दो शीर्ष दुग्ध उत्पादकों में शामिल हो गया। यही वजह है कि उस शख्स को 'मिल्कमैन ऑफ इंडिया' पुकारा गया, हालांकि उनका सामान्य सा नजरिया था और उन्होंने हजारों दुग्ध किसानों को केंद्रीय विपणन और गुणवत्ता नियंत्रण सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में कदम बढ़ाए थे।

इस प्रकार वर्ष 1973 में गुजरात के छह जिला सहकारी संगठनों द्वारा बनाए गए दुग्ध उप्पादों और दूध के विपणन के लिए गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ (जीसीएमएमएफ) की स्थापना हुई। जीसीएमएमएफ के मौजूदा प्रबंध निदेशक आर एस सोढी कहते हैं कि 40 साल पहले दुग्ध क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा अलग तरह की थी। उन्होंने कहा, '60 और 70 के दशक में भारत में दूध का उत्पादन कम था और वह इस मामले में आत्मनिर्भर नहीं था। दूध पाउडर का आयात किया जाता था। देश में प्रति व्यक्ति दूध की खपत 110 ग्राम से बढ़कर 300 ग्राम होने में लंबा वक्त लग गया।' हालांकि ब्रांडिंग की भी भूमिका रही है।

जब विशेषज्ञों ने कुरियन से कुछ सुझाए गए नामों में से ब्रांड का नाम चुनने के लिए कहा जो काफी हद तक विदेशी लग रहे थे तो उन्होंने सूझबूझ दिखाते हुए भारतीय नाम पर जोर दिया। इस प्रकार अमूल (जो तत्कालीन आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड का छोटा रूप था) का जन्म हुआ। अमूल महज एक दूध और मक्खन ब्रांड नहीं था, बल्कि यह जीसीएमएमएफ द्वारा बेचे जाने वाले उत्पादों के लिए अग्रणी ब्रांड बन गए थे।

अमूल गर्ल की रचना सिल्वेस्टर दाचुन्हा (दाचुन्हा कम्युनिकेशंस) ने पोल्सन डेयरी गर्ल का सामना करने के लिए की थी। एक मौसमी विपणक कुरियन ने कंपनी से मंजूरी मिलने का इंतजार किए बिना अमूल गर्ल के विज्ञापन जारी करने के लिए दाचुन्हा कम्युनिकेशंस की पर्याप्त स्वतंत्रता दी थी। सिल्वेस्टर के पुत्र राहुल दाचुन्हा की अगुआई वाली एजेंसी कहती है कि यह स्वतंत्रता आज भी बरकरार है और यही वजह है कि अमूल गर्ल दुनिया पर अपनी टिप्पणी करने में कभी देर नहीं करती है। जहां स्वर्गीय युस्टैक फर्नांडिज ने शुभंकर प्रतीक की रचना की थी, वहीं विज्ञापन और थिएटर क्षेत्र के बुजुर्ग भरत दाभोलकर ने इसके कई लोकप्रिय विज्ञापन तैयार किए थे।

पहली डेयरी कैरा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ जिसकी अमूल ने 1955 में स्थापना की थी, 1973 में जीसीएमएमएफ को सौंप दी गई। तब तक अमूल ब्रांड अस्तित्व में आ चुका था। ऑपरेशन फ्लड के पीछे कुरियन का इरादा किसानों का अपना ब्रांड तैयार करने का था, जिससे उन्होंने उत्पाद की गुणवत्ता के प्रति जिम्मेदारी और स्वामित्व का एहसास हो। यही वजह है कि राज्य संघों के पास अब अपने ब्रांड हैं, जिनमें कर्नाटक का नंदिनी, पंजाब का वेरका, राजस्थान का सारस और महाराष्ट्र का महानंदा शामिल है। ब्रांडिंग से किसान सहकारिता को व्यावसायिक मजबूती हासिल हुई और वे प्रतिस्पर्धा का सामना करने में कामयाब रहे।

