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एनआईआईटी : बड़ी हसरतों की ऊंची उड़ान
सुवीन कुमार सिन्हा /  September 15, 2008
विजय के. थडानी की जिंदगी में 2000 की 4 जनवरी एक बेहद खास दिन है।
उन्होंने यह शायद सोचा भी नहीं होगा कि आईआईटी दिल्ली में होस्टल के उनके एक साथी राजेन्द्र एस. पवार के साथ मिलकर बनाई गई उनकी कंपनी एनआईआईटी एक दिन शेयर बाजार में बढ़िया प्रदर्शन करेगी। उस दिन एनआईआईटी के एक शेयर का दाम 3,844 रुपये तक पहुंच गया था और उसका बाजार पूंजीकरण 14,837.84 करोड़ रुपये का हो गया था।

वह सूचना तकनीक में क्रांति का दौर था। उस वक्त लाखों युवाओं को सूचना तकनीक ने बेहद आकर्षित किया। कई उद्यमियों ने सूचना प्रौद्योगिकी शिक्षा से जुड़ी इस कंपनी को अमेरिका की सूचना तकनीक कंपनी ह्यूलिट पैकर्ड (एचपी) का दर्जा देते हुए बहुत ज्यादा निवेश किया।

एनआईआईटी के चेयरमैन पवार का कहना है, 'इस तरह के निवेश के बाद सबको यही उम्मीद होती है कि कंपनी के शेयरों में काफी रफ्तार दिखेगी। हालांकि सबकुछ ठीक इसके उलट हुआ और मंदी का दौर भी जल्द ही आ गया।' आईटी शिक्षा के बाजार का लगभग 40 फीसदी पूरी तरह खत्म हो गया। यह माना जा सकता है कि आईटी शिक्षा के सेक्टर में ही मंदी कायम होने लगी।

ऐसे दौर में 21 सितंबर, साल 2001 तक एनआईआईटी की बाजार कीमत महज 332 करोड़ रुपये तक सिमट गई थी। पवार ने अपने काम की शुरुआत करने से पहले अपनी टीम के साथ एक योजना तैयार की। उनकी यह योजना इस बात पर आधारित थी कि एनआईआईटी को पहले क्या करना चाहिए था और 1980 से 90 के दशक में 30 से 40 प्रतिशत की दर से जो बढ़ोतरी हो रही थी उसकी वजह से वे क्या नहीं कर पाए।

उनका अनुमान है कि कंपनी के पास दो तरह के लक्ष्य थे। इसमें से पहली चीज तो यह थी कि उन्हें पढ़ाई की बेहतर सामग्री तैयार करनी थी, जैसा कि उनका कहना है कि दुनिया के दूसरे लोगों से अच्छा ही करना है। और दूसरी बात थी शैक्षणिक प्रक्रिया प्रबंधन की।

एनआईआईटी के अस्तित्व में आने के पहले 20 साल के दौरान इन चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया गया। इसकी वजह से पहले दौर में ऐसी स्थिति बनी कि कंपनी की लागत और मुनाफे में एक संतुलन की स्थिति बन गई। पवार कहते है कि कोई भी कंपनी जिसका अस्तित्व 100 या उससे ज्यादा साल कायम रह सकता है उसमें इस तरह की बातें तो आती ही हैं।

उस समय तक पवार एक जनसांख्यिकीय लाभांश के अध्ययन में जुटे हुए थे। इस अध्ययन में यह बात निकल कर आई कि विकसित देशों में 4 करोड़ कुशल प्रोफेशनल लोगों की कमी है। दूसरी ओर भारत में 15-59 साल उम्र के लगभग 4 करोड़ 70 लाख लोग हैं जो काम करने की क्षमता रखते हैं।

पवार कहते हैं, 'हमारी कोशिश यह थी कि हम इन 4 करोड़ 70 लाख लोगों को इस मौके के लिए तैयार करें। हमलोगों ने यह भी महसूस किया कि भारत में कई तरह की वृद्धि की संभावनाओं के विकल्प मौजूद हैं।' आईटी के क्षेत्र में लोगों ने बेतहाशा निवेश किया था लेकिन उस हिसाब से मुनाफा नहीं मिल पा रहा था।

वैश्विक स्तर पर थोड़ी मंदी की स्थिति बनने लगी तो हमने यह कोशिश की कि हम दूसरे सेक्टर में भी अपने पांव पसारे। अपनी शुरुआत के  पहले 20 सालों के दौरान एनआईआईटी का मकसद विकासशील देशों में आईटी प्रतिभा का विकास करना था लेकिन उसके बाद इसने वैश्विक स्तर पर प्रतिभाओं के विकास के काम के लिए खुद को बदल लिया।

