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दोस्ती को और मिलेगी मजबूती
नितिन सेठी / नई दिल्ली July 31, 2014

अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी की अगुआई में भारत आए अमेरिकी दल ने अपना एजेंडा साफ कर दिया है। अमेरिकी दल ने भारतीय वार्ताकारों के सामने स्पष्टï कर दिया है कि अगर भारत अमेरिका के साथ ऊर्जा क्षेत्र में आगे बढऩा चाहता है तो उसे पर्यावरण के मोर्चे पर भी कदम बढ़ाने होंगे। अमेरिकी पक्ष ने साफ कर दिया है कि ये दोनों मामले एक दूसरे के बिना आगे नहीं बढ़ सकते।

बुधवार को बिजली मंत्रालय के साथ बैठक में अमेरिकी दल ने भारतीय पक्ष को इस बारे में बता दिया। भारत की ओर से बिजली मंत्री पीयूष गोयल सहित कई वरिष्ठï अधिकारियों ने इस बैठक में शिरकत की। उसी दिन जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका के विशेष दूत टॉड स्टर्न ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से मुलाकात कर जलवायु परिवर्तन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहमति बनाने की कोशिश की।

सूत्रों ने बताया कि पर्यावरण मंत्रालय के साथ बैठक में उन मसलों पर ध्यान केंद्रित किया गया, जहां दोनों देश सहयोग के लिए समझौता कर सकते हैं। इनमें वायु प्रदूषण में कमी और वानिकी क्षेत्र एवं स्मार्ट ग्रिड से होने वाले कार्बन उत्सर्जन से संबंधित बेसलाइन डाटा जैसे मसले शामिल हैं।

बिजली मंत्रालय के साथ बातचीत में जहां अमेरिका ने भारत में बेहतर निवेश माहौल को लेकर चर्चा की। वहीं भारतीय पक्ष ने अमेरिका से उन विशेष परियोजनाओं के बारे में बात की, जहां वह तकनीक मुहैया करा सकता है। ऊर्जा सक्षमता और स्मार्ट सिटीज में निवेश, दो ऐसे क्षेत्र हैं जिनके बारे में उम्मीद की जा रही है कि भारत-अमेरिकी अनुबंधों के तहत कुछ अहम परियोजनाओं पर सहमति बनेगी। हालांकि भारत ने यह स्पष्टï कर दिया है कि वह बिल्डिंग क्षेत्र में ऊर्जा सक्षमता को लेकर किसी बाध्यकारी लक्ष्य के लिए तैयार नहीं है, जबकि अमेरिका कई मंचों पर लगातार यह मांग दोहराता रहा है।

इसके बजाय भारत अमेरिका के साथ ऐसे प्रस्ताव पर आगे बढऩे को तैयार है, जिसमें ग्रीन हाउस गैसों के उत्जर्सन में कमी को लेकर किसी प्रतिबद्घता की बाध्यता न हो। दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर विवाद में सौर ऊर्जा उपकरणों के आयात को लेकर गतिरोध भी शामिल है। इस मामले को लेकर अमेरिका ने भारत के खिलाफ विश्व व्यापार संगठन (डब्लयूटीओ) विवाद निपटान तंत्र में विरोध जताया है। जब तक इस मामले को सुलझाने के लिए डब्ल्यूटीओ तंत्र अपना वक्त ले, तब तक दोनों देश द्विपक्षीय स्तर पर आगे बढ़ सकते हैं। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने जावड़ेकर के साथ वर्ष 2015 में होने वाले संयुक्त राष्टï्र वैश्विक जलवायु परिवर्तन समझौते पर भी चर्चा की। इस विषय पर बुनियादी विमर्श मसौदा इस साल के अंत तक तैयार होना है और यह निर्धारित समय से पहले दुनिया भर में कई उच्च स्तरीय बैठकों के जरिये मूर्त रूप ले पाएगा।