आपूर्ति चेन चार वितरण चैनलों तक फैल चुकी है और आकर्षक मार्जिन के साथ मूल्य निर्धारण से यह सुनिश्चित हुआ कि संगठन नई उत्पाद श्रेणियों के लिए प्रयास कर सके और प्रतिस्पर्धा में अग्रणी बना रहे। अमूल अभी तक 10,000 डीलरों के नेटवर्क के माध्यम से 10 लाख खुदरा विक्रेताओं तक पहुंच बना चुकी है। जीसीएमएमएफ अब स्थानीय पहचान से आगे वैश्विक बनना चाहती है। ब्रांड अमूल 50 देशों में पहुंच चुका है। भारत में इसके 7,200 विशेष पार्लर हैं। हालांकि अमूल के लिए कुरियन के बाद चुनौती का सामना करना पड़ेगा। सेवानिवृत्ति के लंबे समय बाद भी कंपनी के कामकाज पर उनका प्रभाव नजर आता था। 33 लाख किसानों का वोट बैंक जीसीएमएमएफ के प्रमुख के लिए होने वाले विवाद की मुख्य वजह है। जिस तरह से विवादों से निबटा जाएगा, उसके आधार पर अमूल के भविष्य का निर्माण होगा।

ललिता जी और दाग

ऐसा शायद ही कभी देखने को मिलता है, जब कोई ब्रांड अपने अधिक मूल्य को अपनी खासियत बताए और उसे अन्य के मुकाबले उत्कृष्टïता का प्रमाणन भी। लेकिन दिलचस्प है कि देश के विज्ञापन जगत में एक मिसाल बन चुके इस विज्ञापन अभियान की शुरुआत कुछ इसी तरह हुई थी।

70 के दशक में डिटर्जेंट की दुनिया में काफी बदलाव आया और यह पहली बार था, जब भारतीय उपभोक्ताओं को 'सस्ती  चीज और अच्छी चीज'  के बीच का अंतर पता चला। और लोगों को यह अंतर बताया चमचमाती सफेद साड़ी पहने ललिता जी ने। एचयूएल के प्रमुख डिटर्जेंट ब्रांड सर्फ के लिए एलिक पद्मसी द्वारा बनाए गए इस विज्ञापन ने लोगों को 'महंगा' सर्फ खरीदने के फायदे बताए। यह अभियान 1969 में 'सस्ता' निरमा के लॉन्च और 'हेमा, रेखा, जया और सुषमा' की बढ़ती लोकप्रियता' के जवाब में बनाया गया था। इस तरह स्क्रीन पर आई 'ललिता जी', जो एक समझदार, स्वतंत्र और दूरदर्शी गृहिणी होने के साथ ही अपने बजट को लेकर बेहद सतर्क है लेकिन इसके लिए वह उत्पाद की गुणवत्ता से समझौता नहीं करती।

1959 में भारतीय बाजार में कदम रखने वाले सर्फ को  70 के दशक में पहली बार निरमा से चुनौती मिली। निरमा का दाम सर्फ की कीमत का एक तिहाई ही था। ललिता जी के इस तर्क से ब्रांड को फायदा हुआ लेकिन यह बहुत समय के लिए नहीं था क्योंकि इसके जवाब में निरमा ने दीपिका जी को उतार दिया। उन्होंने ग्राहकों को बताया कि वे निरमा सुपर को चुनें जो महंगे डिटर्जेंट से मिलने वाली गुणवत्ता और सफेदी कम दाम में दे रही है। इसके बाद डिटर्जेंट श्रेणी में युद्ध शुरू हुआ और अभी तक नए नए ब्रांड इस श्रेणी में कदम रख रहे हैं। 70 के दशक के इस विज्ञापन युद्घ के बाद सर्फ इस श्रेणी में अपना वर्चस्व बरकरार रखने में कामयाब रहा है, जिसने निरमा जैसे देसी ब्रांड और अपने वैश्विक प्रतिद्वंद्वी प्रॉक्टर ऐंड गैंबल (पीऐंडजी) के ब्रांड की चुनौती का सामना किया। पीऐंडजी ने भारत में काफी बाद में 1991 में डिटर्जेंट ब्रांड एरियल के साथ कदम रखा।

