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कर्नाटक में कांग्रेस के घर में हो रही उठापटक
आदिति फडणीस /  November 22, 2013

सियासी हलचल
सिद्घरमैया को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बने हुए पूरे छह महीने हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने क्या सफलता हासिल की है? पहले अच्छी खबर। राजनीतिक नजरिये से देखें तो कांग्रेस के लिए परिस्थितियां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मुकाबले काफी बेहतर हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस तीन महीने पहले दो महत्त्वपूर्ण उप-चुनावों में सफलता हासिल कर चुकी है। बेंगलूर रूरल ऐंड मांड्या और जनता दल (सेक्यूलर) को करारी हार का सामना करना पड़ा था। जद (एस) की पूरी कमान एच डी देवेगौड़ा के पुत्र कुमारस्वामी के हाथ में है। इससे पहले भी उनकी पार्टी को दो बार हार का सामना करना पड़ा है। उनकी पत्नी अनीता चन्नपटना सीट नहीं जीत सकीं थी और अब वह ग्रामीण बेंगलूर से भी चुनाव हार गई हैं।

दूसरी ओर भाजपा अभी तक बी एस येदियुरप्पा को हालात अपने नजरिये से देखने के लिए नहीं मना पाई है। येदियुरप्पा अपने दल का विलय कांग्रेस के साथ करने को भी तैयार नहीं हैं और ऐसा लगता है कि सीटों के गठजोड़ को लेकर भी वह बहुत अडिय़ल रुख रखते हैं। भाजपा में अनंत कुमार और लाल कृष्ण आडवाणी अब भी येदियुरप्पा की वापसी के प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं हालांकि यहां यह बात गौर करने योग्य है कि अब उनकी आपत्तियों का उतना महत्त्व नहीं रह गया है, जितना पहले हुआ करता था।

अब येदियुरप्पा के साथ भाजपा का कोई भी सौदा हो लेकिन हकीकत यही है कि कर्नाटक का सबसे प्रभावशाली समुदाय लिंगायत आज भाजपा के साथ उस तरह नहीं खड़ा है, जैसा पहले था। आंतरिक रूप से भाजपा के दो सबसे अहम नेता जगदीश शेट्टïर और अनंत कुमार की तकरार अब भी जारी है। कर्र्नाटक में भाजपा नरेंद्र मोदी के सहारे ठीक उसी तरह चिपटी है जैसे कोई डूबता हुआ आदमी किसी तिनके से चिपटा हो। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भाजपा में किसी के पास कर्नाटक के बारे में बोलने के लिए कुछ भी नहीं है।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि सिद्घरमैया की अगुआई वाली राज्य सरकार के लिए हालात बहुत अच्छे हैं। पहले उनके बारे में कुछ जानकारी। सिद्घरमैया अन्य के मुकाबले नए कांग्रेसी हैं। वह 2005 में जद(एस) छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे। स्वतंत्र विचारों वाले और शानदार वक्ता के तौर पर साख बनाने वाले सिद्घरमैया को देवेगौड़ा बहुत पसंद करते थे। उन्होंने सिद्घरमैया को उप-मुख्यमंत्री बनाया न कि मुख्यमंत्री। खैर यह बहुत चौंकने वाली बात नहीं है। उन्होंने मुख्यमंत्री पद के लिए अपने पुत्र को चुना। इस बात से खफा सिद्घरमैया ने कुछ विधायकों के साथ जद(एस) से नाता तोड़ लिया और कांग्रेस ने उनका खुले दिल से स्वागत किया। ये ही वे विधायक थे, जिनके बूते सिद्घरमैया ने इस साल की शुरुआत में 'कांग्रेस विधायक दल के सभी 121 सदस्यों के समर्थनÓ का दावा किया था। 

