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संरक्षण खेती बन सकती है लाख दुखों की एक दवा
सुरिंदर सूद /  October 07, 2008
एक जमाना था, जब खेती की विकास गाथा में पानी के ज्यादा इस्तेमाल, उर्वरक और ऊर्जा का अधिक इस्तेमाल करने वाली तकनीकों की अहम भूमिका हुआ करती थी। लेकिन अब वक्त बदल रहा है।
आज कृषि के विकास के साथ-साथ इस बात का भी खास ख्याल रखा जा रहा है कि इनका इस्तेमाल कम से कम हो, ताकि लागत कम होने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की सेहत पर भी इसका बुरा असर न हो।

यह खेती का एक बिल्कुल ही नया मॉडल है, जिसकी मदद से पर्यावरण का ख्याल रखा जाता है। इस तरह की खेती को कहते हैं, 'संरक्षण कृषि'। इस अनोखी तरह की खेती में जमीन को या तो बिल्कुल भी नहीं जोता जाता या फिर कम से कम जुताई होती है। इसमें फसल के पौधों को शुरू में नर्सरी में उगाया जाता है।

साथ ही, लेजर की मदद से जमीन को जबरदस्त तरीके से समतल किया जाता है। ऊपर से, इसमें ड्रिप और स्प्रिंकलर्स जैसे सिंचाई के आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल होता है। इन तरीकों का इस्तेमाल करके खेती में काफी मुनाफे का सौदा बन सकती है।

साथ ही, इससे कृषि में इस्तेमाल होने वाली चीजों की कार्यकुशलता में जबरदस्त इजाफा होता है। इससे लागत कम आती है और पैदावार में काफी बढ़ोतरी होती है। इस सबका फायदा किसानों को मोटे मुनाफे के रूप में होता है। गंगा के मैदानों के किसानों के बीच खेती का यह नया तरीका काफी मशहूर हो रहा है। इसके पीछे बड़ी वजह है, इसका काफी अच्छा और फायदेमंद होना।

वैसे, इस नई खेती की शुरुआत हुई थी, 2000 के आसपास। आज 'संरक्षण कृषि' का दायरा इस इलाके के 30 लाख हेक्टयर में फैल चुका है। हकीकत तो यह है कि यह नई तरह की खेती अब पाकिस्तान और नेपाल जैसे पड़ोसी मुल्कों के किसानों का भी ध्यान अपनी तरफ खींच रही है।

इस खेती को बढ़ावा दे रही है, कंसोर्टियम ऑफ दी कंसल्टेटिव ग्रुप ऑफ इंटरनैशनल एग्रीकल्चर रिसर्च (सीजीआईएआर)। यह संस्था दुनिया भर में कई कृषि शोध संस्थानों को चल रही है। 'संरक्षण खेती' में जुताई की जरूरत को खत्म कर दिया गया है।

हालांकि, पारंपरिक रूप से यह सोचा जाता है कि जितने अच्छी तरीके से खेतों को जोता जाता है, फसल उतने ही अच्छी होती है। लेकिन इस नई तरह की खेती में पिछली बार की फसल को काटने के बाद जमीन को वैसे का वैसा ही छोड़ दिया जाता है।

नई फसल के लिए एक खास तरीके के सीड ड्रिल्स की मदद से खेतों में छेद करके बीजों को एक निश्चित गहराई में बो दिया जाता है। इससे न केवल मेहनत बचती है, बल्कि इससे खेतों की बार-बार जुताई में खर्च होने वाली ऊर्जा भी बचती है। इस वजह से काफी समय भी बचता है।

इससे अगली फसल की तैयारी करने के लिए भी काफी वक्त मिल जाता है। इसकी वजह से खर-पतवारों का खतरा भी काफी कम हो जाता है। उचित गहराई में बीज बोने  और उनके आस-पास मौजूद छोटी-छोटी नालियों की वजह से पानी अच्छी तरह से उन तक पहुंच पाता है। इससे पानी की बर्बादी तो कम होती ही है।

साथ ही, पैदावार में भी अच्छा खासा इजाफा हो सकता है। लेजर से जमीन को समतल करना काफी आधुनिक तकनीक सही, लेकिन यह पिछले कुछ सालों में आई काफी फायदेमंद तकनीकों में से एक है। इसमें एक खास तरीके की मशीन की मदद ली जाती है, जो लेजर किरणों का इस्तेमाल करके खेत को बिल्कुल ही समतल कर देता है।

एक बिल्कुल समतल जमीन पर पानी, हर पौधे तक समुचित मात्रा में जाता है। यह एक तरह से पूरे खेत में अच्छी फसल की गारंटी के बराबर है। इस वजह से पानी की भी काफी ज्यादा बचत होती है। खरीफ की फसल के मामले में इस प्रकार की खेती 20 सेमी तक पानी बचत कर सकती है। रबी फसलों के मामले में यह बचत पांच सेमी तक की होती है।

अब तो कई उद्यमियों ने काफी बड़ी तादाद में लेजर की मदद से जमीन को समतल करने वाली मशीनों का आयात करना शुरू कर दिया है। वे इन मशीनों को किसानों को किराए पर उपलब्ध करवाते हैं। दूसरी तरफ, सीड-ड्रिल्स का निर्माण तो अब अपने मुल्क में भी होने लगा है। पिछले कुछ सालों में इन ड्रिल्स को बनाने वाली 150 से ज्यादा इकाइयां तो अकेले पंजाब में ही लग चुकी हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक मंगला राय का कहना है कि, 'संरक्षण खेती की वजह से जमीन की उत्पादकता में काफी इजाफा होता है। साथ ही, यह पानी, ऊर्जा और जमीन की उर्वरता का भी पूरा संरक्षण करती है। इस वजह से लागत में 20 से 30 फीसदी तक की कमी होती है। इसकी वजह से प्रति हेक्टयर औसतन 2500 रुपये की बचत होती है।'

अहम बात यह भी है कि यह पर्यावरण के लिए भी काफी अच्छा है। साथ ही, यह ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण में आ रहे बदलावों को भी रोक सकता है। राय का भी कहना है कि, 'अगर इस नई तरह की खेती को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया तो यह कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा को कम करने में मदद कर सकती है।

असल में बिना जुते खेत कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेते हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद मिलती है।' संरक्षण खेती की अहमियत और इस मामले में भारत की अहम भूमिका को देखते हुए ही चौथे विश्व संरक्षण खेती कांग्रेस का आयोजन नई दिल्ली में अगले साल फरवरी में हो रहा है।

इसे आईसीएआर और दूसरे बड़े राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थान मिलकर आयोजित कर रहे हैं। इसमें संरक्षण खेती के 1000 से ज्यादा विशेषज्ञों के हिस्सा लेने की उम्मीद है। प्राकृतिक संसाधनों की बुरी गत को देखते हुए ही हमारे मुल्क को इस तकनीक को काफी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की जरूरत है।

प्राकृतिक संसाधनों की बुरी गत की वजह से ही हमारे मुल्क की मिट्टी की उर्वरता कम होती जा रही है और पैदावार भी कम हो रही है। जाहिर सी बात है, संरक्षण कृषि इन सभी दुखों के लिए एक रामबाण इलाज साबित होगी।
Keyword: protection agriculture can become medicine of lakhs problems,
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