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पर्यावरण और संसाधन विकट चिंता का विषय
नितिन देसाई /  November 21, 2013

अगर पर्यावरण और संसाधनों से संबंधित चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया गया तो वर्ष 2050 तक हमारी हालत बहुत बुरी होने वाली है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन देसाई

अगर देश की अर्थव्यवस्था सालाना 6 फीसदी की दर से विकसित होती है तो वर्ष 2050 में इसका आकार मौजूदा आकार से 10 गुना बड़ा होगा। संसाधनों की उत्पादकता में अगर सालाना 2 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान लेकर चला जाए तो समूची अर्थव्यवस्था की प्रवाह क्षमता में पांच गुना का इजाफा होगा। वहीं मौजूदा अनुमानों को आधार मानकर चलें तो वर्ष 2010 से 2030 के बीच प्राथमिक ऊर्जा खपत में तीन गुना इजाफा होने की संभावना है।

प्रदूषण और संसाधनों का दबाव किसी अर्थव्यवस्था में समूचे संसाधनों और ऊर्जा के प्रवाह से सीधे संबंधित होता है और इसलिए वह भी अपने मौजूदा आकार से पांच गुना तक बड़ा होगा। भौगोलिक रूप से भी वह अधिक संकेंद्रित होगा क्योंकि शहरीकरण की प्रक्रिया बहुत तेजी से चल रही है। यह देखते हुए कि हमें पहले ही पर्यावरण और संसाधनों के स्तर पर बड़े दबावों का सामना करना पड़ रहा है, यह संभावना धुंधली ही नजर आती है इन दबावों से निपटना भी विकास के समान ही महत्त्व रखता है।

तीसरी पंचवर्षीय योजना के बाद से ही देश के योजनाकारों ने मरुस्थलों, शुष्क इलाकों और पहाड़ों आदि पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों के लिए संबद्घ योजनाओं की शुरुआत की है और 70 के दशक के बाद से परियोजनाओं के प्रदूषण प्रबंधन और पर्यावरण प्रभाव आकलन का काम शुरू किया गया। इसमें काफी ध्यान ग्रामीण इलाकों में जमीने के अपक्षरण, जलजमाव, पानी के खारेपन और जैव विविधता में कमी पर भी दिया गया।

जैसे-जैसे हम वर्ष 2050 की ओर कदम बढ़ाएंगे इस स्थिति में बदलाव आने लगेगा। देश की ग्रामीण आबादी में अगले दशक के मध्य तक स्थिरता आ जाएगी और उसके बाद इसमें गिरावट का दौर शुरू होगा। उस वक्त पर्यावरण संबंधी नीति का ध्यान अधिक तेज औद्योगीकरण और शहरीकरण के परिणामों पर केंद्रित करना होगा। ऐसे में शहरी वायु प्रदूषण, रासायनिक कचरे आदि के जमावड़े तथा ध्वनि प्रदूषण आदि से निपटना अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाएगा।

फिलहाल तो इन पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है और राजनेताओं ने इनसे निपटने का काम भ्रष्ट अधिकारियों पर छोड़ दिया है। पर्यावरण मंत्रालय का प्रभार भी कद्दावर राजनेताओं के पास नहीं है। जयराम रमेश जैसे दमदार मंत्री ने जब कुछ कानूनों के प्रवर्तन का काम शुरू किया तो उनका विभाग ही बदल दिया गया।
हमें एक स्वतंत्र सांविधिक पर्यावरण प्राधिकार की आवश्यकता है जो प्रदूषण और उससे जुड़े जोखिम से निपटने में हमारी मदद कर सके। इसके अलावा हमें राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को भी साथ लाने की आवश्यकता है क्योंकि उनकी प्रतिबद्घताएं इस दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

अदालतों के मुताबिक सुरक्षित पर्यावरण का अधिकार हमारे जीवन के मूलभूत अधिकारों का हिस्सा है और मंत्रालय के हस्तक्षेप से मुक्त एक सांविधिक पर्यावरण प्राधिकार की सख्त आवश्यकता है जो संसद और न्यायालयों के प्रति जवाबदेही के साथ पर्यावरण कानूनों का समुचित प्रवर्तन करे। इस क्रम में उसे तमाम पर्यावरण संबंधी चिंताओं से निपटना होगा जो अर्थव्यवस्था के विकास और देश के शहरीकरण के साथ-साथ सर उठाएंगी।

संसाधनों की बात करें तो दो बड़े मसले हैं स्वच्छ जल और वन। देश में बारिश की कोई कमी नहीं है हालांकि यह साल में सीमित समय के दौरान होती है और उसका स्तर भी देश के अलग- अलग हिस्से में अलग-अलग है। बढ़ती आबादी और शहरीकरण तथा औद्योगीकरण की बढ़ती मांग के साथ बारिश में तो कोई इजाफा होने से रहा, सवाल यह है कि इस समस्या से कैसे निजात पाई जाए?

