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नई तकनीक से मुर्गीपालन उद्योग में आया दमखम
खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  February 11, 2014

भारत के पोल्ट्री यानी मुर्गी पालन क्षेत्र का पूरी तरह कायाकल्प हो चुका है। अब यह कुछ अतिरिक्त आमदनी के लिए घरों में छोटे पैमाने पर चलाए जाने वाले उद्योग से पूरी तरह तकनीक पर आधारित और तेजी से बढऩे वाले उद्योग में परिणत हो गया है। यह कायापलट कई पैमानों पर बेहद खास है। इसका एक खास पहलू यही है कि कई दूसरे विकासशील देशों की तुलना में यह क्षेत्र तकनीक निर्माण के साथ-साथ जरूरी उपकरणों और आगतों के निर्माण के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया है। साथ ही मुर्गियों के प्रजनन, उनकी बीमारियों की पहचान, टीकों के विकास और प्रसंस्कृत पोल्ट्री उत्पादों के लिहाज से इसने विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा भी विकसित कर लिया है। इसमें अहम बात यही है कि इस प्रगति में सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के समन्वित प्रयासों का योगदान रहा है। दुग्ध उद्योग में जहां अधिकांश वृद्घि चार-पांच गाय/भैंस रखने वाले छोटे उत्पादकों के असंगठित क्षेत्र के दम पर हुई है, उसके उलट पोल्ट्री क्षेत्र में आई क्रांति के पीछे संगठित क्षेत्र का पोल्ट्री कारोबार है। देश के कुल पोल्ट्री उत्पाद का 70 फीसदी से ज्यादा संगठित क्षेत्र से आता है और इसकी अधिकांश बिक्री शहरों में होती है।

पोल्ट्री उद्योग का शहरों की ओर झुकाव शहरी और ग्रामीण इलाकों में अंडों और मांस की उपलब्धता का ही अनुचित नतीजा है। आधिकारिक अनुमानों के अनुसार शहरों में जहां प्रति व्यक्ति 170 अंडों की उपलब्धता है तो वहीं ग्रामीण इलाकों में यही  आंकड़ा बमुश्किल 20 है। पोल्ट्री मांस के उपभोग का भी कमोबेश यही रुझान है। देश के पोल्ट्री क्षेत्र का एक और चौंकाने वाला पहलू यह है कि उत्पादन के मोर्चे पर तेजी आने के बावजूद उपभोक्ताओं की पसंद व्यापक तौर पर जस की तस बनी हुई है। अधिकांश खरीदार मुर्गियां खरीदना ही पसंद करते और उन्हें अपने सामने ही हलाल कराते हैं। इसके अलावा संगठित क्षेत्रों में पाली जाने वाली सफेद मुर्गियों के मांस पर देहाती इलाकों में पाले जाने वाले रंगे बिरंगे पंखों वाले ब्रॉयलर चिकन को ही तरजीह दी जाती है। यही बात भूरे रंग के अंडों पर लागू होती है, जिनके लिए ग्राहक अधिक कीमत चुकाने को भी तैयार रहते हैं। ऐसे में ग्राहकों की पसंद का ख्याल रखना पोल्ट्री उद्योग का खास मकसद है। वे ऐसी प्रजातियों के विकास पर काम कर रहे हैं, जो देसी बहुरंगी मुर्गियों की तरह नजर आ सकें और उनसे भूरे रंग के अंडे प्राप्त हो सकें। दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र के पोल्ट्री ब्रीडर्स का घरों में चलने वाली पोल्ट्री फार्मिंग को लोकप्रिय बनाने का एक और अतिरिक्त मकसद है, जिन्हें ऐसी उच्च क्षमताओं वाली प्रजातियों के विकास के जरिये हासिल किया जा सकता है, जो घरों के अलावा फैक्टरी फार्मों में भी आसानी से अनुकूलित हो सकें।

निजी क्षेत्र के पोल्ट्री ब्रीडर्स के अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की पोल्ट्री अनुसंधान शाखा और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों ने हाल के वर्षों में व्यापक रूप से अनुकूलित होने वाली प्रजातियां विकसित की हैं। इज्जतनगर (बरेली) के केंद्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान (सीएआरआई) ने अकेले ही रंगबिरंगी मुर्गियों की दर्जनों प्रजातियां विकसित की हैं, जो मांस और अंडे दोनों के उत्पादन के लिहाज से मुफीद हैं। इनमें से कुछ तो वाणिज्यिक पोल्ट्री फार्मों के साथ-साथ घरों में चलने वाले दड़बों तक पहुंच गई हैं। अन्य अनुसंधान केंद्रों में विकसित हुई नई प्रजातियां भी वाणिज्यिक रूप से इस्तेमाल किए जाने के लिए तैयार हैं। कृषि के लिए वाणिज्यिक ओर वाणिज्यिक योग्य तकनीकों के लिए शुरू आईसीएआर के नए प्रकाशन की शृंखला में इन नई प्रजातियों का उल्लेख किया गया है। प्राणि विज्ञान क्षेत्र की सूची में 20 ऐसी प्रजातियों का जिक्र है, जिन्हें या तो पोल्ट्री किसानों को दे दिया गया है या फिर उन्हें वाणिज्यिक उत्पादन के लिए इच्छुक उद्यमियों को दिया जा रहा है। आईसीएआर के उप महानिदेशक (प्राणि विज्ञान) के एम एल पाठक कहते हैं कि ऐसी प्रजातियों की उपलब्धता ग्रामीण इलाकों में पोल्ट्री को लोकप्रिय बनाने में मदद करेगी, साथ ही इससे अनुसंधान संगठनों और छोटे एवं बड़े वाणिज्यिक पोल्ट्री उपक्रमों के बीच कड़ी भी मजबूत होगी। इन नई प्रजातियों में वनराज, ग्रामप्रिया, क्रिशब्रो और मढ़ावरम चिकन-1 प्रमुख हैं। ये पूरी तरह से घरों में मौजूद दड़बों में पालने के लिए विकसित की गई हैं और ये ग्रामीण इलाकों में मौजूद छोटी वाणिज्यिक इकाइयों के लिए भी सही हैं।

अपने रंग बिरंगे पंखों और भूरे अंडों के चलते इन प्रजातियों की बाजार में अच्छी खासी धमक है और उनके विपणन में भी कोई दिक्कत नहीं है। इनमें से कुछ खासतौर से क्रिशब्रो को तो आसानी से देसी मुर्गी के तौर पर ऊंचे दाम पर बेचा जा सकता है। इसका मांस भी देसी मुर्गी के मांस जैसा ही है। इसके ब्रॉयलर का वजन भी छह हफ्तों में 1.5 से 2 किलो का हो जाता है। ऐसी प्रजातियां छोटे और सीमांत किसानों को कुछ अतिरिक्त आमदनी के लिए पोल्ट्री फार्मिंग की ओर आकर्षित कर सकती हैं।

Keyword: Poultry, City, Meat,
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Comments
 
EKNATH VASANT JADHAV
11-Jan-18
 
मुझे भी पोल्ट्री फॉर्म बनाना है. तो किससे पुछतास करू
  आपका मत
 क्या एस्सार स्टील पर वेदांत-जेएसडब्ल्यू की बनेगी बात?
हां नहीं  
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