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ऑनलाइन विज्ञापनों के चलन में आ रही है तेजी
मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  November 20, 2013

अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ्तार से धीमे पड़ चुके विज्ञापन बाजार में इंटरनेट को लेकर अच्छी खबरें आने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। पिछले कुछ महीनों में दो रिपोर्ट जारी की गई हैं और दोनों में ही मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल बढऩे की बात कही गई है। इनमें से एक रिपोर्ट वित्तीय सेवा कंपनी अवेंडस कैपिटल और दूसरी द इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) की थी।

इस साल शुरू में कॉमस्कोर की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार देश में ऑनलाइन वीडियो देखने की दर तेजी से बढ़ रही है। भारत अब दुनिया के शीर्ष 10 इंटरनेट बाजारों में शुमार है। देश में करीब 22.7 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और इनमें से आधे मोबाइल पर ऑनलाइन रहते हैं। ये लोग स्मार्टफोन, टैबलेटï्स, फैबलेट्स या ऐसे अन्य उपकरण इस्तेमाल करते हैं, जिससे तार नहीं जुड़ा हो और उसे चलते-फिरते इस्तेमाल किया जा सकता है।

मार्च 2013 में गूगल इंडिया का राजस्व 2,077 करोड़ रुपये रहा और इसमें से करीब आधा राजस्व विज्ञापन से आया है। इंटरनेट के उपभोक्ताओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए सावन, गाना, हंगामा और जेंगट टीवी जैसी अनगिनत कंपनियां शुरू हो गई हैं, जिन्हें ऑनलाइन सामग्री बेचने या फिर विज्ञापनों से खासा राजस्व प्राप्त होता है। देसी विज्ञापन जगत में ऑनलाइन विज्ञापन की श्रेणी का विकास सबसे तेज है।

ऑनलाइन वीडियो बाजार का विकास विज्ञापनदाताओं का ध्यान आकृष्टï कर रहा है और उन्हें मजबूर कर रहा है कि वे टेलीविजन की ही तरह इंटरनेट को भी उपयुक्त विज्ञापन माध्यम के तौर पर देखें। इसीलिए ऑनलाइन विज्ञापनों की दर भी बढ़ रही है। कॉमस्कोर इंडिया के वरिष्ठï निदेशक केदार गावणे बताते हैं कि 2012 में 2011 के मुकाबले प्रति हजार व्यक्ति ऑनलाइन आने वाले व्यक्तियों की दर में 60 से 70 फीसदी की दर से इजाफा हुआ है।

करीब 83,000 करोड़ रुपये के मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग में यह इंटरनेट की दूसरी पारी है। करीब एक दशक पहले ऑनलाइन जगत पाइरेसी, बहुत खराब विज्ञापन दर से जूझ रहा था और इसमें दूरसंचार कंपनियों का दबदबा था। मजबूत राजस्व और दर्शकों के साथ वापसी करने वाले इंटरनेट पर अब कंटेंट निर्माता बन गए हैं और लगभग प्रत्येक टीवी कंपनी ने ऑनलाइन टीवी देखने वाले दर्शकों के लिए अपनी एक ओटीटी यानी ओवर-द-टॉप रणनीति बनाई है।

मार्च 2013 में ऑनलाइन ट्रैफिक में मोबाइल डेटा ट्रैफिक की हिस्सेदारी करीब 14.2 फीसदी थी। डिजिटल विज्ञापनों पर खर्च होने वाले कुल 2,700 करोड़ रुपये में से मोबाइल विज्ञापनों की हिस्सेदारी करीब 6.6 फीसदी यानी 180 करोड़ रुपये है। अवेंडस को उम्मीद है कि यह डिजिटल विज्ञापनों पर होने वाला खर्च 2015 में बढ़कर 8,800 करोड़ रुपये हो जाएगा। सबसे दिलचस्प बात है कि सिर्फ मोबाइल पर इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता आमतौर पर पहली बार इंटरनेट का प्रयोग करने वाले होते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि विकसित देशों में सिर्फ मोबाइल पर इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों की संख्या 20 से 25 फीसदी है।

