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दोहा में रोड़ा
संपादकीय /  August 04, 2014

गत वर्ष बाली में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की दोहा दौर की वार्ता में एक बड़ा मोड़ आया जो करीब पांच सालों से मृतप्राय थी। हुआ यूं कि डब्ल्यूटीओ का प्रत्येक सदस्य इस बात के लिए राजी हो गया कि इस वर्ष 31 जुलाई तक व्यापार सुविधा समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए जाएं।

व्यापार सुविधा समझौते के पीछे का विचार एकदम स्पष्टï है: यह सुनिश्चित करना कि आयातकों और निर्यातकों को लालफीताशाही और अन्य अनावश्यक देरियों से मुक्ति मिल सके। इस लिहाज से देखा जाए तो व्यापार सुविधा समझौता उत्पादकों और उपभोक्ताओं के हित के लिए भी अत्यंत आवश्यक है, खासतौर पर भारत जैसे देश में जहां नौकरशाही की जटिलताएं कुछ ज्यादा ही हैं। ऐसे में दुनिया के ज्यादातर देश यह देखकर चकित रह गए कि भारत की नई सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती सरकार का फैसला बदल दिया और बाली में हुई सहमति के मुताबिक व्यापार सुविधा समझौते पर हस्ताक्षर से इनकार कर दिया।

यह बात भारत के हित में नहीं है। भारत ने लंबे समय तक दुनिया को मुक्त व्यापार क्षेत्र के दो हिस्सों में बांटने का विरोध किया था जिससे उसे बाहर रखा गया था। दोहा दौर की वार्ता से मोहभंग होने के बाद इसने गति पकड़ी थी और उसे अब और गतिशील ही होना है। प्रशांत-पार साझेदारी जैसे समझौतों की राह अब और आसान हो जाएगी क्योंकि अन्य कोई विकल्प शेष ही नहीं हैं। भारत को बहुपक्षीय व्यवस्था की जरूरत है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भारत अलग-थलग नहीं पड़े। बहरहाल, उसने खुद ही बहुपक्षीय व्यवस्था को ऐसा बना दिया है कि वह काम लायक नहीं नजर आती।

उसने ऐसा जिस वजह से किया है वह भी चिंतित करने वाला है। इसलिए क्योंकि यह उसके हित में नहीं है। यही वजह है कि भारत अब एक समांतर समझौता चाहता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जो अनाज उत्पादकों को कृत्रिम रूप से बढ़ी कीमत चुकाकर खरीदा गया है उसकी वजह से विश्व बाजार में कोई विसंगति न आए। ध्यान देने वाली बात है कि समस्या का गरीबों की खाद्य सब्सिडी से कोई संबंध नहीं है।

छोटे किसानों की मदद से भी इसका कोई लेनादेना नहीं है। ये दोनों काम तो डब्ल्यूटीओ की शर्तों के अनुपालन के साथ भी किए जा सकते हैं। यह मामला मूल्य निर्धारण व्यवस्था से छेड़छाड़ और वैश्विक स्तर पर कीमतों में आने वाली विसंगति से जुड़ा है। ऐसे में यह दलील देना उचित नहीं है कि यह सारा कुछ छोटे किसानों के लिए किया गया। वास्तव में भारत ने दोहा दौर को समाप्त ही कर दिया और अब इसे नया जीवन देने की जिम्मेदारी भी उस पर ही है।

जानकारी के मुताबिक वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों को उम्मीद है कि अगर अमेरिका खाद्यान्न भंडारण के मसले के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देता है तो इसे सितंबर में दोबारा शुरू किया जा सकता है। भारत को कम से कम अपनी चिंताओं को लेकर वैश्विक सहमति बनानी ही चाहिए और सब्सिडी के आकलन के लिए अधिक वास्तविक व्यवस्था लागू करनी चाहिए। ये कुछ ऐसे काम हैं जो भारतीय राजनयिकों ने अब तक नहीं किए हैं।

बहरहाल केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। दोहा दौर की वार्ता को नया जीवन देने की कोशिश पहली कोशिश उसी को करनी चाहिए जिसने उसे बरबाद किया यानी भारत। एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में देखे जाने के लिए यह आवश्यक है कि भारत अपनी दशकों पुरानी उस छवि को सुधारे जिसमें उसे खेल खराब करने वाला माना जाता है। नई सरकार ने उस पुरानी छवि को और मजबूत ही किया है। सरकार को अपने हितों का ध्यान रखते हुए सितंबर में दोहा दौर की वार्ता में नई जान फूंकने की कोशिश करनी चाहिए। भारत को व्यापार सुविधा समझौते को गति देने का अवसर चूकना नहीं चाहिए।

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