बिजनेस स्टैंडर्ड - अब राजग सरकार का पर्यावरण से जुड़ा इम्तिहान
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, October 15, 2019 05:28 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

अब राजग सरकार का पर्यावरण से जुड़ा इम्तिहान
सुनीता नारायण / नई दिल्ली August 25, 2014

इन दिनों राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार जिस तरह देश के पर्यावरण से संबंधित नियामकीय ढांचे को तोडऩे में जुटी है, उससे देश के पर्यावरणविदें का चिंतित होना एकदम जायज है। पिछले दो महीनों में मीडिया में लगातार खबरें आ रही हैं कि खनन से लेकर सड़क तक सभी परियोजनाओं में तेजी आ गई है। हालांकि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की वेबसाइट को अगस्त में अपडेट नहीं किया गया है। मगर जुलाई के अंत तक के दो महीनों के दौरान 92 से भी अधिक परियोजनाओं को वन संबंधी मंजूरी दी गई और इस तरह करीब 1,600 हेक्टेयर जंगल को परियोजनाओं के हवाले कर दिया गया। हाल में इस तरह की खबरें आई हैं कि राष्ट्रीय वन्यजीवन बोर्ड ने अभयारण्यों और राष्ट्रीय पार्कों के भीतर या आसपास मौजूद कई परियोजनाओं के लिए भी रास्ता साफ कर दिया है।

इसके अलावा मंजूरी की प्रक्रिया तेज करने के मकसद से नियमों में भी बदलाव किया जा रहा है। यह काम मुख्य रुप से दो तरीकों से किया जा रहा है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा अपनाया जा रहा पहला तरीका यह है कि प्रक्रिया को आसान बनाने के नाम पर जितना संभव हो सके फैसले लेने के अधिकार राज्य सरकारों को सौंपे जा रहे हैं। कुछ खास परियोजनाओं को मंजूरी देने के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना में संशोधन करके इसके अधिकार राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) प्राधिकारियों को सौंप दिए गए हैं। अहम बात यह है कि यह सबकुछ यह जानते हुए किया जा रहा है कि राज्यस्तरीय एजेंसियों के पास न केवल क्षमता का अभाव है बल्कि जवाबदेही की भी भारी कमी है। इसलिए कोशिश यह है कि परियोजनाओं के विपरीत प्रभावों के बारे में जानकारी परक फैसले न लिए जाएं। सारी कोशिश मंजूरी देने के तंत्र से छुटकारा पाने या कम से कम जितना संभव हो सके इसे दूर ढकेलने की है।

दूसरा तरीका यह है कि जहां कहीं भी संभव हो जन सुनवाई आयोजित करने या ग्राम सभाओं की मंजूरी लेने के प्रावधानों को हल्का कर दिया जाए या फिर हटा दिया जाए। उदाहरण के लिए छोटी कोयला खदानों जिनमें सालाना 80 लाख टन का उत्पादन हो सकता है, को अनिवार्य जनसुनवाइ्र्र के बगैर अपनी क्षमता बढ़ाकर दोगुनी करने की अनुमति दे दी गई। कुछ और परिवर्तनों का प्रस्ताव है जिससे यह शर्त और कमजोर हो जाएगी जिसके प्रभावित समुदायों की मंजूरी लेने या कम से कम उनकी चिंताओं को सुनने की अनिवार्यता है। जाहिर है लोगों की बात सुनना उद्योग को कभी भी रास नहीं आता है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पिछली संप्रग सरकार के दौरान भी पर्यावरण कोई बहुत सुरक्षित नहीं था। अभी जैसे ही हालात तब थे। पर्यावरण की चिंताओं को लेकर बहुत कम (3 फीसदी से भी कम) परियोजनाओं को खारिज किया गया या मंजूरी में देर की गई। पूरा तंत्र छल कपट और बाधा डालने के लिए बनाया गया था न कि किसी जांच या पर्यावरण नुकसान के आकलन के लिए। नियमों को इतना पेचीदा बना दिया गया कि वे निरर्थक हो गए। प्रकिया इतनी जटिल थी कि उस परियोजना के लिए पांच से सात ऐसी एजेंसियों की मंजूरी की जरूरत थी जिनका अपनी ही शर्तों के पालन में कोई दिलचस्पी नहीं थी।

कुछ-कुछ इसी तरीके पर केंद्र की भाजपा सरकार भी चल रही है और इस मामले में पिछली कांग्रेस सरकार की नीति को ही अपना रही है। फर्क इतना है कि वह कोई दिखावा नहीं कर रही है। इस बीच सरकार ने पर्यावरण मंजूरी की व्यवस्था को बेहद जटिल बना दिया था, नतीजा यह हुआ कि उसने काम करना ही बंद कर दिया था। उसकी सुधार में भी कोई दिलचस्पी नहीं थी और न ही उसने नियामकीय एजेंसियों के सामथ्र्य को मजबूत करने में कोई इच्छा ही दिखाई थी। आज 10 साल बाद भी देश के प्रदूषण नियंत्रण मंडल भारी उपेक्षा के शिकार हैं और उनमें जरूरत लायक स्टाफ भी नहीं है। निश्चित ही पिछली सरकार की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी कि पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे, इसके लिए परियोजनाओं के प्रदर्शन की सख्त निगरानी की जाए। यह एक तथ्य है कि परियोजनाओं पर नियमों को लागू करने के आकलन की कोई क्षमता मौजूद नहीं है।

लिहाजा, इस बात की निगरानी का कोई तरीका नहीं है कि पर्यावरण की शर्तों का पालन किया जा रहा है। यह भी एक तथ्य है कि अनुपालन सुनिश्चित करने के कायदे-कानून इतने कमजोर हैं कि पर्यावरण को होने वाले नुकसान की जांच ही नहीं हो पाती है। यह दुखद सच्चाई है कि पिछले पर्यावरण मंत्रियों ने मौजूद व्यवस्था में सुधार को कोई तवज्जो नहीं दी क्योंकि उनके लिए इसी व्यवस्था में नियंत्रण करना और इस तरह अपना अधिकार जमाए रखना ज्यादा आसान था। मौजूदा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की असल परीक्षा अब है।

नियामकीय निगरानी की जरूरत पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। प्राकृतिक संसाधनों के सक्षम और टिकाऊ प्रबंधन की पहली शर्त पर्यावरण मंजूरी की व्यवस्था है। साथ ही इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक विकास के प्रतिकूल प्रभाव कम से कम हों और उनका प्रबंधन संभव हो। इसके अलावा कारगर व्यवस्था से उद्योग को भी अपने निवेश के भावी जोखिम का प्रबंध करने में भी मदद मिलती है। यह गैर-जरूरी या असुविधाजनक नहीं है। इसे हटाया नहीं जा सकता।

लेकिन राजग सरकार जिस तरह के कदम उठाकर परिवर्तन कर रही है उससे वह व्यवस्था को और विकृत और विखंडित कर रही है जिससे यह पूरा तंत्र बेहूदा और अप्रभावी हो जाएगा। नतीजा यह होगा कि इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। सवाल यह है कि क्या इससे परिवर्तन होगा? क्या हमारे नए पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर मौजूदा खराब प्रणाली को बरकरार रखेंगे या फिर वास्तविक परिवर्तन के लिए वाकई इसमें कुछ बदलाव करेंगे?

Keyword: NDA, environment,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या ग्रामीण क्षेत्र में बिक्री घटने से एफ एमसीजी फर्मों को होगी मुश्किल?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.