ऐसे हुआ कंपनी का कायाकल्प

कंपनी ने जैसे ही नए क्षेत्रों में अपना पांव पसारना शुरू किया वैसे ही इसका कुल मुनाफा दोगुने से ज्यादा हो गया। साल 2005-06 में कंपनी का कुल मुनाफा 450.7 करोड़ रुपये था जो 2007-08 में बढ़कर 1006.8 करोड़ रुपये हो गया।इस समय तक टैक्स चुकाने के बाद इसका मुनाफा 40.1 करोड़ रुपये से बढ़कर 75.6 करोड़ रुपये हो गए। शेयर बाजार में इस बात पर भी काफी गौर किया।

एनआईआईटी के बाजार की कीमत के बारे में कई तरह की आशंका भी जताई जाने लगी। इसकी वजह यह थी कि कोई भी इस बात को नहीं समझ पा रहा था कि कोई तकनीक से जुड़ी कंपनी 1999-2000 के स्तर को फिर से पा सकती है।

एनआईआईटी और इसकी सॉफ्टवेयर कंपनी एनआईआईटी टेक्नोलॉजी जो अगस्त 2004 में एक अलग कंपनी बन गई थी उसकी कुल कमाई एक हफ्ते पहले तक 2,126.35 करोड़ रुपये थी। मुंबई में आईटी सेक्टर के एक विश्लेषक का कहना है, 'एनआईआईटी का ज्यादा जोर शिक्षा पर ही है। किसी कंटेट पर विशेषज्ञता हासिल करने के बजाए उनका जोर लर्निंग सिस्टम और कार्य प्रक्रिया पर ही था।

यह कहना कि हम लोगों को किसी प्रोग्राम के लिए प्रशिक्षित करेंगे के बजाए उनका कहना था कि लोग जो सीखने की चाहत रखते हैं उसे वे कैसे सीख सकते हैं। ' पिछले साल सेंथिल पांडी चिन्नासामी ने इरोड के इरोड सेनगुंतर इंजीनियरिंग कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने यह महसूस किया कि चार साल के इलेक्ट्रिक कम्यूनिकेशन की डिग्री के बावजूद उनके लिए कोई नौकरी नहीं थी।

पिछले साल उन्होंने एनआईआईटी के छह महीने के कोर्स में दाखिला लिया और इस दौरान उन्होंने दो प्रोजेक्ट के लिए काम भी किया। चिन्नासामी का कहना है, 'इसको पूरा करने के बाद मेरे पास 5 से 6 नौकरियों के लिए ऑफर थे।' फिलहाल वह चेन्नई में थ्रीआई इन्फोटेक के लिए काम कर रहे हैं। चिन्नासामी की जिंदगी में ऐसे बदलाव लाने वाले एनआईआईटी के कोर्स के बारे में भी लोगों के विचार बदले।

अप्रैल 2006 से ही एनआईआईटी ने एक ऐसा कोर्स लॉन्च किया जो इंजीनियरिंग ग्रेजुएट को लक्षित करके बनाया गया था। कं पनी का कहना है कि अब भी एक साल में 100,000 इंजीनियर इस कोर्स में शामिल होते हैं। हालांकि पहले एनआईआईटी के बारे में ऐसी राय थी कि जिन लोगों को बेहतर इंजीनियरिंग कॉलेज में जाने का मौका नहीं मिलता वे यहां जाते है।

इसके अलावा आईटी सेवाओं वाली कंपनियां जो सबसे ऊंचे या मध्य स्तर की होती है वे एनआईआईटी के छात्रों को नहीं लेते हैं। थडानी इस बात पर असहमति जताते हुए कहते हैं, 'इस साल अप्रैल से अगस्त तक सबसे बेहतरीन पांच आईटी कंपनियों में 490 एनआईआईटी छात्रों को नौकरियां मिली हैं। आपको यह मालूम होना चाहिए कि इस देश के लगभग 25 फीसदी आईटी प्रोफेशनलों ने एनआईआईटी से ही सीखा है।

संभव है कि वे पहली नौकरी में टॉप कंपनी में नहीं जा पाएं लेकिन दूसरी और तीसरी नौकरी में उन्हें ऐसा मौका जरूर मिल जाता है।' समरजीत डे 1990 में बीआईटीएस पिलानी की फैकल्टी को छोड़कर एनआईआईटी में आए थे। वह धैर्य के साथ अपनी सामाजिक परिप्रेक्ष्य को समझाते हैं, 'शिक्षा का लाभ छात्रों को इस तरह ही मिलना चाहिए कि वे पहले चाहे जो कु छ भी हों लेकिन अब वे ज्यादा सक्षम बने और उन्हें उस क्षमता का आर्थिक लाभ भी मिले।

