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विशिष्टï आर्थिक क्षेत्र के गहरे समुद्र में उतरना ही होगा
खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  November 19, 2013

भारत में विशिष्टï आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के गहरे समुद्र में उपलब्ध संसाधनों का समुचित दोहन नहीं किया जा रहा है। समझो कि देश के कुल भूभागके लगभग दो तिहाई हिस्से का पूर्ण क्षमता से दोहन नहीं हो पा रहा है। इस लंबे-चौड़े समुद्री क्षेत्र में जीव और गैर-जीव संसाधनों का भंडार है, जिस पर देश का पूर्ण अधिकार है। लेकिन अफसोस की बात है कि इस कीमती संसाधनों की खोज और उनके इस्तेमाल पर उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है जितना कि वास्तव में दिया जाना चाहिए था।

इस समय  देश मछली पकडऩे का काम समुद्र के किनारे में कम गहराई वाले क्षेत्रों तक ही सीमित है और दूर गहरे जल में मछुआरे विभिन्न कारणों से जाने से कतराते हैं।

तटीय क्षेत्रों में मत्स्य संसाधनों का दोहन चरम पर पहुंच चुका है और इसके कई प्रतिकूल परिणाम सामने आ रहे हैं। मिसाल के तौर पर अब मछली पकडऩे के प्रयास उतने रंग नहीं ला रहे हैं, यानी तटीय क्षेत्रों के लगातार दोहन से मछुआरों के लिए अधिक  मछली पकड़ पाना अब आसान नहीं रह गया है। इससे इनकी जीविका पर भी बुरा असर पड़ा है। मछुआरों को अपने जाल का आकार कम करने को मजबूर होना पड़ा है जिससे बड़ी मात्रा में अवांछित मछलियां ही जाल में फंसती है। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि समुद्री मछली उत्पादन की दर अब धीरे-धीरे स्थिर होती जा रही है।

दूसरी तरफ आम मछुआरे भी अब मछली पकडऩे के लिए गहरे पानी में नहीं जा रहे हैं। इसके पीछे कुछ कारण गिनाए जा सकते हैं। सबसे अहम वजह यह है कि गहरे जल में मछली पकडऩे के  लिए अधिक लागत और ऊर्जा की दरकार होती है। साथ ही मछली पकडऩे के लिए जल के अंदर काफी निचले स्तरों तक पहुंचना होता है। समुद्र में लंबे समय तक रहने की दरकार आदि कारणों से भी गहरे जल में मछली पकडऩे के प्रयासों में बाधाएं आ रही हैं।

ज्यादातर मछुआरों के पास छोटी या मझोले आकार की नौकाएं होती हैं जो 250 मीटर से अधिक गहराई में काम करने लायक नहीं रह जातीं। गहरे समुद्र में मछली पकडऩे के क्रम में उन मछलियों के बारे में सही सूचनाएं भी प्राप्त होती हैं जिनकी खोज हो रही है। इन सूचनाओं से मछली पकडऩे में आने वाली लागत कम हो सकती है, साथ ही गहरे समुद्र में मछली पकडऩे के प्रयास भी सरल हो सकते हैं।

गहरे समुद्र में व्यावसायिक दोहन किए जाने योग्य क्षेत्रों की तलाश की जिम्मेदार कोच्चि स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फिशरीज टेक्रोलॉजी (सीआईएफटी) ने उठाई है। हाल में ही सीआईएफटी ने इस बारे में एक व्यापक अध्ययन किया है। यू श्रीधर के नेतृत्व में सीआईएफटी के वैज्ञानिकों के एक समूह ने 50 से 1,100 मीटर गहरे जल में मछलियों की करीब 155 नई प्रजातियों का पता लगाया है। श्रीधर कहते हैं, 'अध्ययन में जितनी प्रजातियों की पहचान हुई वह भारत के समुद्री क्षेत्रों के लिए नई थीं।

लिहाजा, इनमें हमारी दिलचस्पी बढ़ी है और व्यावसायिक दृष्टिï से ये मूल्यवान हो सकती हैं। इंटरनैशनल यूनियन फॉर कन्जरवेशन ऑफ नेचर (आईसीएनयू) की विलुप्त होने वाली प्रजातियों की सूची में इनमें से कुछ प्रजातियां भी शामिल हैं। कुछ प्रजातियां ऐसी भी हैं जिनके सरंक्षण का दर्जा आंकड़ों के अभाव में अनिश्चित है।Ó इसके अलावा सीआईएफटी मुख्यालय में मछलियों की इन प्रजातियों की जैविक संरचना और अन्य चरित्रों का विश्लेषण भी हो रहा है। इन अध्ययनों का प्रमुख लक्ष्य इनमें से उन तत्त्वों की प्राप्ति करनी है जिनके पोषण, चिकित्सकीय और अन्य लाभकारी इस्तेमाल हो सकते हैं।

इन प्रजातियों में एक की पहचान लैंप्रोग्रेमस (वैज्ञानिक नाम) के तौर पर हुई है जो 550 से 700 मीटर गहरे समुद्री जल में पाई जाती है। इस मछली का इस्तेमाल भोजन के तौर पर हो सकता है। दूसरी प्रजाति एनोप्लोगास्टर कॉरनुटा 2000 मीटर की गहराई तक पाई जाती है जो टुनास, एल्बाकोर, मार्लिन और अन्य मछलियों के लिए भोजन के रूप में इस्तेमाल हो सकती है। इसी तरह, एचिनॉरहिनस ब्रकस एक शार्क मछली है जो मनुष्य को नुकसान नहीं पहुंचाती है। इसका इस्तेमाल लीवर ऑयल या फिशमिल तैयार करने में संभवत: हो सकता है।

इस वैज्ञानिक मिशन की एक दिलचस्प बात यह रही कि इसमें वैंप्रियोट्यूथिस इनफर्नेलिस प्रजाति की भी पहचान हुई जिसे 'वैम्पायर स्क्विडÓ भी कहा जाता है, जो 600 से 900 मीटर गइराई में पाई जाती है। इतनी गहराई में दबाव अधिक होता है और ऑक्सीजन की कमी होती है, बावजूद इसके वैम्पायर स्क्विड यहां गुजारा कर लेती है।

मछली की यह प्रजाति भोजन के लिए शिकार नहीं करती हैं बल्कि समुद्र के भीतर विभिन्न प्रकार की तैरती वस्तुओं पर ही निर्भर रहती है। मिशन में कई अन्य महत्त्वपूर्ण प्रजातियों की भी खोज हुई। इनमें साइनाग्रोप्स जैपोनिकास भी एक थी जिसके पेट पर प्रकाश देने वाले अंग होते हैं। इन प्रजातियों की व्यावसायिक उपयोगिता का अध्ययन होने के बाद संभावित उद्यमी उन क्षेत्रों में इनकी तलाश करेंगे जिनकी सलाह सीआईएफटी ने दी है। 

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