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मायानगरी का फिल्मीस्तान
रंजीता गणेशन /  November 20, 2013

इस फिल्म संग्रहालय के पास दादासाहेब फाल्के की हरिश्चंद्र की भी दो रीलें  हैं। फिल्मी दीवानों के लिए भारतीय फिल्म के इतिहास की कुछ ऐसी ही झलकियां पेश करनेे वाले इस संग्रहालय की खास बातें बता रही हैं रंजीता गणेशन

सिनेमा देखने और बनाने के मामले में हमेशा से अव्वल रहे भारत में सिनेमा के इतिहास को संजोने के लिहाज से भी कई शानदार काम किए गए हैं। नैशनल म्यूजियम ऑफ इंडियन सिनेमा (एनएमआईसी) इसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है। हर साल हजारों फिल्में बनाकर दुनिया के सबसे बड़े फिल्म निर्माता इस देश में यह अपने तरह का अनोखा संग्रहालय होगा। जाने माने फिल्म आलोचक अशोक राणे कहते हैं, 'हम बमुश्किल ही किसी चीज को सहेज पाते हैं।

कुछ पुरानी कलाकृतियां तो हमेशा के लिए बरबाद हो गई हैं।Ó फिल्में तो वर्ष 1911 से ही बन रही हैं लेकिन सरकार ने इन्हें सहेजने का काम आजादी के 17 साल बाद 1964 से शुरू किया था। राष्टï्रीय फिल्म संग्रहालय के पास भी दादासाहेब फाल्के की हरिश्चंद्र फिल्म की सिर्फ दो रीलें उपलब्ध हैं। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि ये रील 1917 में फाल्के द्वारा बनाई गई उसी फिल्म के रीमेक की हैं न कि 1913 में बनी असली फिल्म की। मूक फिल्मों के दौर में भारत में करीब 17,000 फिल्में बनाई गईं जबकि इनमें से सिर्फ 12 के प्रिंट उपलब्ध है। इन शानदार फिल्मों में इस्तेमाल किए गए कपड़े और मुगले आजम फिल्म के लिए बनाया गया शीश महल का सेट भी सहेजा नहीं जा सका।
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भारतीय सिनेमा के सौ सालों की झलक पेश करने वाला यह संग्रहालय नैशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्यूजियम्स (एनसीएसएम) के साथ मिलकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फिल्म डिविजन ने तैयार किया है। इस संग्रहालय का निर्माण कार्य नैशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनबीसीसी) के पास है।

एनसीएसएम के वरिष्ठï निरिक्षक इंद्रनील सान्याल कहते हैं कि संग्रहालय में कोई भी कमी न छोडऩे के लिहाज से टीम ने लंदन के सिनेमा म्यूजियम, वेस्ट यार्क शायर के नैशनल मीडिया म्यूजियम, न्यू यार्क के म्यूजियम ऑफ मूविंग इमेज जैसे कई संग्रहालयों का दौरा किया। इसके अलावा टीम ने श्याम बेनेगल, अडूर गोपालकृष्णन और सई परांजपे जैसे दिग्गजों से भी सलाह मशविरा किया।

संग्रहालय के सलाहाकार निरिक्षक और फिल्म इतिहासकार अमृत गांगर इस परियोजना को लेकर खासे उत्साहित हैं। फिल्म प्रभाग कार्यालय में उनकी डेस्क पर कुछ पुराने पोस्टर और गानों की किताबें हैं जो उन्होंने गुजरात के अपने दौरे के दौरान जुटाई थीं। गांगर फिल्मों की पटकथा और लॉबी कार्ड सहेजने के लिए सहेजने वालों के भी संपर्क में हैं। लेकिन कुछ संग्रहकर्ता अपने भावानात्मक जुड़ाव के कारण इन चीजों को देना नहीं चाहते हैं। फिल्म प्रभाग के महानिदेशक वी एस कुंडु कहते हैं, 'हम उन्हें राजी करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे कम से कम इन चीजों को उधार पर ही दे दें।Ó

इसके अलावा संग्रहालय में सिनेमा में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को भी प्रदर्शित किया जाएगा जिसमें असली और प्रतिरूप दोनों तरह के उपकरण होंगे। इसका मकसद दर्शकों को यह दिखाना होगा कि फिल्म निर्माण किस तरह भारी भरकम कैमरों के दौर से वर्तमान में इस्तेमाल होने वाले हल्के फुलके डिजिटल कैमरों के दौर तक पहुंच चुकी है।

