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चिकन के साथ एंटीबायोटिक यानी जोखिम में जान
सुनीता नारायण / नई दिल्ली August 11, 2014

अब हमें क्या खाना चाहिए? क्या कोई भी ऐसी चीज नहीं है जो सुरक्षित है? जब भी हम सेंटर फॉर साइंस ऐंड इनवॉयरनमेंट (सीएसई) में किसी खाद्य पदार्थ में विषाक्त पदार्थों पर अध्ययन करते हैं तब हर बार मुझसे यही सवाल किया जाता है। अब यह वास्तविकता बन चुकी है कि हमारा भोजन हमारे स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं होगा। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हमारा भोजन जानबूझकर की गई मिलावट की वजह से अस्वास्थ्यकर है। दरअसल हम असुरक्षित तरीके से खाद्य पदार्थ तैयार कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि हमें क्या करना चाहिए? हम केवल औद्योगिक खाद्य उत्पादन को प्राथमिकता दे रहे हैं जिसका पूरा जोर दक्षता और मुनाफे पर है, न कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर। क्या हम इसमें कोई सुधार की पहल कर सकते हैं या हम ऐसा करना ही नहीं चाहते? हमें अपने भोजन के अधिकार का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए जिससे हमारे खाद्य पदार्थ के सुरक्षित होने के साथ ही पौष्टिक भोजन की गारंटी मिले।

हमने मुर्गियों में एंटीबायोटिक  का अंदाजा लगाया। सीएसई की प्रयोगशाला ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के विभिन्न बाजारों से मुर्गे-मुर्गियों (चिकन) के 70 नमूने खरीदे। सबमें छह एंटीबायोटिक्स यानी, ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन, क्लोर टेट्रासाइक्लिन, डॉक्सीसाइक्लिन, एनरोफ्लॉक्सिन सिप्रोफ्लॉक्सिन, नियोमाइसिन के अलावा एमिनोग्लाईकोसाइड का परीक्षण किया। ये सभी एंटीबायोटिक दवाएं आम इंसानों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। आजकल हमें इस बात का अंदाजा लगता रहता है कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध का असर कम हो रहा है और ऐसा कहा जाता है कि अब हम एक ऐसे एंटीबायोटिक युग के बाद के दौर में प्रवेश करने वाले हैं जहां इन दवाओं का चमत्कार बिल्कुल काम नहीं करेगा।

एक वास्तविकता यह भी है कि पिछले 20 सालों में एंटीबायोटिक दवाओं के नए वर्ग की खोज नहीं की गई है। इसलिए हमारे पास जो कुछ भी है हमें उसे कुछ महत्त्वपूर्ण इलाज के लिए रखना चाहिए। हमें यह अच्छी तरह मालूम है कि प्रतिरोध की क्षमता घट रही है क्योंकि हम एंटीबायोटिक दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं और अब रोगाणु भी दवा के प्रतिरोध को झेल लेते हैं। ऐसे में ये दवाएं भी इलाज के लिए असरदार साबित नहीं होती हैं। लेकिन हमें इस बात की जरा भी भनक नहीं लगती है कि हमारे भोजन की वजह से ही एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन बढ़ रहा है क्योंकि खाद्य पदार्थों का उत्पादन भी जिस तरह से हो रहा है उससे एंटीबायोटिक के प्रयोग को बढ़ावा मिलता है।

हमने चिकन के नमूने में भी कुछ ऐसा ही पाया। कुल 70 नमूनों में से 40 फीसदी यानी परीक्षण किए गए हर दूसरे चिकन में एंटीबायोटिक के अवशेष थे और 17 फीसदी नमूनों की मांसपेशियों, गुर्दे और यकृत (लीवर) में एक से ज्यादा एंटीबायोटिक मौजूद थे। मुर्गियों में पाए गए एंटीबायोटिक और इंसानों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध की समस्या के बीच एक कड़ी है। भारत में देश भर के विभिन्न अस्पतालों में कराए गए 13 अध्ययनों में उसी एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोध का सबूत मिला है जिसे हमने मुर्गियों में पाया। यह महज संयोग भर नहीं है बल्कि अब यह एक वास्तविकता है। तब सवाल यह उठता है कि हम क्या करें? क्या हमें चिकन खाना बंद कर देना चाहिए? या हमें इस बात पर जोर देना चाहिए कि मुर्गीपालन से जुड़ा उत्पादन कार्य बिना एंटीबायोटिक के हो? क्या यह संभव है?

