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दो फैसलों की बदौलत हम हुए दो कदम पीछे
कनिका दत्ता / नई दिल्ली August 14, 2014

एक दिग्गज सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी के प्रमुख ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि भारत दुनिया का शायद इकलौता देश होगा, जहां लोग पिछड़ा दर्जा हासिल करने के लिए धरना-प्रदर्शन करते हैं। उनका इशारा जाट, गुर्जर और मीणा व अन्य समुदायों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों की ओर था, जो पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में मिलने वाले लाभ हासिल करने के लिए ऐसा कर रहे थे। उनका कथन हाल के दो घटनाक्रम पर भी लागू होता है। पहला विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में व्यापार सरलीकरण समझौते (टीएफए) पर हस्ताक्षर करने में भारत द्वारा दिखाया गया अक्खड़पन और दूसरा लोक सेवा आयोग के परीक्षा पत्र से अंग्रेजी अवबोधन (इंग्लिश कॉम्प्रीहेंसन) के अंकों को शामिल नहीं करने का फैसला है।

टीएफए पर हस्ताक्षर करने से इनकार की बात हो या फिर विकास की दौड़ में काफी पिछड़े हुए दो राज्यों से ताल्लुक रखने और भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रहे मु_ïी भर छात्रों की ओर से अंग्रेजी के विरोध में हुए प्रदर्शन के सामने सरकार का आत्मसमर्पण करना, ऐसे दो मामले हैं, जो कहीं से भी भारत के हित में नहीं हैं। और न ही यह फैसला लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा समाज के निचले तबके से ऊपर उठने की चाह रखने वाले उन महत्त्वाकांक्षी युवाओं से किए गए वादे को पूरा करता है।

डब्ल्यूटीओ के तर्क के अनुसार टीएफए में ऐसे प्रावधान हैं 'जो व्यापार सरलीकरण और सीमा शुल्क अनुपालन नियमों पर सीमा शुल्क एवं अन्य संबंधित विभागों के बीच प्रभावी सहयोग बढ़ाकर सीमा प्रक्रियाओं को तेज और ज्यादा सक्षम बनाता है।' यह बात किसी भी निर्यातक के कानों को संगीत से कम नहीं लगेगी, जिन्हें अपने उत्पाद निर्यात करने के लिए नियमित रूप से बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर कई सारी प्रक्रियाओं से जूझना पड़ता है।

इन प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार की असीमित संभावनाएं होती हैं। हर सरकार इस बात से वाकिफ होती है कि कैसे इन भ्रष्टाचार से लिप्त प्रक्रियाओं के कारण वैश्विक स्तर पर लागत ढांचे और उत्पादकता की ही तरह भारतीय निर्यात की क्षमता प्रभावित हो रही है। तो जाहिर है कि देशभक्ति की पैरवी करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार को तो कम से कम इन प्रक्रियाओं को सुचारु बनाने के महत्त्व को समझना चाहिए। प्रधानमंत्री को कारोबारी जगत में उनके प्रशंसकों से सीख लेनी चाहिए थी। जब वैश्विक स्तर पर कारोबार करने के लिए आईएसओ जैसे अंतरराष्ट्रीय मानक और इसके संस्करण अनिवार्य हो गए तो ज्यादातर कंपनियों ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अपनी कमर कसी और प्रमाणन हासिल करने के लिए अपनी प्रक्रियाओं को आसान बनाया। 1990 में जब शुल्क की अड़चनें आने लगी तो भारतीय उद्योग ने थोड़ी शिकायत की लेकिन व्यापक स्तर पर इसने संरक्षण के कुतर्क को अच्छी तरह समझा और खुद को वैश्विक मानकों के अनुरूप  बनाना शुरू किया। क्या यह महज संयोग है कि  उदारीकरण के बाद से अभी तक सबसे ज्यादा रोजगार सृजन निजी क्षेत्र में ही हुआ है।

यह कोई नहीं कह रहा कि सरकार को भी निजी क्षेत्र की तरह मुनाफे पर अधिक जोर देना चाहिए। कृषि व खाद्य सब्सिडी को लेकर मौजूदा सरकार की चिंता भी वाजिब है। लेकिन 80 के मध्य के दशक से लेकर अभी तक केंद्र में जितनी भी सरकारें आई हैं वे सभी इन सब्सिडी के प्रबंधन में मौजूद भ्रष्टाचार की खामियों से अच्छी तरह वाकिफ रही हैं। यह समझने के लिए किसी बहुत बुद्घिमान व्यक्ति की जरूरत नहीं है कि इन सब्सिडी का फायदा कभी-कभार ही वास्तव में हाशिए पर पड़े किसानों और गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे जरूरतमंदों तक पहुंच पाता है। उत्पादक सब्सिडी पर पाबंदी लगाकर आपूर्ति व्यवस्था में मौजूद खामियों को दुरुस्त करने का बेहतरीन अवसर था और इसके बावजूद यह व्यवस्था डब्ल्यूटीओ के नियमों के अनुरूप ही रहती।

प्रशासनिक सेवा परीक्षा में से सीसैट हटाने के बारे में काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है और इसलिए यहां वहीं बातें लिखने का कोई मतलब नहीं है। सही सोचने वाला हर भारतीय, उच्च वर्ग से संबंधित या कोई अन्य इस बेतुकेपन को अच्छी तरह समझ सकता है कि पूरी दुनिया जिस भाषा को सीखने की कोशिश में लगी है, हमारे देश के अफसरशाह उस वैश्विक भाषा में ठीक से बात तक करने योग्य नहीं हों।

'सीईओ' की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को इसका जवाब भारतीय उद्योग जगत के उदाहरणों से ही मिलेगा, जिनके यहां अधिकारियों को अंग्रेजी का ज्ञान होना अनिवार्य है, जिससे उन्हें दुनिया में कहीं भी नियुक्त किया जा सके। लार्सन ऐंड टुब्रो के ए एम नाइक ने एक बार मुझे बताया था कि कैसे मुकंद आयरन ऐंड स्टील के एक इंजीनियरिंग प्रोग्राम का आवेदन फॉर्म भरने में उन्होंने कितनी सारी गलतियां की थीं। जब उन्हें अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए कहा गया तो एक गांव के स्कूल से पढ़ाई करने वाले नाइक ने वैसा ही किया। उन्होंने अंग्रेजी बोलना सीखने के लिए कैसेट खरीदी और शीशे के सामने घंटों खड़े होकर अंग्रेजी बोलने का अभ्यास किया। एक विदेशी मालिकाना हक वाली कंपनी में शीर्ष स्तर पर पहुंचने में जितना योगदान उनकी क्षमता और कार्य के प्रति उनके लगाव का है, उतना ही उनकी कार्यकुशल अंग्रेजी का भी।

कुछ ही अधिकारी अपनी देशभक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं और नाइक उनमें से एक हैं। उनकी टाई पर हमेशा तिरंगे का बैज लगा होता है। लेकिन वह भी उस भाषा को सीखने के महत्त्व को अच्छी तरह समझते हैं, जिसमें दुनिया बात कर रही है। इसलिए बेहद राष्टï्रवादी रवैया रखने वाले हमारे विधि निर्माता भी सीसैट को एक अवसर के रूप में इस्तेमाल कर सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी की पढ़ाई अनिवार्य बना सकते हैं। या फिर इसे दूसरे नजरिये से देखा जाए तो ऐसा भी कहा जा सकता है कि सबसे अच्छे रोजगार के अवसरों को सिर्फ अंगे्रजी बोलने वाले कुलीन वर्ग के लिए ही क्यों छोड़ा जाए।

Keyword: WTO, india, TFA,,
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