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गन्ने पर राजनीति
संपादकीय /  November 21, 2013

उत्तर प्रदेश के गन्ना संकट के लिए स्पष्टï रूप से राजनीतिक वजहें और नुकसानदेह परिस्थितियां निर्मित कर लाभ हासिल करने की कोशिश जिम्मेदार है। इन बातों ने मूलभूत आर्थिक प्रबंधन को बहुत हद तक प्रभावित किया है। बीते बुधवार को इस गतिरोध को दूर करने की कोशिश में राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य के बारे में कहा कि इसे पिछले साल के बराबर यानी 280 रुपये प्रति क्विंटल रखा जाएगा।

यह वह कीमत है जिस पर चीनी मिलें किसानों से गन्ना खरीदती हैं। लेकिन लगता नहीं कि राज्य की निजी चीनी मिलें इससे प्रसन्न होंगी। ऐसी 99 में से 65 मिलों ने राज्य सरकार को मंगलवार शाम को कह दिया था कि वे अपना परिचालन बंद कर रही हैं। मिलों का कहना है कि वे इस साल प्रति क्विंटल 240 रुपये से ज्यादा मूल्य का भुगतान नहीं कर सकती हैं हालांकि गत वर्ष उन्होंने 280 रुपये की दर से भुगतान किया था।

किसानों के समूहों ने 300 रुपये प्रति क्विंटल की दर हासिल करने के लिए लॉबीइंग की। मिलों को घाटा हो रहा है और उन पर किसानों का बकाया भी है, ऐसे में उनका कहना है कि वे महंगी कीमत पर गन्ना खरीदने के बजाय काम बंद करना पसंद करेंगी। सारी समस्या की जड़ राज्य परामर्श मूल्य ही है।

दुर्भाग्यवश एक विशुद्घ प्रशासनिक काम अब राजनीतिक फैसले में तब्दील हो गया है। एक के बाद एक सरकारें इसका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए कर रही हैं। चीनी के मुकाबले गन्ने की कीमतों में वर्ष 2009-10 के 57.1 फीसदी से बढ़कर 2010-11 में 79.06 फीसदी, 2011-12 में 81.36 फीसदी और 2012-13 में 88.88 फीसदी अधिक हो गईं। इस वर्ष इसका राजनीतिक पहलू अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया क्योंकि मुजफ्फरनगर दंगों ने उत्तर प्रदेश के मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर दिया।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि समाजवादी पार्टी के दिग्गज मुलायमसिंह यादव का सपना तीसरे मोर्चे की ओर से देश का प्रधानमंत्री बनने का है। अगर राज्य में उनकी पार्टी का प्रदर्शन गड़बड़ाता है तो उनकी इन संभावनाओं को झटका लगेगा। ऐसे में यह दलील दी जा रही है कि उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान 30 लोक सभा सीटों के लिहाज से महत्त्वपूर्ण हैं और इसलिए उनको प्रसन्न रखा जाना जरूरी है।

यह दुखद है कि गत वर्ष जबरदस्त उम्मीदों के बीच प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले अखिलेश यादव यह सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं कि चुनावी राजनीति को गन्ने की कीमतों जैसे फैसलों से दूर रखा जाए। इस काम के लिए एक ढांचा पहले से मौजूद है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से चीनी क्षेत्र के तमाम मसलों के विनियंत्रण के लिए गठित सी रंगराजन की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा है कि राज्य परामर्श मूल्य के स्थान पर मिलों को चाहिए कि वे किसानों को चीनी तथा अन्य सह उत्पादों की कीमत का 70 फीसदी भुगतान करें या फिर वे उनको गन्ने की कीमत का 75 फीसदी भुगतान करें। इससे चीनी की कीमतें जितनी ज्यादा होंगी किसानों को उतना ही फायदा होगा।

कर्नाटक ने गत मई में इस राजस्व साझेदारी वाली व्यवस्था को अपना लिया। देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य महाराष्टï्र ने भी इसे अपनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश को भी ऐसा ही करना था। इससे उद्योग जगत में स्थिरता आती और गन्ने के रकबे में आने वाली विसंगति दूर होती। अगर रंगराजन फॉर्मूला स्वीकारा नहीं जाता तो मिलों ने राज्य सरकार से सब्सिडी अथवा कम ब्याज पर कर्ज की मांग की गई थी ताकि वे किसानों के बकाये की भरपाई कर सकें। अगर ऐसा होता है तो यह बहुत खराब स्थिति होगी जहां करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल किसानों और चीनी मिलों को खुश रखने के लिए किया जाएगा।

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