बिजनेस स्टैंडर्ड - 3जी पर दिमागी कसरत के नाम पर नौटंकी
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3जी पर दिमागी कसरत के नाम पर नौटंकी
सुनील जैन /  September 15, 2008
इस बात के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार संचार मंत्री ए. राजा और हमेशा चुपचाप रहने वाले मनमोहन सिंह ही हैं। अभी तो हाल ही में इन दोनों ने मिलकर अपनी पसंदीदा कंपनियों को 2जी स्पेक्ट्रम करीब-करीब मुफ्त में दे दिया था।
साथ ही, उन्होंने रिलायंस कम्युनिकेशंस को लाइसेंस देने के लिए एक अलग कैटेगरी ही बना डाली। शायद इतना काफी नहीं था, इसलिए तो उन्होंने अब मोबाइल फोन कंपनियों के लिए एक अलग कैटेगरी ही बना डाली, जिसमें कंपनियों को एक-चौथाई कीमत पर 3जी स्पेक्ट्रम मिलेंगे।

इस तरह उन्होंने 3जी स्पेक्ट्रम से मोबाइल फोन बाजार को खोलने के नाम पर नए खिलाड़ियों के वास्ते उसके दरवाजे और भी ज्यादा जोर से बंद कर दिए हैं। पहले बात करते हैं 3जी स्पेक्ट्रम के लिए होड़ के बारे में। एक अगस्त को सरकार ने 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के बारे में दिशानिर्देशों का ऐलान किया था, जो दिखने में ठीक-ठाक से लग रहे थे।

इस नीलामी में मौजूदा टेलीकॉम कंपनियों के साथ-साथ नई कंपनियां भी हिस्सा ले सकती थीं। दिक्कत सिर्फ इतनी सी थी कि इसके तहत नए खिलाड़ियों को 2जी लाइसेंस के लिए 1,651करोड़ रुपये ज्यादा चुकाने थे। इससे उन्हें लाइसेंस तो मिल जाता, लेकिन स्पेक्ट्रम नहीं मिलता। तो अब क्या बदला है?

सरकार ने 12 सितंबर को आए स्पष्टीकरण में यह बात साफ कर दी कि 3जी की दुनिया में कदम रखने की इच्छा रखने वाले नए खिलाड़ियों को 2जी लाइसेंस के लिए सरकार को 1,651 करोड़ रुपये चुकाने की जरूरत नहीं है। वे अब इसे किसी भी पुरानी कंपनी से खरीद सकते हैं।

मतलब साफ है कि इस कदम से सरकार को नहीं, बल्कि प्राइवेट कंपनियों को मोटा मुनाफा होने वाला है। जो कंपनियां अपना बोरिया-बिस्तर समेटने की इच्छुक हैं, उन्हें अब 2जी लाइसेंस के लिए मोटी कीमत मिलेगी। उथल-पुथल के इस दौर में कई बड़ी विदेशी कंपनियां अपने पैर फैलाने की भी ख्वाहिशमंद नहीं हैं। इसलिए इस नीलामी में उतने ही खिलाड़ी हिस्सा लेंगे, जितने लाइसेंस होंगे।

इस नजरिये से देंखे तो नीलामी से सरकार को किसी भी हालत में 13-14 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई नहीं होगी। 3जी पॉलिसी के बनने के वक्त जो 45 हजार करोड़ रुपये की कमाई की बात कही जा रही थी, उसे तो भूल ही जाइए।

3जी पॉलिसी में एक और बदलाव सीडीएमए मोबाइल फोन कंपनियों के लिए 800 मेगाहट्र्ज बैंड जो स्पेक्ट्रम रिजर्व रखा गया था, उसमें किया गया है। सरकार का पहले कहना था कि सीडीएमए मोबाइल फोन कंपनियों को इस नीलामी में हिस्सा लेने की जरूरत नहीं है। लेकिन वे अगर जीएसएम मोबाइल फोन कंपनियों के बराबर पैसे दे देती हैं, तो उन्हें भी 3जी स्पेक्ट्रम मिल सकता है।

दिक्कत यह थी कि 800 मेगाहट्र्ज बैंड में केवल एक जगह थी। बकौल सरकार, यह स्पेक्ट्रम सबसे ज्यादा ग्राहकों वाली सीडीएमए टेलीकॉम कंपनी (रिलायंस कम्युनिकेशन) को मिलती। लेकिन सरकार ने अब हिस्से को ही हटा दिया है। मतलब अब टाटा भी इस दौड़ में शामिल हो सकती है। साथ ही, इससे सीडीएमए मोबाइल फोन बाजार में नई कंपनियों को उतरने का मौका मिलेगा।

