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दूरदर्शी छात्र का सबसे सस्ता सूक्ष्मदर्शी
इंदुलेखा अरविंद / नई दिल्ली July 21, 2014

आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र और एक डॉलर से भी कम कीमत का माइक्रोस्कोप बनाने वाले मनु प्रकाश ऐसी दुनिया की कल्पना करते हैं जहां हर व्यक्ति के पास विज्ञान का अधिकार हो। बता रही हैं इंदुलेखा अरविंद

अफ्रीका में एक मुहावरा मशहूर है, 'जिस व्यक्ति के पास समाधान है वही लापता है।' इस मुहावरे में भी कुछ ऐसी ही स्थिति के बारे में चर्चा की गई है जिसमें एक विकासशील देश में रहने वाले एक समुदाय के पास उसे दान में मिले वैज्ञानिक उपकरण मौजूद हों लेकिन वह उसका इस्तेमाल उस वक्त भी न कर सके जब देश को उसकी सबसे अधिक जरूरत हो क्योंकि उसकी देखभाल करने वाला व्यक्ति ताला लगाकर घर चला गया। उस व्यक्ति ने शायद इतनी सतर्कता इसलिए बरती क्योंकि उस उपकरण की कीमत उसके साल भर के वेतन से 15 गुना ज्यादा थी।

भौतिकशास्त्री और स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय में बायो इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर मनु प्रकाश ने कहा, 'लोग वैज्ञानिक उपकरणों से डरते हैं और यह गलत तरीका है-आपको शोध उपकरण खुले में सबके सामने रखने चाहिए।' वर्ष 2011 में थाईलैंड में घूमते हुए प्रकाश और उनके साथियों को भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा जहां ग्रामीण रैबीज की जांच कराना चाहते थे लेकिन उपकरण उपलब्ध होने के बाद भी वे ऐसा नहीं कर सके।

33 साल के आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र को मिली प्रेरणा के विभिन्न कारणों में से यह भी एक प्रमुख कारण था। जांच करने वाला एक ऐसा माइक्रोस्कोप जिसकी लागत एक डॉलर से भी कम है। इस साल की शुरुआत में पेश किए गए इस फोल्डस्कोप ने दुनिया भर के वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसका विकास करने के दौरान बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की ओर से 1,00,000 डॉलर की मदद भी दी गई।

एक सुबह जब हमने उन्हें फोन किया तो मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अपना स्नातकोत्तर करने वाले प्रकाश स्टैनफर्ड स्थिति अपनी प्रयोगशाला की ओर जा रहे थे। उन्होंने स्काइप पर बात करने के बजाय फोन पर बात करना पसंद किया, मुझे उम्मीद थी स्काइप पर बात करने के दौरान मुझे फोल्डस्कोप देखने को मिल जाता। सौभाग्यवश प्रकाश ने एक टेड टॉक दे दिया जहां उन्होंने फोल्डस्कोप के काम करने के तरीके के बारे में विस्तार से जानकारी दी और यह दिखने में भी लाजवाब था, इसे सचमुच कागज के एक टुकड़े से मोड़ा जा सकता है। इसके लिए किसी अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत नहीं है और यह आपकी जेब में समा जाता है और साथ काफी ऊंचाई से गिरने पर भी इस पर कोई असर नहीं पड़ता है।

फोल्डस्कोप के मौजूदा संस्करण में 2000एक्स मैग्नीफिकेशन के साथ एक सब-माइक्रोन रिजॉल्यूशन भी है। वह विस्तार से बताते हैं कि एक माइक्रोन एक बैक्टीरिया के बराबर होगा इसलिए अगर आप यह देखना चाहते हैं कि बैक्टीेरिया मौजूद है या नहीं तो यह उपकरण पर्याप्त होगा। विभिन्न जगहों में विभिन्न रोगों के इलाज का क्षेत्र परीक्षण चल रहा है मसलन घाना में मलेरिया की जांच चल रही है। वह कहते हैं कि जांच से जुड़े ज्यादातर क्षेत्र परीक्षण में वक्त लगता है लेकिन एक बार जब इसका प्रमाणीकरण हो जाता है तब इसके वितरण और इस्तेमाल के दायरे को बढ़ाया जाएगा। प्रकाशलैब की बातचीत भी दक्षिण भारत के एक संगठन से हो रही है। वह कहते हैं, 'सिक्किम में भी मलेरिया की काफी समस्या है तो वहां पर जांच की गुंजाइश हो सकती है लेकिन दिक्कत की बात यह है कि इन क्षेत्र परीक्षणों को अभी तक कोई अनुदान नहीं मिला है जिसकी वजह से इसकी प्रगति बाधित होती है।'

विज्ञान शिक्षा क्षेत्र में फोल्डस्कोप के इस्तेमाल को तुरंत बढ़ाया जा सकता है और प्रकाश का कहना है कि वह इसको लेकर बेहद उत्साहित हैं क्योंकि इसका ताल्लुक स्वास्थ्य सेवा से है और यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। वह कहते हैं, 'अगर आपको विज्ञान को लेकर जिज्ञासा नहीं है और अगर आपने कभी माइक्रोस्कोप से यह नहीं देखा है कि किन कारणों से रोग होता है तो आप स्वास्थ्य सेवा के बजाय किसी दूसरे पेशे को अपना सकते हैं। विज्ञान के लिए उत्साह कम उम्र में ही जगता है इसलिए हम सोच रहे हैं कि बच्चों को विज्ञान के क्षेत्र के लिए उत्साहित किया जाए।'

