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राजनीति में उलझी धर्म की अर्थनीति
वीनू संधू / नई दिल्ली August 11, 2014

हरियाणा के गुरुद्वारों का नियंत्रण शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से छीनने की कोशिश क्यों की गई? इसके जवाब तलाश रही हैं वीनू संधू

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में छहवीं पातशाही गुरुद्वारे के बाहर पड़ी खाली जगह 6 अगस्त को जंग के मैदान में तब्दील होती दिखी। हरियाणा के गुरुद्वारों पर दावा ठोक रही नई-नवेली संस्था हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी (एचएसजीएमसी) के समर्थक उस दिन लाठी-डंडे और तलवारें लेकर पुलिस से भिड़ गए थे। पुलिस उन्हें गुरुद्वारे में घुसने से रोकने की जीतोड़ कोशिश कर रही थी क्योंकि उस ऐतिहासिक धर्मस्थल के भीतर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की हथियारबंद 'टास्क फोर्स' भी धावा बोलने के लिए तैयार खड़ी थी। यह टास्क फोर्स उस अधिकार को बचाने के लिए खून बहाने पर आमादा थी, जो बरसों से एसजीपीसी के पास है यानी सिखों के सभी महत्त्वपूर्ण तीर्थों का प्रबंधन और वित्तीय कामकाज। हालांकि उसी दिन एचएसजीएमसी कैथल और यमुनानगर के महत्त्वपूर्ण गुरुद्वारों की बागडोर एसजीपीसी के हाथ से छीनने में कामयाब हो गई थी।

पिछले महीने भर में जब से हरियाणा विधानसभा में एचएसजीएमसी के गठन का विधेयक पारित हुआ है और उसे हरियाणा के सभी गुरुद्वारों का प्रबंधन संभालने का अधिकार मिल गया है, एक नया संघर्ष छिड़ गया है। पंजाब से ट्रकों में भर-भर कर एसजीपीसी के समर्थक हरियाणा के गुरुद्वारों में भेज दिए गए हैं। (एसजीपीसी का मुख्यालय अमृतसर में है जो सिखों के लिए छोटी धार्मिक संसद की तरह है।) एचएसजीएमसी के समर्थकों ने उनके खिलाफ जीत के लिए ताकत से लेकर कानून तक हर दांव आजमाया है। असल में यहां मामला केवल धार्मिक स्थलों के नियंत्रण का नहीं है बल्कि इसमें धर्म, सियासत और दौलत का गठजोड़ है।

अभी तक एसजीपीसी हरियाणा में 52 गुरुद्वारों का काम संभालता था, जिनमें आठ ऐतिहासिक महत्त्व के थे और उनकी सालाना कमाई करोड़ों रुपयों में थी। 17 गुरुद्वारों को सालाना 20 लाख रुपये से ज्यादा कमाई होती थी और बाकी गुरुद्वारों में हर साल 20 लाख रुपये से कम आते थे। हालांकि गुरुवार को इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने यथास्थिति बरकरार रखने के आदेश दिए। आदेश के मुताबिक एचएसजीएमसी के कब्जे में आ चुके गुरुद्वारे उसके ही पास रहेंगे और बाकी पर एसजीपीसी का नियंत्रण रहेगा। ऐतिहासिक गुरुद्वारों की कमान एसजीपीसी के पास है और उसमें कोई स्थानीय दखल नहीं है।

ऐतिहासिक गुरुद्वारे 82 हैं, जिनमें ज्यादातर पंजाब में हैं। बाकी धर्मस्थलों को एसजीपीसी के निर्देशन में स्थानीय समितियां संभालती हैं। प्रत्येक गुरुद्वारा अपनी सालाना कमाई का 30 फीसदी हिस्सा एसजीपीसी को देता है, जिसमें से 10 फीसदी धर्म प्रचार, 10 फीसदी शिक्षा (एसजीपीसी करीब 95 सहायता प्राप्त और गैर सहायता प्राप्त स्कूल-कॉलेज चलाती है) और बाकी दस फीसदी दसवंद (समुदाय के लिए दसवां हिस्सा) के लिए होता है। बाकी 70 फीसदी रकम से गुरुद्वारा अपना काम चलाता है। इसमें से ज्यादातर रकम लंगर और कर्मचारियों के वेतन पर खर्च हो जाती है।

एसजीपीसी का दावा है कि वर्ष 2013-14 में हरियाणा के सभी गुरुद्वारों ने कुल 32.04 करोड़ रुपये कमाए। हालांकि ये अंतिम आंकड़े नहीं हैं क्योंकि बहीखाते अभी चल रहे हैं। एसजीपीसी के मुताबिक उस साल गुरुद्वारों ने उसे 6.77 करोड़ रुपये दिए। उसका कहना है कि वर्ष 2009-10 से 2013-14 के बीच हरियाणा के गुरुद्वारों ने उसे कुल 35.80 करोड़ रुपये दिए, जिसमें से उसने 31.27 करोड़ रुपये उन्हीं गुरुद्वारों तथा हरियाणा में अपने संस्थानों पर खर्च कर दिए। एसजीपीसी के एक अधिकारी ने बताया कि समिति हरियाणा में करीब 150 से 170 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को अपने ही खजाने से धन मुहैया करा रही है।

