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होली है...क्योंकि पिचकारी से बरसते हैं नोट भी
राजीव कुमार / नई दिल्ली March 22, 2008
होली का रंग सिर्फ आम या खास लोगों पर ही नहीं चढ़ता बल्कि कारोबारी दुनिया पर भी इसका गहरा रंग चढ़ता है।
वह ऐसे कि हर होली देश में करोड़ों-अरबों रुपये का धंधा लेकर आती है और इसके चलते छोटे-मझोले और बड़े कारोबारियों के व्यारे-न्यारे हो जाते हैं।होली के मौसम के दौरान होता है, अरबों रुपये का विशेष कारोबार। यही नहीं, इससे लाखों को मौसमी रोजगार भी मिल जाता है। होली के मौके पर होने वाली कमाई से वे अन्य कारोबार के लिए पैसे जुटा लेते हैं।
होली के हो-हल्ले और रंगों भरी पिचकारियों के बीच विभिन्न चीजों की मांग निकलने से देश की अर्थव्यवस्था पर भी हर साल रंगों का नया लेप चढ़ता है। होली में मुख्य रूप से रंग व गुलाल, पिचकारी, मेवे, खोया, दाल, आटा, तेल, मसाले व चावल व नए कपड़ों की मांग निकलती है।
हालांकि व्यापारियों के मुताबिक संगठित क्षेत्र नहीं होने के कारण होली के बाजारों का सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं होता है। लेकिन उद्योग संगठन एसोचैम के अनुमान के मुताबिक होली के उत्पादों का बाजार देश भर में 5000 करोड़ रुपये का है। जबकि कारोबारियों का अंदाजा है कि इस साल होली के दौरान देश भर में 1800 करोड़ रुपये के रंगों को घोल दिया जाएगा।
पिछले दो-तीन सालों में लोगों की पिचकारियों में हर्बल कलर ने भी अपनी खास जगह बनाई है। हालांकि इस बाजार में चीन की हिस्सेदारी भी बढ़ती जा रही है। व्यापारियों के मुताबिक कम कीमत होने के कारण ग्रामीण इलाकों में चीनी रंगों की मांग बढ़ती जा रही है।
रंग रसायन व्यापार संघ के मुताबिक, सिर्फ दिल्ली के बाजार से 250-300 करोड़ रुपये के रंगों की बिक्री होने का अनुमान है। दिल्ली के थोक बाजार से उत्तर भारत के इलाकों में रंगों की आपूर्ति की जाती है। दिल्ली के थोक बाजारों में अलीगढ़, हाथरस व दिल्ली के तिलक बाजार से करोड़ों रुपये के रंगों की आपूर्ति की जाती है। व्यापार संघ की मानें तो होली पर होने वाले रंगों के कारोबार में हर साल बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।
वर्ष 2005 में देश भर में रंग व गुलाल का अनुमानित कारोबार 1100 करोड़ रुपये का था, जो वर्ष 2006 में 1200 करोड़ रुपये तो वर्ष 2007 में 1500 करोड़ रुपये का हो गया। उसी तरीके से चीन से आयात होने वाले रंग-रसायन व पिचकारी के कारोबार में भी मजबूती देखी गई है। अनुमान के मुताबिक वर्ष 2005 में चीन से 150 करोड़ रुपये के रंग-रसायन व पिचकारी का आयात किया गया। जो वर्ष 2006 में बढ़कर 300 करोड़ रुपये का हो गया। वर्ष 2007 में यह 500 करोड़ रुपये का हो गया।
अनुमान के मुताबिक इस साल लगभग 800 करोड़ रुपये का रंग, रसायन व पिचकारी का आयात चीन से किया गया। चीनी पिचकारी व रंगों की खास बात यह है कि यह देश के सभी प्रमुख नगरों में उपलब्ध होता है। दिल्ली के अलावा जयपुर, कानपुर, लखनऊ, पटना, भोपाल, मुंबई, पंजाब के प्रमुख शहर व दक्षिण ­भारत के सभी प्रमुख शहरों में इसकी मौजूदगी होती है। होली के दौरान मेवे के बाजार में काफी हलचल होती है।
अकेले दिल्ली के थोक मेवे बाजार में इस मौसम में 200-250 करोड़ रुपये का कारोबार होता है। गुझिया की मांग के कारण दिल्ली के खोये बाजार में भी इस मौसम में अनुमान के मुताबिक एक करोड़ रुपये का कारोबार हो जाता है।
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया  ट्रेडर्स के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल कहते हैं, 'होली से सिर्फ थोक बाजार के कारोबार में ही इजाफा नहीं होता है। इस मौके पर खुदरा व्यापारी व मौसमी कारोबारियों की भी पौ बारह हो जाती है। अगर पिचकारी व रंगों की बात करे तो थोक व्यापार जहां 5 से 10 फीसदी की कमाई करते हैं तो खुदरा व्यापारी 25 से 30 फीसदी का मुनाफा कमाते हैं।
हर स्थानीय बाजार के व्यापारी एक महीना पहले से रंग व पिचकारी की दुकान सजा लेते है। और मौसमी बाजार होने के नाते छोटे खुदरा व्यापारी खरीद के मुकाबले काफी अंतर पर पिचकारी व रंगों की बिक्री करते हैं।' सर्व व्यापार मंडल के अध्यक्ष सतेन्द्र सिंह चौहान कहते हैं, दिल्ली व आसपास के इलाकों में कम से कम पिचकारी व रंगों की पांच हजार दुकानें लगती हैं। यानी कि होली के मौसम में 10 हजार लोगों के लिए मौसमी रोजगार का सृजन होता है।
होली में होता है इससे जुड़ी चीजों का 5000 करोड़ रु. का कारोबार
लाखों को मिलता है मौसमी रोजगार भी
वर्ष 2007 में देशभर में रंग-गुलाल का कारोबार 1500 करोड़ रुपये का
सिर्फ दिल्ली के बाजार से 250-300 करोड़ रुपये के रंगों की बिक्री का अनुमान
दिल्ली के थोक बाजार से होती है उत्तर भारत के इलाकों में रंगों की सप्लाई
दिल्ली के थोक मेवे बाजार में होता है 200-250 करोड़ रुपये का कारोबार
दिल्ली के खोए बाजार में हो जाता है एक करोड़ रुपये का कारोबार
पिचकारी व रंगों से थोक व्यापारी को 5 से 10 फीसदी का मुनाफा और खुदरा को 25 से 30 फीसदी
वर्ष 2005 में चीन से हुआ 150 करोड़ रुपये के रंग-रसायन व पिचकारी का आयात किया गया
इस साल यह बढ़कर लगभग 800 करोड़ रुपये पर पहुंच गया
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