हो सकता है कि कुछ लोग क्लास में 90 प्रतिशत अंक लाएं और कुछ 50 प्रतिशत। अगर किसी को प्रीमियर इंजीनियरिंग कॉलेज में जाने का मौका मिलता है तो वह जा सकता है लेकिन कुछ लोगों के लिए एनआईआईटी भी सबसे बेहतर विकल्प होता है। '

कारोबारी शिक्षा का कारगर फॉर्मूला

70 के दशक की ही बात करें तो उस वक्त भी कम ही लोग इंजीनियरिंग कॉलिजों में दाखिला ले पाते थे। अधिकतर छात्र सामान्य, परंपरागत शिक्षा की ही राह पकड़ते थे। ऐसी पढ़ाई में नौकरी की कोई गारंटी नहीं हुआ करती थी। डे कहते हैं, 'एनआईआईटी ने उन लोगों को तकनीकी शिक्षा मुहैया कराई जो परंपरागत पढ़ाई कर रहे थे। अगर आप सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसने अपना बड़ा योगदान दिया है।'

अध्यक्ष के तौर पर थडानी नई तरह की पेशकशों में लगे हैं,  इसके अलावा कंपनी की विस्तार योजना को मूर्त रूप भी देने के काम में भी वह लगे हैं। थडानी का कहना है, 'हमारा संगठन बड़ा मजबूत है। इसमें किसी भी स्थिति से निपटने की क्षमता है। हम दोबारा से संगठित हुए और बाजार में अपनी वापसी की।'इसके संगठन की दृढ़ता के अलावा दूसरी खासियतों की वजह से ही तो इसको बाजार में सहयोग भी मिला।

कुशल क्षमता की वजह से ही इसने आईसीआईसीआई बैंक जैसे वित्तीय संस्थानों को प्रभावित किया। तभी तो वित्त, बैंकिंग और बीमा से जुड़े और आईएफबीआई जैसे संस्थान शुरू करने में आईसीआईसीआई ने एनआईआईटी का साझेदार बनना मुनासिब समझा। बैंक के मानव संसाधन विभाग के प्रमुख के. रामकुमार ने नवंबर 2006 की एक दोपहर में पवार को बुलाया। इससे पहले दोनों एक क्रिकेट मैच के दौरान मिले थे।

दरअसल बैंक को कुशल कर्मचारियों की किल्लत पड़ रही थी और एनआईआईटी अलग-अलग क्षेत्रों में बढ़ने की बात सोच रहा था। यह भी एक खास मुद्दा था जिसकी वजह से इन दोनों ने हाथ मिलाया। रामकुमार कहते हैं, 'कितने लोग इस मामले में सफल हो पाते हैं। यह एक शानदार अनुभव रहा। यह कोई अनुबंधित नहीं था बल्कि हमारे विश्वास ने इसकी सफलता में अहम भूमिका निभाई।'

आईसीआईसीआई की इन संस्थानों में 19 फीसदी हिस्सेदारी है। बैंक ने पहले सत्र में निकले सारे विद्यार्थियों को नौकरी देने का आश्वासन भी दिया। इस मामले में एचडीएफसी बैंक, कोटक महिंद्रा, विजया और दूसरे बैंक कुछ पीछे रह गए। इन बैंकों ने केवल 60 फीसदी को नौकरी देने की बात कही।

रामकुमार कहते हैं, ' कोई फ्रेशर पूरे काम को समझने में 9 से 12 महीने का वक्त लेता ही है। इस दौरान उपभोक्ताओं को कुछ परेशानी हो सकती है। अगर आईएफबीआई के किसी फ्रेशर की बात करें तो उनको एक महीने में ही आमतौर पर सारी चीजें समझ में आने लगती हैं।

इस तरह वह पहले दिन से तो नहीं लेकिन एक महीने में कंपनी के लिए कारगर साबित होने लगते हैं।'  अपनी शुरुआत के लगभग डेढ़ साल बाद आईएफबीआई के जरिये लगभग 7,500 प्रशिक्षु वित्तीय सेवाओं में नौकरी पा चुके हैं। थडानी कहते हैं, 'अगर कोई हमारे यहां आता है और हमें लगता है कि उसमें आईटी से जुड़ी चीजें सीखने की कूव्वत नहीं है तो हम उसे निराश नहीं करते।