एचएसजीएमसी के सदस्य इन दावों को भाव नहीं देते। एचएसजीएमसी के अध्यक्ष (तदर्थ) जगदीश सिंह जिंदा कहते हैं, 'एसजीपीसी के पूर्ण नियंत्रण वाले गुरुद्वारों में पारदर्शिता की कमी है। यहां लेखा समेत सभी प्रमुख पदों पर एसजीपीसी के ही लोग हैं।' चूंकि ढेर सारी नकदी आती है, इसलिए धन का सही हिसाब पता करना नामुमकिन है। जिंदा कहते हैं, 'गोलक भी एसजीपीसी के कर्मचारी ही खोलते हैं।' एचएसजीएमसी के अन्य सदस्यों की ही तरह जिंदा को भी लगता है कि पिछले पांच साल में हरियाणा के गुरुद्वारों ने एसजीपीसी को 180 से 200 करोड़ रुपये दिए, जो एसजीपीसी के दावों से पांच गुना अधिक हैं।

उनका आरोप है कि हरियाणा के लिए अलग प्रबंधक संस्था बनाने के पीछे वित्तीय अनियमितता एक बड़ा कारण था। वह कहते हैं, 'कैथल में नीम साहिब गुरुद्वारे और कुरुक्षेत्र के पेहोआ में मांजी साहिब गुरुद्वारे को ही देख लीजिए, जिसमें एचएसजीएमसी के समर्थक काम करते हैं। उनकी औसत सालाना कमाई अब 65 लाख रुपये से ऊपर पहुंच चुकी है। 2006 तक इन पर एसजीपीसी समर्थकों का कब्जा था और तब इनका सालाना चंदा 4-5 लाख रुपये ही दिखाया जाता था।' हरियाणा सरकार भी इस दावे को सही बताती है। एचएसजीएमसी विधेयक का मसौदा तैयार करने वाले मंत्री रणदीप सिंह सुरजेवाला का आरोप है, 'गोलक से रकम उड़ाई जा रही है क्योंकि हरियाणा के गुरुद्वारे एसजीपीसी के ही हाथ में हैं। भगवान ही जानता है कि कितनी रकम उड़ा ली गई है।'

एसजीपीसी के अध्यक्ष अवतार सिंह मक्कड़ इन आरोपों को खारिज करते हैं। मक्कड़ कहते हैं, 'प्रत्येक गुरुद्वारे के वित्त की आंतरिक ऑडिटिंग की जाती है। इसके बाद खाते हमारे पास आते हैं। हमारे आंतरिक लेखापरीक्षक बहीखाता बनाते हैं और सदस्य साल का बजट तैयार करते हैं।' वर्ष 2014-15 के लिए एसजीपीसी का व्यय बजट 905 करोड़ रुपये था जो पिछले साल से 99 करोड़ रुपये ज्यादा था। करीब 1,000 करोड़ रुपये की कमाई के साथ एसजीपीसी के पास करीब 100 करोड़ रुपये का अधिशेष बचा था। मक्कड़ ने बताया कि आंतरिक ऑडिट के बाद पंजाब सरकार द्वारा अधिकृत लेखापरीक्षक खातों की जांच करते हैं। एसजीपीसी के स्वतंत्र सदस्य हरदीप सिंह ने बताया, 'फिर भी पारदर्शिता की कमी है और बेईमानी की संभावनाएं तब तक बरकरार रहेंगी जब तक स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी नहीं होती। जिस वक्त गोलक खोला जाए उस वक्त भक्तों की मौजूदगी वहां होनी चाहिए। एसजीपीसी नियंत्रित गुरुद्वारों का प्रबंधन की तुलना में स्थानीय गुरुद्वारों का प्रबंधन कहीं अधिक पारदर्शी है।'

एसजीपीसी के आंतरिक लेखाकार एस एस कोहली को लेकर भी कुछ विवाद है जिनकी सेवाएं समिति द्वारा निलंबित किए जाने के एक दिन बाद ही उन्हें बहाल कर दिया गया। कई पंथी नेताओं का कहना है कि नियमों की अनदेखी इसलिए की गई क्योंकि लेखाकार पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल के करीबी हैं। एसजीपीसी के वरिष्ठïतम कर्मचारियों का मासिक वेतन 60,000 रुपये से भी कम है, लेकिन चार्टर्ड अकाउंटेंट को 7.66 लाख रुपये मासिक दिए जाते हैं। कोहली की फर्म 82 गुरुद्वारों, 100 से अधिक शैक्षणिक और अन्य एसजीपीसी संचालित संस्थानों के साथ श्री गुरु रामदास मेडिकल कॉलेज और श्री गुरु ग्रन्थ साहिब सिख विश्वविद्यालय की भी देखभाल करती है। यह भी आरोप है कि एसजीपीसी की बड़ी परियोजनाओं के लिए भी उनकी सलाह ली गई।