लेकिन कांग्रेस ने सिर्फ इन्हीं 121 विधायकों के जरिये जीत हासिल नहीं की थी। इसमें पीसीसी के प्रमुख जी परमेश्वर का भी अहम योगदान था, जिन्होंने पार्टी को विजयी बनाने में मदद की लेकिन वह अपनी ही सीट पर चुनाव हार गए। अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले परमेश्वर काफी लोकप्रिय नेता हैं और कभी वे भी मुख्यमंत्री बनने का सपना देखा करते थे लेकिन उनकी सभी उम्मीदों पर पानी फिर गया। और तभी से दोनों नेताओं के बीच तनातनी जारी है और कभी कभी यह सार्वजनिक मंच पर भी दिखती है।

चाहे मामला अंधविश्वास के खिलाफ विधेयक का हो (महाराष्टï्र की ही तरह कर्नाटक भी अपना विधेयक चाहता है) लेकिन कांग्रेस अभी इस बारे में कुछ भी तय नहीं कर पाई है कि अंधविश्वास की परिभाषा क्या होगी और उसे आशंका है कि उसके इस कदम को हिंदु समुदाय के लोग धार्मिक कर्मकांडों में उसका हस्तक्षेप मान सकते हैं। या फिर मामला केंद्र की ही तर्ज पर राज्य में पार्टी और सरकार के बीच एक समन्वय समिति बनाने का प्रस्ताव हो। यह बिल्कुल स्पष्टï हो चुका है कि मुख्यमंत्री और पीसीसी प्रमुख एक ही नाव में सवार नहीं हैं।

समन्वय समिति के गठन में चार महीने का समय लगा। और जब इसका गठन हुआ तो सिद्घरमैया के सबसे बड़े निंदक डी के शिवकुमार, जिन्हें कैबिनेट में जगह नहीं मिल सकी थी, को इसमें शामिल किया गया। शिवकुमार को पार्टी (शिवकुमार) ने नामित किया था जबकि गृह मंत्री के जी जॉर्ज के नाम का प्रस्ताव मुख्यमंत्री ने किया। इससे पहले मुख्यमंत्री शिवकुमार की पदोन्नति रोकने की पुरजोर कोशिश कर चुके थे।

अब इसमें अल्पसंख्यकों को लुभाने की मुख्यमंत्री की योजनाओं का भाजपा द्वारा हो रहे विरोध को भी शामिल कर लीजिए। हाल में मुख्यमंत्री ने गरीब मुस्लिम युवतियों के विवाह के लिए 50,000 रुपये नकद देने की घोषणा की : उद्यमिता, नौकरी और कृषि के लिए वित्तीय मदद नहीं बल्कि शादी के लिए! सालाना डेढ़ लाख रुपये से कम आय वाले मुस्लिम परिवारों की युवतियों के विवाह की इस योजना के लिए सरकार ने 10 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। हालांकि यह स्पष्टï नहीं है कि यह अनुदान प्रति परिवार सिर्फ एक युवती को मिलेगा या एक से ज्यादा को।

और पिछले ही महीने परमेश्वर ने यह कहकर सारी कसर पूरी कर दी कि अल्पसंख्यकों को इस बात की छूट है कि वे सरकारी ऋण लें और उसे नहीं चुकाएं। उन्होंने कहा था, 'कर्नाटक अल्पसंख्यक विकास निगम को छोटे-छोटे ऋण देने के बजाय 50 लाख रुपये जैसे बड़े ऋण देने चाहिए। अगर कर्जदार ऋण नहीं चुका सका तो कोई बात नहीं। कई लोगों और अधिकारियों ने सरकार को चूना लगाया है और यह विकास प्रक्रिया का हिस्सा है।'

इन हालात में एक नजरिया यह होगा कि अगर सरकार के अन्य नेता और मंत्री चुप और असमर्थ हैं लेकिन अपना काम करने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह सभी के लिए अच्छा है।

हकीकत यह है कि कांग्रेस की नई सरकार अभी तक यह साबित नहीं कर पाई है कि उसमें शासन करने की काबिलियत है। शायद यही वजह है कि मुख्यमंत्री को अपने मंत्रियों को सप्ताह में चार दिन तक कार्यालय में रहने का आदेश जारी करना पड़ा, जिससे लोग उनसे आकर मिल सकें।

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