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गांधी के स्वप्न का स्वराज बनाम छोटे-छोटे गणराज्य
श्रीकांत सांब्राणी / नई दिल्ली January 30, 2014

महात्मा गांधी अगर आज जीवित होते तो देश में निहित स्वार्थों के चलते उभर आए छोटे-छोटे असंख्य समूहों को देखकर उनका मन निराशा से भर जाता। गांधी के साथ काल्पनिक संवाद कर रहे हैं श्रीकांत सांब्राणी

महात्मा गांधी के साथ एक काल्पनिक बातचीत

बापू, पिछली लगभग दो पीढिय़ों से हमने गणतंत्र दिवस की धूमधाम देखी है और उसके ठीक चार दिन बाद आपके सादगी और बलिदान से भरे जीवन को श्रद्घांजलि भी दी है। क्या यह बात आपको असंगत लगती है?

शायद ही ऐसा होता है। पहली बात, यह जरूर है कि ऊपरी तौर पर मैंने सादगी भरा जीवन जिया (मेरा भीतरी जीवन अधिक जटिल था), लेकिन वह मेरा चयन था। मैंने अपनी प्रिय बातों को कभी नहीं त्यागा और जो कुछ मेरी सीमा में था, हर उस चीज का इस्तेमाल किया। इस लिहाज से देखा जाए तो मैंने कोई त्याग नहीं किया। जहां तक गणतंत्र दिवस की बात है, अगर मैं प्रतीकों का मोल नहीं जानूंगा तो कौन जानेगा? मैंने जवाहर को प्रधानमंत्री के रूप में भव्य प्रासाद में जाने से नहीं रोका, अगर भव्यता के इस्तेमाल के कुछ अवसर सामने आते हैं तो मुझे उसकी शिकायत क्यों करनी चाहिए?

हालांकि मैं तुम्हें बताऊंगा कि इस बार किस बात ने मुझे निराश किया। ऐसा लगता है कि भारतीय अब कई गणराज्यों की पूर्ति कर रहे हैं लेकिन भारतीय गणराज्य की नहीं। नहीं, मेरा मतलब भारत की भौगोलिक सीमाओं से नहीं बल्कि गणराज्य की अवधारणा से है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी भारतीय प्रांत का प्रमुख अपने संवैधानिक दायित्वों को ताक पर रखकर प्रदर्शन करने बैठ जाएगा। मुझे इससे यही संकेत मिलता है कि उसकी पार्टी सड़क पर विरोध प्रदर्शन करने के अपने ही अराजक गणराज्य में बने रहने को प्राथमिकता देती है।

लेकिन उनका कहना है कि वे दमनकारी सत्ता के विरुद्घ शांतिपूर्ण प्रतिरोध के आपके रास्ते पर चल रहे थे?

हा...हा. यह भी खूब कही! पहली बात, दक्षिण अफ्रीका और भारत में मेरे सभी विरोध प्रदर्शन उस अल्पसंख्यक सत्ता तंत्र के विरुद्घ थे जो बहुसंख्यक जनता का उसकी इच्छा के विरुद्घ दमन करते थे। भारत में तो आपकी अपनी सरकार है। अगर वह दुव्र्यवहार करती है तो मुझे यकीन है कि गणराज्य के संस्थापक पूर्वजों ने उससे निपटने का तरीका बताया है लेकिन उस तरीके में यह शामिल नहीं है कि आप शासन का अपना ही धर्म भूल जाएं। शायद वे तरीके कमजोर हैं और उनमें अधिक वक्त लगता है लेकिन बगैर अराजकता फैलाए भी उन्हें बदला जा सकता है। आखिर अपनी सत्ता के विरुद्घ सविनय अवज्ञा और असहयोग जैसे कदम कैसे उठाए जा सकते हैं?

बहरहाल, मुझे उम्मीद है कि यह दौर जल्दी बीत जाएगा तो इसकी चिंता छोड़ते हैं। मेरी चिंता में दूसरे अनेक गणराज्य शामिल हैं। काफी बाद में मुझे पता चला कि अमीरों ने गुडग़ांव की गेट वाली रिहायशी कॉलोनियों, दिल्ली के फॉर्महाउसों और दक्षिण मुंबई आदि में अपने अलग गणराज्य विकसित कर लिए हैं और वे वहीं निवास करते हैं। जब एक राजनयिक ने उस देश का कानून तोड़ा जहां वह पदस्थ थी तो सारा बुर्जुआ राजनयिक प्रतिष्ठान उसके बचाव में उतर गया क्योंकि उसके उस गणराज्य को चुनौती मिली थी जो देश के साधारण नागरिकों से इतर उनको विशेषाधिकार देता है और विभिन्न किस्म के संरक्षण भी।

हालांकि मैंने न्यासधारिता की हिमायत की थी लेकिन मैंने कभी यह नहीं माना कि तमाम कारोबारों को उसी तरह चलाया जाना चाहिए। लेकिन जब उनमें से कुछ ने कानून से अपने लिए कुछ ज्यादा ही अपवाद जुटाने शुरू कर दिए तो उन्होंने दिखाया कि कैसे गणतंत्र के बाहर अपने लिए अलग जगह बनाना उनकी प्राथमिकता में है। मैं चाहता था कि आजादी के बाद कांग्रेस को समाप्त कर दिया जाए हालांकि मुझे पता था कि ऐसा नहीं होगा। मुझे खेद है कि आज कांग्रेस नेतृत्व को लगता है कि वह देश की जनता को पात्रताओं की आपूर्ति कर रही है।