यह एक अच्छा कदम है, लेकिन ब्रॉडबैंड वायरलैस एक्सेस (बीडब्ल्यूए) पर इस नीति ने सबकुछ गुड़गोबर कर दिया। चूंकि इसमें तार की जरूरत नहीं होती, इसलिए बीडब्ल्यूए को पूरे मुल्क में तेज ब्रॉडबैंड इंटरनेट को बढ़ावा देने के लिए लाया गया था।

दरअसल, यह माना जाता है कि गांवों तक इंटरनेट के पहुंचने से मुल्क का काफी भला होगा। इसलिए एक अगस्त को जारी हुई पॉलिसी में बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम की कीमत 3जी मोबाइल स्पेक्ट्रम के मुकाबले केवल एक चौथाई रखी गई थी। इस सोच में शुरू से काफी खामियां रही हैं।

यह तो कोई भी जानता है कि आप बीडब्ल्यू का इस्तेमाल लोगों को कॉल करने के लिए उसी तरह से किया जा सकता है, जैसे 3जी स्पेक्ट्रम की मदद से आप अपने मोबाइल का इस्तेमाल इंटरनेट को तेजी से सर्फ करने में कर सकते हैं। इसलिए इससे कोई मदद नहीं मिलने वाली।

दरअसल, 3जी स्पेक्ट्रम की ख्वाहिश रखने वाली कंपनियों को अगर 10 मेगाहट्र्ज का स्पेक्ट्रम दिया जा रहा है, तो बीडब्ल्यूए के खिलाड़ियों को 20 मेगाहट्र्ज का स्पेक्ट्रम मिल रहा है। जाहिर तौर पर इससे बीडब्ल्यूए कंपनियों को आगे बढ़ने के ज्यादा मौके मिलेंगे।

शुक्रवार को सरकार ने अपने स्पष्टीकरण में दावा किया है कि इसे दुरुस्त करने के लिए उसने बीडब्ल्यूए ऑपरेटरों को मिलने वाली सुविधाओं को कम कर दिया है। जहां तक एक अगस्त की नीति की बात है, उसमें बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम की कीमत 3जी स्पेक्ट्रम की कीमत के एक चौथाई के बराबर तय की गई थी।

शुक्रवार को आए स्पष्टीकरण में इसे करोड़ रुपये में दिखाया गया, जो 3जी स्पेक्ट्रम की कीमत का एक चौथाई ही निकल कर आता है। साथ ही, एक अगस्त की नीति में इस केवल 'डाटा सर्विसेज' के लिए इस्तेमाल करने की बात कही गई थी, लेकिन 12 सितंबर के स्पष्टीकरण में 'डाटा सर्विसेज' की शर्त को भी हटा दिया गया है। साफ तौर पर अब इसका इस्तेमाल टेलीफोनी के लिए भी किया जा सकता है।

अब कहेंगे, इससे क्या फर्क पड़ता है? तय कीमत का मतलब यह तो नहीं होता कि बोली उससे आगे जाएगी नहीं। आखिरकार 12 सितंबर के स्पष्टीकरण के बाद बीडब्ल्यूए लाइसेंस भी एक तरह से 3जी लाइसेंस ही बन गया है और इसलिए इसका कीमतों पर कोई असर नहीं होगा। मान ली आपकी बात, लेकिन अगर बीडब्ल्यू स्पेक्ट्रम की नीलामी 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के बाद हुई फिर तो कहानी का रुख ही बदल जाएगा।

वैसे, कहानी का रुख बदलने के पूरे आसार भी नजर आ रहे हैं। इसलिए अगर कीमतों में अंतर रहा तो टेलीकॉम के इस खेल के विजेता को तय करने की जिम्मेदारी सरकार पर ही आ जाएगी। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। शुरुआत में बीडब्ल्यूए को लेकर जो पॉलिसी बनाई गई थी, उसमें सरकार ने इसमें इस्तेमाल होने वाली तकनीक के बारे में निष्पक्ष रुख रखा था।

ध्यान रहे कि जैसे मोबाइल फोन के लिए जीएसएम और सीडीएमए तकनीक का इस्तेमाल होता है, उसी तरह बीडब्ल्यूए के लिए भी टीडीडी और एफडीडी नाम की दो तकनीकों का इस्तेमाल होता है।  लेकिन अपने मुल्क में तो एक या दो कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए एक नए स्टैंडर्ड को ले आया गया है, जिसके तहत केवल टीडीडी तकनीक को इस्तेमाल करने की इजाजत दी गई है। इस स्पष्टीकरण को देखकर तो यही लगता है कि आखिर 40 दिनों की दिमागी कसरत के बाद दूरसंचार मंत्रालय ऐसे ही कायदे लेकर आई है, तो हैरत इस बात की है कि उसने इतनी भी कसरत क्यों की? 
Keyword: drama on name of mental exercise on 3G,
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