एरियल को प्रीमियम श्रेणी के डिटर्जेंट के तौर पर पेश किया। सर्फ को तुरंत इसका जवाब देना था और इस तरह सर्फ एक्सेल की शुरुआत हुई। इस श्रेणी में एक और वैश्विक ब्रांड के कदम रखने का मतलब था कि इस श्रेणी में अब बदलाव की बयार चल चुकी थी, न सिर्फ ब्रांड की संख्या बढऩे के मामले में बल्कि उत्पादों की खूबियां भी बदलेंगी। 90 के दशक की शुरुआत में कॉन्संट्रेट  और कीमत के लिहाज से किफायती पाउडरों ने भारतीय बाजार में कदम रखा। इसके जवाब में सर्फ एक्सेल ने एंजाइम तकनीक से लैस सर्फ अल्ट्रा बाजार में उतारा।  एक बार फिर सर्फ बिल्कुल नए उत्पाद और नए विज्ञापन अभियान के साथ आया। इस अभियान के तहत जो विज्ञापन पेश किए गए वे आज भी लोगों के जेहन में पुरानी यादें ताजा कर देते हैं 'दाग ढूंढते रह जाओगे।'

समसिका मार्केटिंग कंसल्टेंट्स के सीएमडी जगदीप कपूर कहते हैं, 'किसी भी उत्पाद की सफलता आखिरकार उसकी गुणवत्ता पर ही निर्भर होती है। लेकिन संचार के माध्यम से उत्पाद की खूबियों को प्रदर्शित करना हमेशा मुमकिन नहीं हो पाता है।' हालांकि एचयूएल और पीऐंडजी की जंग कितनी भी आक्रामक क्यों नहीं हो, लेकिन इन दोनों ब्रांड ने अपने प्रमुख ब्रांडों पर कोई आंच नहीं आने दी है।

...सर्वश्रेष्ठ टैक्सी की कहानी

हिंदुस्तान मोटर्स की ऐंबेसडर का 90 के दशक के मध्य तक भारतीय सड़कों पर वर्चस्व था, जिसे लाइसेंसराज के संरक्षणवाद के बड़े प्रतीकों में से एक माना जाता था। इससे इस ब्रांड के प्रति भारत की कई पीढिय़ों की यादों का पता चलता है। लाइसेंसराज खत्म होने के लगभग दो दशक के बाद इस गाड़ी का विनिर्माण मई 2014 में पूरी तरह से बंद हो गया।

40 साल पहले ऐंबेसडर कलकत्ता मुख्यालय वाली सी के बिड़ला समूह की कंपनी का प्रमुख उत्पाद हो गई थी। इसे उस समय ब्रिटेन की मॉरिस ऑक्सफोर्ड की तकनीक से बनाया गया था और 70 के दशक तक आते-आते ऐंबेसडर 20वें साल में प्रवेश कर गई थी। हिंदुस्तान मोटर्स के उत्तरपाड़ा (पश्चिम बंगाल) संयंत्र में इसका विनिर्माण शुरू हुआ था और उस समय कंपनी का एकाधिकार हुआ करता था। उसे वर्ष 1964 में प्रीमियर पद्मिनी से पहली चुनौती मिली। जल्द ही ऐंबेसडर रईस भारतीयों के लिए शान की बात हो गई थी और सफेद ऐंबेसडर के माध्यम से सरकारी प्रभाव की झलक मिला करती थी।