दरअसल देश की जनता को यह अधिकार अपनी नागरिकता के साथ स्वाभाविक तौर पर हासिल है। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस गणराज्य में उन्हें अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए कांग्रेस नेताओं का अनुग्रह हासिल करना होता है। भारतीय जनता पार्टी के गणराज्य में बहुलतावादी लोगों के लिए कम ही स्थान है। वामपंथी अभी तक मजदूर वर्ग के शासन का ख्वाब पालते हैं जबकि उनके चरमपंथी साथी बंदूक की नली से सत्ता हासिल करने की कोशिश में हैं। उनको इस बात का अहसास ही नहीं है कि गोली से ज्यादा ताकत मतपत्र में होती है। लेकिन उन सबका दावा है कि जनता उनके साथ है और वे केवल लोकतांत्रिक मार्ग का ही अनुसरण कर रहे हैं।

इस झांसे में आने की आवश्यकता नहीं है। अगर लोकतंत्र का अर्थ केवल साधारण बहुमत है तो यह दमनकारी हो सकता है। क्या इससे हिंदुओं में अस्पृश्यता नहीं फैलती? और मुस्लिमों को भय के वातावरण में जीने के लिए नहीं छोड़ दिया जाता? हमें लोकतंत्र में गणतांत्रिक मूल्यों की स्थापना करनी होगी। प्लेटो के अनुसार सुकरात (जिनका मैं बहुत सम्मान करता हूं) ने 2500 साल पहले कहा था कि सभी मनुष्य एक समान नहीं पैदा होते। ऐसे में वह गणराज्य लाभप्रद होता है जिसमें वे एकदूसरे पर निर्भरता के साथ विकास करते हैं। गणराज्य के संरक्षक समझदारीपूर्वक शासन करते हैं और न्याय तथा सत्य उनके निर्देशक सिद्घांत होते हैं। गणराज्य हर किसी के फायदे के लिए होता है न कि किसी एक समूह के लिए।

प्लेटो ने यह भी कहा था कि सभी देशों का संविधान बुरा है और उनके संस्थान अतीत की बात हो चुके हैं। ऐसा क्यों होता है और इससे कैसे निजात पाई जा सकती है?

अपनी ही छोटी-छोटी चिंताओं में उलझे हुए हैं। जब हम समाज पर पडऩे वाले असर की परवाह किए बिना अपने लिए चीजें मांगते हैं तो यह दुराग्रह है हालांकि हम इसे सत्याग्रह का नाम देते हैं। मेरा बेटा हीरालाल ताउम्र इस बात को लेकर कुढ़ता रहा कि मैंने उसे अपना बेटा होने का फायदा नहीं उठाने दिया। एक अच्छे 'बनिया' की तरह मैंने कभी सस्ती या मुफ्त की चीजों को लेकर होने वाले शोरगुल का समर्थन नहीं किया। अगर आप किसी चीज का वास्तविक मूल्य तक नहीं चुकाते हैं तो आप चोरी करते हैं।

टॉल्सटॉय और फीनिक्स आश्रमों में हर किसी ने अपनी आजीविका के लिए काम किया। अगर कोई कमजोर होता था तो हम उसकी मदद करते थे लेकिन हमने कभी यह नहीं कहा कि कोई चीज अगर सबके लिए है तो उसे किसी को प्राथमिकता के आधार पर सौंप दिया जाए। मुझे खुशी है कि अब आप लोग ऐसे प्रयासों को धरना कहकर पुकार रहे हैं क्योंकि वह सत्याग्रह तो कतई नहीं है।

जब हमारे निजी हित बाकी बातों पर भारी पडऩे लगते हैं तो भारतीय गणराज्य की कीमत पर कई आंतरिक गणराज्यों का उदय होता है। वे ऐसे टापू हैं जो एक दूसरे तक से संवाद नहीं करते। दुर्घटनाएं वास्तविकता हैं और न्याय तथा प्रशासनिक संस्थान किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला हैं। ऐसे में निदान सभी संस्थाओं को खारिज करने में नहीं बल्कि उनको नया जीवन देने में है। हमें अच्छी सरकार की आवश्यकता है।

हमें पुलिस और कानून व्यवस्था की आवश्यकता है। इनका कामकाज परस्पर अविश्वास नहीं बल्कि भरोसे के बल पर चलना चाहिए। नरसी मेहता ने सही कहा था कि सच्चा वैष्णव ही दूसरों का दुख महसूस कर सकता है जिसके मन में अभिमान न हो। मुझे आज भी उन वैष्णव संरक्षकों की प्रतीक्षा है जो हमारे संस्थानों और गणराज्य को बहाल कर सकें और जिनका ध्येय है सत्यमेव जयते।

Keyword: mahatma gandhi,
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