कोहली ने इस बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री, हरसिमरत कौर बादल इन आरोपों को सिरे से खारिज करती हैं। सुखबीर बादल की पत्नी और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की पुत्रवधू हरसिमरत कहती हैं, 'उनके पास 182 संस्थानों की देखभाल करने के लिए 30 अकाउंटेंटों की एक टीम है। अगर आप गणना करें तो प्रत्येक संस्थान के लिए दिया जाने वाला शुल्क करीब 4,300 रुपये था।' इसके अलावा उन्होंने कहा कि अपनी नियुक्ति के बाद से कोहली एसजीपीसी के खर्च को कम करने और गोलक से प्राप्त होने वाले धन को बचाने में सफल रहे हैं।

अकाली दल खासतौर पर बादल परिवार हमेशा से एसजीपीसी के कामकाज से जुड़ा रहा है। प्रकाश सिंह बादल खुद को सिखों का सबसे बड़ा नेता मानते हैं और उनकी राजनीति सिखों की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था एसजीपीसी से जुड़ी हुई है। अकाली दल गुरुद्वारा चुनाव आयोग द्वारा कराए जाने वाले एसजीपीसी चुनावों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेता है। कुल 120 निर्वाचन क्षेत्रों से 170 सदस्यों का चुनाव होता है और अतिरिक्त 15 सदस्य विभिन्न राज्यों से नामित किए जाते हैं। हरसिमरत कहती हैं, 'हरियाणा से 11 सीटें थी और सभी सीटें अकालियों ने जीती थीं।' वह पूछती हैं, 'ऐसे में खुद चुनाव हार चुके जिंदा जैसे लोग सिखों के प्रतिनिधित्व का दावा कैसे कर सकते हैं, जिन्हें सिखों ने ही नहीं चुना?' एसजीपीसी के एक सदस्य कहते हैं, 'अकालियों के दो संविधान है, एक में वे खुद को पंथी दल बताते हैं और दूसरे में धर्मनिरपेक्ष दल बताते हैं।'

हरसिमरत बादल कहती हैं, 'यह छठे गुरु गुरु हरगोबिंद द्वारा मीरी पीरी का सिद्घांत है। मीरी से आशय राजनीतिक शक्ति से है जबकि पीरी आध्यात्मिक शक्ति से संबंधित है। इसका मतलब है कि राजनीति कीजिए, लेकिन शासन धर्म के बताए गए सिद्घांतों के आधार पर कीजिए।' वह एचएसजीएमसी के गठन को गैर कानूनी करार देती हैं क्योंकि उनका कहना है कि एसजीपीसी को अंतर राज्यीय संस्था का दर्जा दिया गया है। इसके चरित्र में किसी भी तरह का बदलाव एसजीपीसी के दो-तिहाई बहुमत से या फिर संसद में एक कानून बनाकर ही किया जा सकता है।  अकाली एचएसजीएमसी के गठन को अगले तीन महीनों में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों के चलते सिखों को लुभाने के लिए कांग्रेस की ओर से चली गई चाल के तौर पर देख रही है। दशकों तक कांग्रेस एसजीपीसी के जरिये सिखों पर अकालियों की पकड़ को कमजोर करने की कोशिश करती रही है। इंदिरा गांधी ने भी ऐसा प्रयास किया था। पहले पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी ऐसी कोशिशें कीं और अब भूपेंद्र सिंह हुड्डïा नीत हरियाणा की कांग्रेस सरकार भी इस दिशा में आगे बढ़ रही है। 

सुरजेवाला एचएसजीएमसी के कानूनी पक्ष की ओर जोर देते हैं। 1 नवंबर, 1966 को संयुक्त पंजाब प्रांत को पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश तीन राज्यों और संघ शासित चंडीगढ़ में विभाजित किया गया। सुरजेवाला ने कहा, 'पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धारा 72 (1) और (3) के मुताबिक नए राज्यों को विभिन्न मामलों के साथ ही गुरुद्वारा अधिनियम 1925 के तहत बनाई गई एक अलग एसजीपीसी स्थापित करने को लेकर अलग कानून बनाने का अधिकार दिया गया था।' एचएसजीएमसी का गठन करके हरियाणा ने लंबे समय से राज्य के सिखों द्वारा इन गुरुद्वारों का प्रबंधन खुद से करने की मांग को पूरा किया गया है। धन और धर्म को लेकर छिड़ी यह राजनीतिक जंग जल्द खत्म होती नजर नहीं आ रही है, हालांकि उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए फिलहाल यथास्थिति बरकरार रखने के आदेश दे दिए हैं।

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