मंत्री के साथ बैठक के बाद जलवायु परिवर्तन पर गठित दोनों देशों के संयुक्त कार्य समूह ने बैठक की। इसमें भारत के कई मंत्रालयों के अधिकारी शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल नए जलवायु परिवर्तन समझौते में साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्घांत की सक्रिय व्याख्या चाहता है। इसमें भारत और अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों को संयुक्त राष्टï्र के मौजूदा पर्यावरण समझौते के तहत निर्धारित कार्बन उत्सर्जन में कमी के बजाय और ज्यादा कटौती का बोझ उठाना होगा। जावड़ेकर और उनकी टीम को इस मामले में कुछ आपत्ति हैं। भारत फिलहाल अमीर और विकासशील देशों के बीच मौजूदा सीमा को बढ़ाने के खिलाफ है।

जावड़ेकर ने इस बात पर भी जोर दिया कि वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी की जिम्मेदारी को सभी में बराबर बांटा जाना चाहिए। सूत्रों ने यह भी बताया कि भारत ने स्पष्टï किया है कि उत्सर्जन में कमी को लेकर विभिन्न देशों की प्रतिबद्घताओं में अंतर्भूत अंतर तब स्वाभाविक रूप से नजर आ ही जाएगा, जब मार्च 2015 में वे उत्सर्जन घटाने के अपने योगदान का ब्योरा पेश करेंगे। संयुक्त राष्टï्र के सम्मेलन से पहले इस कवायद को अंजाम देना होगा।

संयुक्त राष्टï्र के पिछले सम्मेलन के दौरान सभी देशों से यह पूछा गया था कि नए सम्मेलन में होने वाले अनुबंध को लेकर वे क्या कदम उठाएंगे? हालांकि इन देशों को जिन कदमों के बारे में बताना है, उनकी प्रकृति को लेकर अब भी जबरदस्त मतभेद कायम हैं। रेफ्रिजरेंट गैसों के विवादित विषय को लेकर भी अमेरिकी और भारतीय दलों ने द्विपक्षीय चर्चा की रूपरेखा तैयार की। इन गैसों को वैश्विक तापवृद्घि के लिए बड़ा जिम्मेदार माना जाता है और बैठक में इनके विकल्पों पर भी चर्चा हुई।

अमेरिका भारत को लगातार इन विकल्पों को अपनाने पर जोर दे रहा है। इनमें से कुछ विकल्प अमेरिकी रसायन कंपनियों की तकनीकों से जुड़े हैं। यह मामला हालांकि अमेरिकी राष्टï्रपति बराक ओबामा के एजेंडे में सबसे ऊपर है लेकिन भारत फिलहाल इससे कन्नी काट रहा है और उसका कहना है कि ऐसे समझौते तभी अमल में आने चाहिए जब वर्ष 2015 में जलवायु परिवर्तन संबंधी व्यापक समझौता अमल में आए या फिर उसके बाद इस पर विचार किया जाए।

शायद अमेरिका भी इस बात से वाकिफ है तभी लगभग एक घंटे लंबी चली बैठक में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने इस पर ज्यादा जोर नहीं देकर हैरान कर दिया। वहीं इससे पहले जलवायु परिवर्तन को लेकर हुई बैठकों में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों ने भारत को इसे स्वीकार करने के लिए जबरदस्त कूटनीतिक दबाव बनाया हुआ था।

बैठक में मौजूद रहे एक वरिष्ठï अधिकारी ने बताया कि अभी जहां इस बैठक का विस्तृत ब्योरा दोनों पक्षों के बीच साझा किया जा रहा है, जो जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर बड़ा बदलाव लाएंगे, कुछ तकनीकी सहयोग पर भी दोनों देशों ने साथ काम करने में खुशी जताई है। स्वाभाविक है कि दोनों देशों को इस मामले में अपनी सीमाओं का अंदाजा है। अमेरिकी विदेश मंत्री केरी की अगुआई में आए इस प्रतिनिधिमंडल ने भारत में कदम रखते ही कमान संभाल ली और भारत में कई विभागों से वार्ता जारी रखी। वह तीन दिन के भारत के दौरे पर हैं। 

Keyword: India, US, अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी, अमेरिकी दल, बिजली मंत्रालय,
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