बिजनेस स?टैंडर?ड - आया नया निजाम तो पुराने काम पर विराम
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, October 04, 2022 10:02 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

आया नया निजाम तो पुराने काम पर विराम
सुबीर गोकर्ण /  February 10, 2014

लगभग सभी वानरों समेत कई जीवों में अल्फा मेल (तेजतर्रार नर) की अवधारणा मौजूद है। एक खास समय में किसी नर का समूह पर दबदबा होता है। इस दबदबे की बदौलत ही तमाम अन्य चीजों के अलावा उसे प्रजनन का अधिकार भी होता है। लेकिन जब किसी ताकतवर नर में कमजोरी के चिह्नï नजर आने लगते हैं तो समूह का कोई अन्य नर उसे चुनौती देता है, कई बार उनमें लड़ाई भी होती है जो किसी एक की मौत के साथ ही समाप्त होती है। इसके बाद वह नया नर नेता सबसे पहले समूह के सभी नवजातों की हत्या कर देता है क्योंकि वे जाहिर तौर पर उसके पूर्ववर्ती की संतान होते हैं।
यह उसकी अपनी संततियों को जन्म देने की गति बढ़ाने की कोशिश भी हो सकती है ताकि वह अपने नेतृत्वकाल में अधिकाधिक संतानों को जन्म दे सके। बच्चों की हत्या करके वह अपने समूह की मादाओं के स्तनपान को खत्म कर देता जिससे वे दोबारा प्रजनन के लिए तैयार हो जातीं। इस तरह यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक 'अल्फा' अपने समूह में अपनी संततियां छोड़ जाना चाहता है। इसके पीछे वजह चाहे जो भी हो लेकिन तमाम ऐसे अध्ययन और दस्तावेज हैं जो गुरिल्ला, चिंपांजी, बबून, लंगूर और अन्य बंदरों में ऐसे व्यवहार की पुष्टि करते हैं।
अगर हम भूल न गए हों तो मानव भी इसी तरह व्यवहार करता है। समूची वानर प्रजाति के व्यवहार में ऐसा आचरण मौजूद है जिसकी जड़ें तलाश की जा सकती हैं। दुखद बात यह है कि नवजातों की हत्या भी ऐसी ही एक प्रवृत्ति है। लेकिन यह आलेख कन्या भ्रूण हत्या के बारे में नहीं है। बल्कि यह दूसरे संदर्भ में है यह प्रशासनिक मामलों में अपने पूर्ववर्तियों की 'संततियों' को खत्म करने से ताल्लुक रखता है। यह आलेख दरअसल प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त अल्फा मेल सिंड्रोम (एएमएस) पर आधारित है।
कई साल पहले की बात है, उस वक्त मैं एक नीतिगत शोध संस्थान में काम करता था। वहां अनेक सरकारी एजेंसियों की फंडिंग वाली परियोजनाएं चलाई जाती थीं। हमें एक समस्या का सामना करना पड़ता था। अनेक ऐसी परियोजनाएं थीं जहां काम तो लगभग पूरा हो चुका होता था लेकिन पूंजी देने वाला उसे पूरा नहीं करता था। इनमें से कई तो वर्षों तक इसी स्थिति में लटकी रहती थीं। गहन परीक्षण करने पर एक आम बात यह पता चली कि संबंधित एजेंसी का प्रमुख व्यक्ति बदल चुका है। उस पद पर आने वाला नया व्यक्ति अपनी प्राथमिकताओं के साथ काम करना चाहता है और इसलिए उसने अपने पूर्ववर्ती के काम को यूंही किनारे लगा दिया है।
भारतीय रिजर्व बैंक में अपने कार्यकाल के दौरान मेरा सामना ऐसी कई घटनाओं से हुआ। यह सब संस्थान के अंदर भी हुआ और बाहर भी। बहरहाल, एक घटना जो बेहद उभरकर मेरे सामने आई वह एक जिलाधिकारी से ताल्लुक रखती है। उनसे मेरी पहली मुलाकात वित्तीय समावेशन से जुड़ी एक कार्यशाला में हुई थी।
हमने उनके जिले में एक आयोजन किया था जिसे व्यापक स्तर पर सराहना हासिल हुई थी। उस कार्यक्रम के जरिये महिलाओं को बेहद प्रभावी स्वयं सहायता समूह के ढांचे में लाया गया था। इससे उत्पादन का एकीकरण करने और उसे बेचने में आसानी हो रही थी। इस मुलाकात के कुछ वक्त बाद मैं एक दूसरे जिले में गया जहां वह मजिस्ट्रेट बन चुके थे। मैंने उनसे कार्यक्रम के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि वह रुका पड़ा है। इसकी वजह पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उनके बाद वहां आए जिलाधिकारी की प्राथमिकताएं अलग हैं। नए अधिकारी ने जब उक्त अधिकारी के काम की तारीफ देखी तो उन्हें लगा कि उन्हें कुछ अलग पहल करके उसका श्रेय हासिल करना चाहिए। ऊपर दिया गया उदाहरण एएमएस के नकारात्मक पहलू की ओर ध्यान आकृष्टï कराता है। बहरहाल, साफ कहा जाए तो प्रशासनिक संदर्भों में एएमएस को बदलाव का सकारात्मक और रचनात्मक उपाय भी बनाया जा सकता है। कई संस्थानों में इसका उदाहरण भी देखने को मिला है। लेकिन जब हम किसी बात के दोनों हिस्सों पर नजर डालते हैं तो हमें इस हकीकत का सामना करना होता है कि एएमएस या तो सकारात्मक होता है या नकारात्मक लेकिन कई अवसरों पर यह एक साथ दोनों तरह के काम करता हुआ भी नजर आता है।
राज्य सरकारों के स्तर पर भी हमें हाल के दिनों में इस बात के कई उदाहरण देखने को मिले हैं। दो नई राज्य सरकारों ने हाल ही में बहुब्रांड खुदरा पर अपनी पूर्ववर्ती सरकार के फैसले को बदल दिया है। दिल्ली सरकार ने बिजली वितरण के मॉडल की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाए हैं। उसका मानना है कि वितरण कंपनियां ग्राहकों से अवैध रूप से पैसे वसूल रही हैं। दोनों के बीच विवाद पैदा हो गया है और संभव है कि सरकार कंपनियों के वितरण लाइसेंस ही रद्द कर दे। इन कदमों को सकारात्मक माना जाएगा अथवा नकारात्मक?
मेरा मानना है कि ये सभी नकारात्मक व्यवहार के उदाहरण हैं। मुझे पूरा यकीन है कि अनेक लोग मुझसे नाखुश होंगे लेकिन मैं बताता हूं कि मैं इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचा। खुदरा में एफडीआई की दलील है देश भर में एक आपूर्ति शृंखला तैयार करना। भारत का आकार इस लिहाज से बहुत बड़ा आकर्षण है। तमाम खुदरा शृंखलाएं इसके आकार का ही लाभ उठाना चाहती हैं। इस क्रम में वे आपूर्ति शृंखला में ऐसा निवेश करेंगी जिसका फायदा किसानों को मिलेगा और रोजगार भी पैदा होगा। राष्ट्रव्यापी स्तर पर बाजार का विकास करने के क्रम में छोटे राज्य इसका हिस्सा बनने से इनकार नहीं कर सकते।
बिजली की बात की जाए तो वास्तविक चुनौती नियामकीय संस्था को है। क्षेत्र में निजी निवेश की व्यवहार्यता बनाए रखने के लिए एक विश्वसनीय स्वतंत्र नियामक का होना भी उतना ही आवश्यक है। सरकार की दलील में नियामकीय स्वतंत्रता पर भी सवाल उठे हैं क्योंकिकहा गया है कि वितरण कंपनियां मनमाना शुल्क लागू कर रही हैं। यह बात सच हो सकती है लेकिन अनुबंध रद्द करने के पहले इन बातों को साबित करना होगा। लेकिन यह भी सच है कि समस्या का हल केवल वितरकों से निपटने में नहीं है बल्कि इसके लिए नियामकीय ढांचे में भी बदलाव लाना होगा। इसे अगर व्यापक नीतिगत संदर्भों में रखकर देखा जाए तो लंबी अवधि के विकास की मौजूदा अवधारणा मजबूत और विश्वसनीय संस्थानों की वकालत करती नजर आती है। आर्थिक विकास के लिहाज से देखा जाए तो ऐसे संस्थान लंबी अवधि की प्रतिबद्घताओं को प्रोत्साहन देते हैं। वे बुनियादी विकास में निवेश और संसाधनों के इस्तेमाल पर बल देते हैं ताकि अर्थव्यवस्था की हालत खराब न हो। अगर सरकार के हर कदम से संस्थाओं को इसी तरह नुकसान पहुंचे तो फिर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश की भारी कमी हो जाएगी। इसका विकास पर अनिवार्य रूप से असर होगा।
किसी भी क्षेत्र के निवेश पर नीतिगत निरंतरता का गहरा असर होता है। अपने पूर्ववर्तियों की नीतियां बदलने के क्रम में यह जोखिम बना रहता है कि कहीं नई सरकारें सतत विकास के लिए जरूरी संस्थानों की आधारशिला को भी न हिला दें। (लेखक ब्रुकिंग्स इंडिया के शोध निदेशक और भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर हैं। लेख में प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।)

Keyword: Governments, Decisions, FDI,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या कच्चे तेल में तेजी से रुपये पर और बढ़ेगा दबाव
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.