हम अपने हिसाब से उसकी क्षमता में वृद्धि करके उसको वह सिखाते हैं जिसको सीखने के लिए वह हमारे यहां आता है। आप किसी भी आईसीआईसीआई बैंक में चले जाइए, आपको वहां एनआईआईटी में प्रशिक्षित लोग काम करते मिल जाएंगे।' वहीं बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग क्षेत्र की अगुआ कंपनी जेनपैक्ट प्रशिक्षित कर्मचारियों को तैयार करने के लिए एनआईआईटी के साथ मिलकर एक संस्थान शुरू करने की घोषणा कर चुकी है।

इसकी घोषणा इस साल जुलाई में हुई है। इसके जरिये शुरुआत में बिजनेस प्रोसेस, भाषा और बिजनेस कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके अलावा वित्त, एकाउंटिंग, बैंकिंग, बीमा और सप्लाई चेन जैसे विषयों से भी छात्रों को रूबरू कराया जाएगा। कंपनी ने एक तीसरी पहल भी की है। एनआईआईटी इंपेरिया ने एक ऐसी कंपनी को खरीद लिया है जो एक्जीक्यूटिव मैनेजमेंट प्रोग्राम चलाती है।

कामकाजी लोगों के लिए यह बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। एनआईआईटी की पहचान वैसे तो सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी है लेकिन प्रबंधन से जुड़कर कंपनी का दायरा और बढ़ गया है। भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद, कोलकाता, इंदौर के साथ मिलकर सितंबर 2006 में इंपेरिया की नींव पड़ी थी।

इंपेरिया ने आईआईएम लखनऊ, भारतीय विदेश व्यापार संस्थान (आईआईएफटी), और आईएमटी गाजियाबाद के साथ गठजोड़ किया है। सामान्य तौर पर कामकाजी लोगों को नौकरी के साथ पढ़ाई करने में मुश्किल आती है।  लेकिन इंपेरिया के लिए ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।

तकनीक से तालमेल

इसमें संयोजन तकनीक का सहारा लिया जाता है। एक सेंट्रल स्टूडियो को रिमोट क्लासरूम के साथ जोड़ा जाता है जो आमतौर पर किसी साझेदार संस्थान में मौजूद होते हैं। फैकल्टी के सदस्य सेंट्रल स्टूडियो से पढ़ाते हैं और स्टूडियो से जुड़े क्लासरूम में छात्र पढ़ रहे होते हैं। कोई भी छात्र किसी से भी बात कर सकता है।

यदि किसी छात्र को कोई सवाल करना है तो वह एक आइकन पर क्लिक करके अध्यापक से सवाल करने के लिए इजाजत मांग सकता है। परंपरागत तौर पर अध्यापक किसी छात्र को बुलाकर ब्लैकबोर्ड पर कुछ समझाने के लिए कहता है लेकिन इंपेरिया में यह अधिकार छात्र को दे दिया गया है।

डे कहते हैं, 'अभी भी कुछ चुनौतियां करकरार हैं। खासकर हर चीज क्लास में कर पाना अभी भी मुमकिन नहीं हो पाया है। लेकिन हमारा प्रयास यही है कि एक ही वक्त में अलग-अलग जगहों पर बैठे छात्रों को बढ़िया प्रशिक्षण एक साथ मिल सके। '

हालांकि, पढ़ाने की नई सामग्री नई वैश्विक प्रतिभा विकास कार्यक्रम का ही हिस्सा है। कंपनी को अफ्रीकी बाजार में उतरे हुए ज्यादा वक्त नहीं हुआ है। पिछली तिमाही में इसने इस महाद्वीप से अर्जित होने वाले राजस्व की घोषणा की। कंपनी के कुल राजस्व में अफ्रीका की हिस्सेदारी 7 फीसदी है।

कॉग्निटिव आट्र्स, और ऐलीमेंट के, के अधिग्रहण ने अमेरिकी बाजार में कंपनी के लिए रास्ता बना दिया है। एक हालिया मैक्वायर शोध रिपोर्ट के मुताबिक ऐलीमेंट के, प्रशिक्षण के लिहाज से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी लाइब्रेरी है। इसके परिचालन से एनआईआईटी का मुनाफा बढ़ेगा ही क्योंकि यह ऐलीमेंट के की लाइब्रेरी को अमेरिका के बाहर भी उपयोग कर सकेगी। नये एनआईआईटी का मानना है कि पवार सफलता की नई बुलंदियों पर सवार हो चुके हैं।
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