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खुदरा निवेशक ओएफएस से खरीद सकते हैं अच्छी कंपनियां
जयदीप घोष / मुंबई July 06, 2014

सूचीबद्ध कंपनियां 2012 से अब तक ऑफर फॉर सेल (ओएफएस)के जरिये 48,457 करोड़ रुपये मूल्य के शेयरों की बिकवाली कर चुकी हैं। ओएफएस फॉलो ऑन पब्लिक ऑफरिंग (एफपीओ) का एक विकल्प होता है। प्राइम डेटाबेस के आंकड़ों के अनुसार इन कंपनियों में विप्रो, ओनएनजीसी, रिलायंस पावर, ब्लू डार्ट, इरॉस इंटरनैशनल, अदाणी पावर, महिंद्रा हॉलिडेज, सन टीवी और अन्य शामिल हैं। हालांकि खुदरा निवेशक इन कंपनियों में कोई शेयर हासिल करने में सफल नहीं रहे हैं।

इसकी वजह यह है कि ये कंपनियां ओएफएस का इस्तेमाल करती हैं जिसमें खुदरा निवेशकों के लिए कोई विशेष कोटा नहीं होता है। हालांकि इन निवेशकों को आवेदन की अनुमति तो है लेकिन बड़े संस्थागत निवेशकों ने इन्हें बाहर धकेल दिया है। जिन कंपनियों ने ओएफएस का इस्तेमाल किया उन्हें भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के दिशानिर्देशों का पालन करना पड़ा जिनमें नियामक ने निजी कंपनियों के लिए 25 प्रतिशत और सरकारी कंपनियों के लिए 10 प्रतिशत तक सार्वजनिक शेयरधारिता रखना अनिवार्य कर दिया है।

एक ब्रोकरेज कंपनी के प्रमुख कहते हैं, 'ओएफएस शेयरों की बिकवाली का त्वरित रास्ता था क्योंकि कई सरकारी और निजी कंपनियों को जुलाई 2013 के दिशानिर्देशों का पालन करना था। खुदरा निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि ओएफएस में उनकी कोई भूमिका नहीं रह गई थी।  ओएफएस में बड़े निवेशकों की ही चलती है।'

बाजार नियामक ने इस अनियमितता को दूर किया है। हाल में सेबी ने ओएफएस में खुदरा निवेशकों के लिए 10 प्रतिशत कोटे का प्रावधान किया है। चूंकि, केवल सूचीबद्ध कंपनियों के लिए ही ओएफएस की अनुमति है इसलिए यह एफपीओ के लिए एक विकल्प के तौर पर काम करेगा, इसलिए खुदरा निवेशकों को निर्णय लेने से पहले कुछ बातें जाननी होंगी। मिसाल के तौर पर शेयरों का पिछला प्रदर्शन, प्रबंधन के संबंध में जानकारी, लाभांश का रिकॉर्ड इत्यादि पर नजर रखनी होगी।

सबसे अच्छी बात यह है कि इससे प्रक्रिया काफी सरल हो जाएगी और शायद सस्ती भी। इससे पहले किसी एफपीओ में भाग लेने के लिए ऑनलाइन या ऑफलाइन खरीदना पड़ता था और ब्रोकर के माध्यम से आवेदन कर बैंकों को सौंपना होता था। अब अगर किसी खुदरा निवेशक के पास डीमैट अकाउंट है तो वह अपने ब्रोकर को कह कर निर्धारित 10 प्रतिशत कोटे में शेयर खरीद सकता है।

वित्तीय योजनाकार ऋषि नथानी कहते हैं, 'खुदरा निवेशकों को 0.25 प्रतिशत रकम खर्च आएगी जिसका भुगतान उन्हें ब्रोकर को करना होगा। अहम बात यह है कि यह सौदा एक या दो दिन में हो जाएगा। दूसरी तरफ अगर खुदरा निवेशक ने एफपीओ के जरिये निवेश किया होता तो उन्हें 15 दिनों तक रकम बैंक में रखनी होती।'

सेबी ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय से सिफारिश की है कि सरकारी कंपनियों में न्यूनतम सार्वजनिक हिस्सेदारी 25 प्रतिशत होनी चाहिए और ऐसा तीन साल में किया जाए। सिफारिश स्वीकार किए जाने की स्थिति में कई सरकारी कंपनियों जैसे कोल इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, एनएमडीसी, नैशनल एल्युमीनियम आदि में सरकार को अपनी हिस्सेदारी कम करनी पड़ सकती है।

एक अन्य सिफारिश में सेबी ने एंकर इन्वेस्टर का कोटा मौजूदा 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत किए जाने का प्रस्ताव दिया है। यह प्रस्ताव इसलिए दिचलस्प हो जाता है कि क्योंकि बाजार नियामक  ने इसके जरिये निवेशकों के लिए सुरक्षा के उपाय बढाए हैं। अन्सर्ट ऐंड यंग के टैक्स पार्टनर अनीश ठक्कर कहते हैं, 'एंकर इन्वेस्टर का कोटा बढ़ाकर सेबी निवेशकों को अतिरिक्त सुरक्षा देना चाहता है। इससे निवेशकों में विश्वास और बढ़ेगा।'

हालांकि  यह सवाल उठता है कि क्या खुदरा निवेशकों को एंकर इन्वेस्टर के लिए अधिक कोटे के रूप में अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत है। चूंकि, एंकर इन्वेस्टर को एक महीने के लिए शेयर रखने होंगे, इसलिए कोटे की अधिक सीमा से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि निवेश के पहले अधिक अनिश्चितता नहीं आएगी। एक दूसरे निवेशक ने कहा, 'जब एंकर इन्वेस्टर निकलते हैं तो कुछ अनिश्चितता हो सकती है लेकिन अच्छे शेयरों के खरीदार तो होते ही हैं।'

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