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असरकारी बनाइए
संपादकीय /  November 22, 2013

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के एक पूर्व डिप्टी गवर्नर ने एक बार सरकारी और निजी बैंकों के प्रमुखों की तुलना करते हुए कहा था, 'एक सरकारी बैंक का अध्यक्ष मेरे पास मुस्कराते हुए आएगा, वह समर्पण की मुद्रा में थोड़ा सा झुका हुआ होगा और वह मेरे द्वारा कहीं दिए गए भाषण की तारीफ करता हुआ वहां आएगा। इस बीच वह कई बार मुझे सर कहकर संबोधित करेगा जबकि एक निजी बैंक का अध्यक्ष मेरे पास आएगा और मेरे साथ बराबरी से बात करेगा वह भी मुद्दे पर।Ó

यह दोनों कार्यकारियों के रवैये और उनकी मानसिक बनावट को जाहिर करने वाली टिप्पणी है जिसका उनके प्रदर्शन पर असर होना तय है। बीते कई सालों के दौरान सरकारी बैंक सभी मानकों पर निजी बैंकों से पीछे नजर आए हैं। वह अंतर अब नजर आ रहा है जबकि लंबी मंदी के बीच बड़ी संख्या में कर्ज संदेहास्पद होते गए हैं और बैंकों को फंसे हुए कर्ज को माफ करना पड़ा। अब जबकि नए बैंकिंग लाइसेंस जारी किए जाने वाले हैं तो सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी बैंक सरकारी क्षेत्र की अन्य कंपनियों की तरह पूरी तरह निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा के दायरे में आ जाएंगे। जरा एयर इंडिया को देखिए। प्रतिस्पर्धा की शुरुआत होने के दो दशक के भीतर वह घरेलू बाजार में चौथे स्थान पर सिमट गई है।

महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड और भारत संचार निगम जैसे नाम एक समय देश में फोन सेवाओं के इकलौते पर्याय हुआ करते थे। वे भारी भरकम सरकारी मदद पर आश्रित थे जबकि उनके निजी क्षेत्र के प्रतिस्पर्धी अरबों डॉलर के नए निवेश की योजना बनाते रहे। आवासीय क्षेत्र की भी यही कहानी है (जमीन पर लगभग एकाधिकार रखने वाले दिल्ली विकास प्राधिकरण की तुलना जरा पड़ोसी राज्य हरियाणा के डीएलएफ से कीजिए), तथा अनेक अन्य कारोबारी क्षेत्रों की भी।

सीमेंट, दोपहिया (याद कीजिए स्कूटर इंडिया को),इंजीनियरिंग...सरकारी धातु उत्पादन आदि तमाम क्षेत्रों में निजीकरण के तत्काल बाद जबरदस्त विकास हुआ। वहीं निजीकृत होटलों ने हर शहर की तस्वीर बदलकर रख दी है। भारतीय इस्पात प्राधिकरण जैसे अपवाद भी हमारे बीच हैं जिसने लगातार अच्छा प्रदर्शन करना जारी रखा लेकिन फिर भी देश के कुल इस्पात उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी आधी से अधिक हो चुकी है।

मुद्दा यह है कि प्रतिस्पर्धी बाजार में सरकारी क्षेत्र को अपने आपको बचाए रखना मुश्किल साबित होता रहा है। इसके ठीक उलट सरकारी क्षेत्र बैंकिंग तथा बीमा क्षेत्र में अपना दबदबा कायम किए रहा। अभी भी लोग अपनी मेहनत की कमाई जमा करने अथवा लंबी अवधि का बीमा कराने के लिए सरकारी संस्थाओं पर अधिक यकीन करते हैं।  इन बैंकों तथा कंपनियों के पीछे सरकार का सहारा होने की बात लोगों को अधिक आश्वस्त करती है और इसी वजह से वे लोगों को अधिक सुरक्षित महसूस होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो क्या होता?

शायद उनकी गुणवत्ता जाती रहती। उस नजरिये से अगर आप कार्यक्षमता के अनुपात पर नजर डालें तो सरकारी बैंक कहीं नहीं ठहरते। लब्बोलुआब यह कि जोखिम का आकलन करने में वे बहुत अधिक मजबूत नहीं हैं जबकि वही बैंकिंग का मूल आधार है या फिर कर्ज देते वक्त वे बाहरी दबावों से बहुत अधिक प्रभावित हो जाते हैं। चाहे जो भी हो लेकिन सरकारी बैंकों की परिसंपत्ति की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती। वे बड़ी संख्या में कर्ज माफ करते हैं और इस तरह उनको नई पूंजी की आवश्यकता होती है। यह कहना भी सही नहीं होगा कि निजी बैंक निहायत सफल रहे हैं। उनकी विफलता के उदाहरण हैं और भविष्य में भी ऐसा हो सकता है।

लेकिन इसके बावजूद तमाम बैंकिंग परिसंपत्तियों के एक चौथाई पर काबिज होने के बावजूद निजी और विदेशी बैंकों के पास फंसे हुए और संदेहास्पद कर्ज का महज सातवां हिस्सा ही है। मुद्दा यह है कि अगर कोई निजी बैंक समस्या में फंसता है तो रिजर्व बैंक उसके विलय यानी प्रबंधन में बदलाव का रास्ता चुनता है। इस तरह नुकसान को नियंत्रित किया जाता है।

सरकारी क्षेत्र में सरकार बैंकों में नई पूंजी डालती है। अब जबकि नए बैंकिंग लाइसेंस जारी किए जा रहे हैं क्या करदाताओं पर समय-समय पर बोझ डालने का काम अनिश्चितकाल तक जारी रखा जाना चाहिए? इससे पहले कि देर हो जाए सरकारी बैंकिंग को नए सिरे से परिभाषित किया जाना चाहिए।

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