सच्च्चाई यह है कि पोल्ट्री उद्योग एंटीबायोटिक का उपयोग बीमार मुर्गियों के इलाज के लिए नहीं करता है। यहां एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग इस चिंता की वजह से किया जाता है कि कहीं मुर्गियां किसी बीमारी से ग्रस्त न हो जाएं। वे बड़े झुंड में और बेहद गंदी जगहों पर अपने चूजे को जन्म देती हैं। इसी वजह से मुर्गीपालक अक्सर पीने के पानी में एंटीबायोटिक मिलाते हैं ताकि वे किसी बीमारी के प्रकोप से बची रहें। एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल की उनकी जरूरत उन्हीं तरीकों से प्रेरित है जिन तरीके से खाद्य उत्पादन की प्रक्रिया पर अमल किया जाता है।

दरअसल पोल्ट्री उद्योग भी एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल मुनाफे के लिए भी करता है। जब मुर्गियों को एंटीबायोटिक मिश्रित आहार दिया जाता है तो उनका वजन बढ़ता है। इसी वजह से किसान थोक में एंटीबायोटिक खरीदते हैं और उसे उनके चारे में मिला देते हैं। या वे किसी बड़ी पोल्ट्री से एंटीबायोटिक मिला हुआ तैयार चारा ही खरीद लेते हैं जिसके लेबल पर यह दावा किया गया होता है कि इससे चिकन के मांस में वृद्धि होगी। आखिर ऐसा क्यों नहीं होगा? मुर्गियों में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के खिलाफ कोई नियम नहीं है।

अब तक सरकारों ने जानवरों में एंटीबायोटिक के 'उचित' उपयोग के लिए कुछ ढीले और महत्त्वहीन दिशानिर्देश जारी किए हैं। मुर्गियों के आहार के लिए भारतीय मानक ब्यूरो ने निर्देश दिए हैं जिसके मुताबिक एंटीबायोटिक का उपयोग इनके विकास के लिए नहीं किया जाना चाहिए, हालांकि इसे भी अनिवार्य नहीं बनाया गया है। ऐसे में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर कोई रोक नहीं है और यह हम सबके स्वास्थ्य की कीमत पर लगातार बढ़ ही रहा है। सवाल यह है कि आखिर क्या किया जाना चाहिए? हम जिस तरीके से खाद्य पदार्थों का उत्पादन करते हैं और उसमें सुरक्षा का ख्याल रखते हैं उसमें हमें भविष्य की नीतियों की दिशा का चयन करने की जरूरत है।

हमारे सामने तीन विकल्प हैं। पहला, हमें अमेरिका का अनुसरण करना चाहिए जिसने अब तक मुर्गे-मुर्गियों में वृद्धि के तत्त्व के तौर पर एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को नियमित नहीं किया है। इसके बजाय उसने मुर्गियों के शरीर के विभिन्न हिस्से, गुर्दे, यकृत या मांसपेशियों में विभिन्न स्तरों में मौजूद एंटीबायोटिक अवशेष की सीमा तय कर दी है। हम डेनमार्क, स्वीडन या दूसरे अन्य देशों का अनुसरण भी कर सकते हैं जिन्होंने जानवरों में कुछ एंटीबायोटिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है।  हम कुछ दूसरे तरीकों पर भी गौर कर सकते हैं जो स्वास्थ्य या आहार के लिए बेहतर हों।

Keyword: non veg, CSE, food,,
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