विकासशील देशों के लिए यह आंकड़ा और अधिक है। कुल इंटरनेट उपभोक्ताओं में से चीन के करीब 38 फीसदी, दक्षिण अफ्रीका के 57 फीसदी और इंडोनेशिया के 44 फीसदी लोग सिर्फ मोबाइल पर इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। अनुमान के अनुसार भारत के लिए यह आंकड़ा 50 फीसदी है। इससे संकेत मिलता है कि इंटरनेट छोटे शहरों व ग्रामीण भारत और शहरी इलाकों में वित्तीय रूप से कमजोर वर्ग के डिजिटल और बुनियादी ढांचे के अंतर को पाट रहा है।

वीडियो देखने वालों की संख्या में हो रहे इजाफे के आंकड़े भी इस बात की पुष्टिï करते हैं। ऑनलाइन वीडियो देखने की सुविधा से अनपढ़ और बहुत अधिक नहीं पढ़े लिखे लोगों के लिए मनोरंजन की एक नई दुनिया खुल जाती है।

यह उन लोगों के लिए भी एक विकल्प मुहैया कराता है जो अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य भाषा में पढऩे या सुनने में सहज महसूस करते हैं। हम सभी ने कभी न कभी घरों में काम करने वालियों या ड्राइवरों को एक मोबाइल फोन के पास इक_ïा होकर गाना सुनते या फिल्म देखते हुए देखा है या फिर हमने भी दोस्तों के साथ मिलकर ऐसा किया है? बिजली की किल्लत झेलने वाले छोटे शहरों में हजारों नए दर्शक मोबाइल फोन पर फ्री टु एयर चैनल मसलन ज़ी अनमोल या एबीपी न्यूज
सुनते रहते हैं।

भारत में कुल वीडियो ट्रैफिक में गूगल के यूट्यूब की हिस्सेदारी करीब 58 फीसदी है। इस पर उपलब्ध चैनलों में सबसे लोकप्रिय टी-सीरीज और स्टार टीवी है। मार्च 2013 में गूगल इंडिया ने विज्ञापनों से करीब 1,073 करोड़ रुपये की कमाई की और इसमें यूट्यूब की अच्छी खासी हिस्सेदारी है। मार्च 2013 में गूगल को मिले कुल राजस्व में से यूट्यूब की 30 से 35 फीसदी हिस्सेदारी थी और इसमें टीवी व फिल्म कंपनियों की हिस्सेदारी धीरे धीरे बढ़ रही है। ऐसे में अगर ज्यादातर टीवी प्रसारक यूट्यूब पर बहुत सक्रिय हैं या उनके पास एक ओटीटी रणनीति है, तो इस बात से कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।

सिर्फ एक श्रेणी, जो मोबिलिटी, वीडियो और ऑनलाइन की बढ़ती दुनिया की ताल से ताल नहीं मिला पा रही है वह है प्रकाशन। लंबे समय से प्रकाशकों का पूरा ध्यान अपने सबसे तेजी से बढ़ रहे कारोबार यानी अखबार पर रहा है।

ज्यादातर के लिए ऑनलाइन से मिलने वाला राजस्व महज 3 से 6 फीसदी है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर टीवी प्रसारकों के अत्यधिक सक्रिय होने की वजह है कि इनमें से ज्यादातर अपने कार्यक्रम विदेश में बेच रहे हैं और उनके कई दर्शक ऑनलाइन जा रहे हैं। भारत में अंग्रेजी के अखबारों में यह बदलाव स्पष्टï है हालांकि अन्य भाषाओं के अखबार इस बदलाव से बचे हुए हैं। लेकिन मोबाइल इंटरनेट की बढ़ती पैठ के बाद हालात बदल सकते हैं। अब वक्त आ गया है कि प्रकाशक इस बारे में जल्दी कोई कदम उठाएं।

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