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खतरों में घिरे 'कड़कनाथ' के सिर पर पेटेंट का हाथ!
शशिकांत त्रिवेदी / भोपाल January 09, 2014

बासमती चावल का पेटेंट मिलने से खुश हुई मध्य प्रदेश सरकार अब 'कड़कनाथ' का पेटेंट हासिल करने की कोशिश में जुट गई है। कड़कनाथ असल में मुर्गे की नस्ल है, जो ज्यादा खपत की वजह से 1990 की दशक में पूरी तरह खत्म होने के कगार पर पहुंच गई थी। कड़कनाथ मुर्गा राज्य के पश्चिमी हिस्से में मौजूद आदिवासी बहुल झाबुआ जिले में पाया जाता है। आदिवासी इसे 'काली मासी' भी कहते हैं क्योंकि यह बिल्कुल काले रंग का होता है।

90 के दशक में यह एकाएक चर्चा में आ गया था, जब पता चला कि यह नस्ल खत्म होने ही वाली है। दरअसल रसूखदार लोग इसे बेहद पसंद करते हैं क्योंकि इसका गोश्त बेहद लजीज होता है और पौरुष शक्ति बढ़ाने वाला भी माना जाता है। इसीलिए इसे बहुत ज्यादा खाया जाता था। जब इस पर विलुप्ति का खतरा मंडराने लगा तो इसे राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेष परियोजना के तहत लाया गया और ग्रामीणों की जीविका के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली के तहत लाया गया।

किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग जल्द ही इसका पेटेंट हासिल करने के लिए आवेदन करेगा। कड़कनाथ के अलावा सरकार शरबती गेहूं, जमनापारी बकरी और निमाड़ी गाय के पेटेंट के लिए भी आवेदन करेगी। किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग के प्रधान सचिव राजेश रजौरा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'हम जमनापारी बकरी, निमाड़ी गाय, कड़कनाथ मुर्गा और शरबती गेहूं के पेटेंट का आवेदन करेंगे।'

जमनापारी नस्ल बकरियों में सर्वोत्तम मानी जाती है और निमाड़ी गाय सूखे में भी आसानी से को बकरियों के नस्ल में सर्वोत्तम माना जाता है, जबकि निमाड़ी गाय सूखे में भी सुरक्षित रहती है। बासमती चावल के पेटेंट को भौगोलिक पहचान पंजीकरण, चेन्नई से मंजूरी मिलने के बाद राज्य सरकार पेटेंट की दिशा में आगे कदम बढ़ा रही है। जीआई रजिस्ट्री ने कृषि निर्यात करने वाली संस्था कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) को निर्देश दिया है कि वह जीआई आवेदन को संशोधित कर उसे दायर करे और उसमें मध्य प्रदेश के बासमती चावल को भी शामिल किया जाए।

राज्य कृषक कल्याण एवं कृषि विकास विभाग, मध्य प्रदेश क्षेत्र बासमती उत्पादक संगठन समिति और दावत फूड्स लिमिटेड ने 2001 में इसके खिलाफ अपील दायर की थी। जीआई रजिस्ट्री ने कहा, 'एपीडा के इस निर्णय से किसानों और मिल मालिकों को नुकसान होगा। ऐसे में एपीडा को संशोधित आवेदन दायर करना होगा।' राजौरा ने कहा, 'जीआई का आदेश हमारे लिए जीत की तरह है।

एपीडा अब राज्य के बासमती चावल के लिए आवेदन में संशोधन करेगा। हमें चावल प्रसंस्करण मिलों के लिए निवेश भी मिल रहा है।' राज्य के रायसेन, हरदा और होशंगाबाद जिले में करीब 5 लाख किसान बासमती की खेती करते हैं और करीब 8 लाख टन बासमती का उत्पादन होता है, जिसे पांच मिलों में प्रसंस्कृत किया जाता है। इनमें से 40 से 50 फीसदी चावल का निर्यात किया जाता है।

Keyword: bhopal petent,
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