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2000 से 2025 के दौरान पानी की मांग में 85 फीसदी का इजाफा होने की संभावना है। एक हालिया अनुमान पर यकीन करें तो पानी की जरूरत सन 2050 तक बढ़कर 900 अरब घन मीटर तक पहुंच सकती है जो अभी 680 अरब घन मीटर तक है। वहीं प्राथमिक जल स्रोतों से जल निकासी भी 37 फीसदी से बढ़कर 61 फीसदी हो सकती है। देश की कुल आबादी के 75 फीसदी को संभालने वाले 9 नदी बेसिन वर्ष 2050 तक पानी की कमी से जूझने लगेंगे। भूजल निष्कासन भी बहुत बढ़ जाएगा और वह वर्ष 2000 के 303 अरब घन मीटर से बढ़कर उस वक्त 423 अरब घन मीटर जा पहुंचेगा। इस तरह उसके स्तर में जबरदस्त कमी आएगी।

ऐसे में दुर्लभ हो रहे जल संसाधन के लिए संघर्ष आम हो जाएगा और अंतरराज्यीय तनावों तथा आपूर्ति को लेकर आपसी दुश्मनियों की वजह बनेगा। हम पहले ही देश के कई इलाकों में भूजल कमी की समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारे जैसी परियोजनाओं के साथ हम समस्या में और अधिक इजाफा कर रहे हैं क्योंकि उससे कुछ शुष्क इलाकों में शहरी आबादी का तेज गति से विस्तार होगा। पानी की मांग और उसकी आपूर्ति के बीच के इस बढ़ते अंतर को दूर करने के लिए हमें जल संरक्षण पर बहुत ज्यादा जोर देना होगा। कुछ उसी तरह जिस तरह हम ऊर्जा संरक्षण पर जोर दे रहे हैं।

इसके अलावा हमें वन संरक्षण के मोर्चे पर भी बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार देश के नौ बड़े कोयला क्षेत्रों का 35 फीसदी इलाका घने वनों से आच्छादित है और उसका वर्गीकरण आवागमन के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र के रूप में किया जाना चाहिए। अब इस रवैये पर सवाल उठ रहे हैं लेकिन वन संरक्षण और कोयला खनन के बीच चयन का मसला तो बरकरार रहेगा।

अन्य खनन क्षेत्रों में भी ऐसी ही समस्याएं सामने आएंगी। नियमगिरि में हाल में की गई रायशुमारी इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय समुदायों के हितों और भावनाओं के साथ टकराव का क्या मतलब है। हमारे वन कानूनों की सख्ती को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अधिकारों के बीच का यह टकराव तथा उसके साथ ही खनिज उत्खनन भी एक जटिल समस्या में रूपांतरित हो रहा है। शायद घनी आबादी वाले अन्य देशों की तरह हमें भी खनिज तथा ऐसे अन्य संसाधनों का आयात करना पड़ेगा।

भारत को वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को कम करने के दबाव का सामना भी करना होगा। उसने अब तक विकसित देशों के अतीत का हवाला देकर इससे बचने की कोशिश की है और साथ ही यह भी कहा है कि उसके विकास के क्रम में उत्सर्जन की रियायत मिलनी चाहिए क्योंकि विकसित देशों ने इसमें बहुत अधिक योगदान दिया है। लेकिन अब चीन और भारत समेत तमाम देशों पर दबाव बढ़ रहा है।

आज से तकरीबन 40 साल पहले चौथी पंचवर्षीय योजना में कहा गया था कि जमीन, हवा, पानी और वन्य जीवन में बढ़ोतरी करना हर पीढ़ी की जवाबदेही है। लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि किसी ने इस संदेश को ध्यान से सुना हो। अगर अब भी हमने इस पर कान नहीं
दिया तो वर्ष 2050 तक हालात बहुत विकट हो जाएंगे।

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