गांगर कहते हैं कि इसका मकसद भ्रामक प्रचारों को खत्म करके दर्शकों को सच्चाई से रूबरू कराना भी है। ऐसा ही एक उदाहरण पेश करते हुए वह बताते हैं, 'राजा हरिश्चंद्र से भी पहले 1912 में पुंडालिक नाम की एक फीचर फिल्म बनी थी। लेकिन इसे भारतीय नहीं माना गया क्योंकि इसका कैमरामैन भारतीय था।Ó

फाल्के से पहले के दौर का सिनेमा के बारे में भी इस संग्रहालय में जिक्र किया जाएगा। जादुई लालटेन और उस दौर की उन सभी चीजों के बारे में बात होगी जिन्होंने दर्शकों को चलते-फिरते चित्रों से परिचित कराया।

इसके अलावा संग्रहालय में ध्वनि, पाश्र्वगायन और क्षेत्रीय सिनेमा के बारे में भी कुछ बातें जानने को मिलेंगी। निश्चित अंतराल पर फिल्मों की स्क्रीनिंग की भी तैयारी की जा रही है और साथ ही कुछ ऐसी व्यवस्था भी की जा रही है जिसकी मदद से दर्शक अपने पसंदीदा गाने सुन सकें।

यह संग्रहालय गुलशन महल में पेडर रोड पर बने फिल्म प्रभाग कॉम्पलेक्स में होगा। गुलाबी और सफेद रंग की अंग्रेजों के जमाने की इस इमारत के सामने एक जमाने में अरब सागर लहराता था। इन सालों में गगनचुंबी इमारतों से घिर चुका 19वीं सदी में बनाया गया यह बंगला मुन्नाभाई एमबीबीएस में दिखाए जाने के अलावा बेकार ही पड़ा है।

सिनेमा जैसे महान माध्यम को शुभकामनाएं देने के लिहाज से इस बंगले के खूबसूरत कमरे और भूरे दरवाजे काफी अहम साबित हो सकते हैं। इस बंगले के डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माण से जुड़े इतिहास के बारे में भी यहां बताया जाएगा। वर्ष 1932 में बंगले के मालिक कसामली जयराजभाई अपनी पत्नी और सास के साथ हज यात्रा पर गए। उनकी पत्नी ने पूरी तीर्थयात्रा की फिल्म बना ली और गांगर के मुताबिक यह किसी भारतीय महिला द्वारा बनाई गई पहली फिल्म थी।

सीमेंट मिक्सर और निर्माण कार्य कर रहे मजदूर सड़कों को समतल करने का काम कर रहे हैं और पार्किंग एरिया तैयार किया जा रहा है। इमारत के भीतर बंगले के आठ चैंबरों में दर्शकों के लिए इंटरैक्टिव डिस्प्ले लगाने के लिए ढेर सारे नए एलईडी टीवी खोले जा रहे हैं। बड़े ब्लैक ऐंड व्हाइट चित्रों के साथ बनाए गए बैपरर दीवारों पर चिपकाए जा रहे हैं और सिनेमा में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को भी व्यवस्थित किया जा रहा है।

हालांकि इस काम को पूरा करने में देरी हो रही है। हालांकि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने संग्रहालय शुरू करने का फैसला सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर ही किया था। लेकिन जब पहली बार इस बारे में विचार हुआ था तब देश में सिनेमा के 85 साल ही पूरे हुए थे। वर्ष 2010 से इस परियोजना को स्थानीय लोगों का विरोध भी झेलना पड़ रहा था जो पार्किंग और ध्वनि प्रदूषण की चिंताओं की वजह से आशंकित थे। एक छोटा स्टुडियो कई प्रयोजनों में इस्तेमाल करने लायक स्क्रीनिंग एरिया के तौर पर विकसित किया जा रहा है।

फिल्म प्रभाग के निदेशक विप्लव भाटिया कहते हैं कि हालांकि ज्यादातर चीजें दान में मिली हैं लेकिन खरीदारी बाद में की जाएगी। राणे जैसे लोग इस बात से काफी खुश हैं कि फिल्मों को सहजने का काम शुरू हो गया है। राणे कहते हैं, 'हम हमेशा से ऐसी ही कोई चीज चाहते थे। 60 के दशक के बाद से सहेजे गए इतिहास का प्रदर्शन बहुत जरूरी है। यह देर आयद, दुरुस्त आयद वाली बात सच करने जैसा है।Ó

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