भारी भरकम ऐंबेसडर, टैंक जैसा आकार ऊबड़-खाबड़ सड़कों के लिए खासी मुफीद थी और पूर्व में प्रचार के लिए तैयार किया गया स्लोगन 'व्हील्स ऑफ इंडिया' उसके ऊपर सटीक बैठता था। उसकी खामियां (विशेषकर माइलेज) तब जाहिर होने लगीं, जब 80 के दशक में मारुति सुजूकी की मारुति 800 का भारतीय बाजार में प्रवेश हुआ और 90 के दशक में उदारीकरण के बाद उसका पूर्ण आगाज हो गया था। मजे की बात है कि बदलाव की जरूरत महसूस करने वाली हिंदुस्तान मोटर्स पहली कंपनी थी, जिसने 90 के दशक के मध्य में गुजरात के हलोल संयंत्र में जनरल मोटर्स के साथ उसके वाहनों के विनिर्माण के लिए करार किया था। 70 और 80 के दशक में ऐम्बेसडर के एकाधिकार के कारण हिंदुस्तान मोटर्स शेयर बाजार की पसंदीदा बनी हुई थी। उन दिनों स्टॉक ब्रोकर इसके शेयर को 'मोटर गरम' कहकर पुकारा करते थे।

ऐंबेसडर में किए जा रहे बदलाव बाजार के साथ कदमताल के लिए पर्याप्त नहीं थे। वर्ष 1975 में फेसलिफ्ट के साथ, नई खास लाइट, एक नंबर प्लेट सहित कई बदलाव किए गए। हिंदुस्तान मोटर्स ने इसे विज्ञापनों के माध्यम से बड़े परिवार की कार के रूप में प्रचारित किया। कंपनी मौजूदा ग्राहकों के लिए नई योजनाएं लेकर आई और पुरानी कार के बदले मार्क-3 पहचान वाली कार की पेशकश की। 80 के दशक में ऐंबेसडर की सालाना बिक्री 24,000 वाहनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।

70 के दशक में हिंदुस्तान मोटर्स ने पड़ोसी देशों को कार निर्यात करना शुरू किया। 1970 के दशक के अंत तक ऐंबेसडर की बाजार हिस्सेदारी लगभग 70 फीसदी रही थी।  तत्कालीन आर्थिक सलाहकार और हिंदुस्तान मोटर्स के उपाध्यक्ष एन दास ने एक परिशिष्ट में ऐंबेसडर की सफलता पर कहा, 'हिंदुस्तान मोटर्स को यह देखकर गर्व महसूस होता है कि सड़कों पर उसकी 3,60,000 कारें और ट्रक दौड़ रहे हैं, जिससे 20 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिल रहा है।' हालांकि ब्रांड की सफलता समय के साथ कम होने लगी।

भारत का नया अमीर मध्यम वर्ग 90 के दशक के अंत में पहली कार खरीदने के लिए कार बाजार में प्रवेश करने लगा था। जहां ऐंबेसडर के लिए कोई मौका नहीं था। बीएस-4 उत्सर्जन मानकों को अपनाने में देरी से कंपनी बड़े शहरों में कार बेचने से वंचित हो  गई थी। 1995 में हिंदुस्तान मोटर्स सालाना 18,000 ऐंबेसडर बेच रही थी। बीते साल उसने लगभग 2,214 गाडिय़ां बेची थीं। 1984 से 1991 के बीच ऐंबेसडर की बाजार हिस्सेदारी में 20 फीसदी की कमी आ चुकी है।

हालांकि 90 के दशक के अंत तक यह सरकारी गाड़ी का पर्याय थी। यह अटल बिहारी वाजपेयी थे, जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री के रूप में इसे हटाकर बीएमडब्ल्यू का इस्तेमाल शुरू कर दिया। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कार्यभार संभालने के बाद मर्सिडीज बेंज एस600 में सवार होने से पहले इसके प्रति अपने लगाव को जाहिर किया था। इतिहास बनने के बाद भी ऐंबेसडर के लिए कुछ सांत्वना की बातें भी हैं। 2013 में उसने मर्सिडीज ई-क्लास, फोक्सवैगन की बीटल सहित कई कारों को पछाड़ते हुए बीबीसी प्रसारित होने वाले लोकप्रिय वाहन कार्यक्रम में 'दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टैक्सी' का पुरस्कार हासिल हुआ।

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