विज्ञान में प्रकाश की रुचि तब बढ़ी जब वह उत्तर प्रदेश के रामपुर में बड़े हो रहे थे। उनके यहां के एक किरायेदार रसायनशास्त्र के शिक्षक हुआ करते थे। उन्हें एक दिन बड़े बुरे तरीके से निकाल दिया गया और उनके प्रायोगिक यंत्र को गैरेज में छुपा कर रख दिया गया। आखिरकार वो चीजें प्रकाश और उनके भाई के हाथों लगीं और वह उनके लिए अमूल्य खजाना बन गया। वह कहते हैं, 'हमें तो करीब 200 रसायनों के साथ एक प्रयोगशाला ही मिल गई। हमने सभी तरह की चीजें कीं। वह सब कुछ अद्भुत था।'

वह और उनके दोस्त ने तीन खरगोश के कंकाल के हिस्से जोड़कर एक खरगोश बनाने की कोशिश की जिसे उन्होंने एक कसाई की दुकान से खरीदा था। जब वह आपको बताते हैं कि एक खरगोश में भी उतनी ही हड्डियां होती हैं जितनी की एक इंसान में और उसे बनाना भी एक 3डी जिगसॉ पहेली की तरह ही होता है तब आप अंदाजा लगा पाएंगे कि उस छोटे बच्चे में कितना उत्साह रहा होगा। आधारभूत विज्ञान में उनकी दिलचस्पी थी लेकिन उन्होंने आईआईटी से स्नातक करते वक्त कंप्यूटर साइंस विषय चुना। वह स्वीकारते हैं कि उन्हें अपने साथियों के दबाव में ऐसा करना पड़ा। वह कहते हैं, 'मेरा प्रदर्शन अच्छा रहा और मैंने काफी कुछ सीखा लेकिन मेरी दिलचस्पी हमेशा से ही भौतिकी और मेकेनिक्स में रही, इसी वजह से मैं अपना ज्यादातर वक्त दूसरे विभागों में बिताता था।'

प्रकाश के सहपाठी और अब आईआईटी में ही सहायक प्रोफेसर नितिन सक्सेना उनके एक सक्रिय छात्र के तौर पर याद करते हैं जिसकी दिलचस्पी परियोजना आधारित अध्ययन में थी भले ही वह टॉपर नहीं रहे। सक्सेना कहते हैं, 'बैच में प्रकाश के बारे में एक आम राय यह थी कि वह नई चीजों को सीखने में दिलचस्पी लेता है।' प्रकाश ने विज्ञान शिक्षा में अपनी दिलचस्पी बढ़ाई और जब वह आईआईटी में थे उसी वक्त अपने कुछ दोस्तों के साथ उन्होंने ब्रिक्स (बिल्ड रोबोट्स, क्रिएट साइंस) नाम का प्रोग्राम शुरू किया। यह समूह देश भर के कई स्कूलों में गया और रोबोटिक्स विषय में कार्यशालाएं आयोजित कराईं।

आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग के प्रोफेसर अभिताभ मुखर्जी कहते हैं कि जब वह ब्रिक्स के साथ जुड़े थे तब वह कार्यशाला के लिए 40-50 स्कूलों में गए होंगे। प्रकाश के काम के पीछे उनका दर्शन था अल्पव्ययी विज्ञान जिसे यह नाम उन्होंने खुद दिया था। वह कहते हैं, 'मेरे लिए विज्ञान का बचतकारी होना जरूरी है तभी आप इसके पैमाने का विस्तार कर पाएंगे और सबके पास विज्ञान के प्रयोग करने के अधिकार होंगे। अब लोग यह सोचते हैं कि अगर आपके पास संसाधन नहीं होगा तब आप विज्ञान के बेहतर प्रयोग नहीं कर सकते हैं जो सही नहीं है और हम सब यही सोच रहे हैं कि हम इसे कैसे बदल सकते हैं।'

मुखर्जी कहते हैं कि आईआईटी के दिनों से ही उनके विचार शानदार थे। वह कहते हैं, 'बचत विज्ञान (फ्रुगल विज्ञान) भी बिल्ड रोबोट्स, क्रिएट साइंस फिलॉसफी का ही हिस्सा था। उस वक्त भारत में लीगो सेट की कीमत करीब 16,000 रुपये हुआ करती थी और पॉश स्कूल भी उसके खरीदने में हिचकते थे। इसलिए हमने सस्ती लागत के विकल्प पर ध्यान देना शुरू किया मसलन कबाड़ से रोबोट बनाना जिसे हम जंक साइंस या कबाड़ विज्ञान कहते थे।'

प्रकाश का कहना है कि फोल्डस्कोप अभी व्यावसायिक स्तर पर मौजूद नहीं है लेकिन यह लैब जल्द ही दुनिया के विभिन्न हिस्से से 10,000 उपकरण मंगाएगा। इस लैब ने लोगों को माइक्रोस्कोप के जरिये एक प्रयोग का प्रस्ताव पेश करने के लिए आमंत्रित किया है जिसके नतीजे और दस्तावेज एक सामान्य वेबसाइट पर अपलोड किए जा सकेंगे। इसे 130 देशों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है और इसमें बच्चे से लेकर युवा शामिल हैं। इस प्रयोग में एक युवा लड़की का प्रयोग भी शामिल है जो यह जानना चाहती थी कि हर बार कॉन्टैक्ट लेंस को धोने की जरूरत क्यों पड़ती है और लेंस को दो-तीन दिन तक नहीं साफ करने पर उसमें क्या खराबी आती है। एक प्रस्ताव मंगोलिया के किसान से आया है जो ऊंट के दूध में रोगाणु की पहचान करना चाहते हैं।

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