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सड़क नियामक के आने से दूर होंगी कई बाधाएं
विनायक चटर्जी /  November 19, 2013

हाल ही में हुआ सड़क अनुबंधों का पुनर्गठन हमारी अनुकूलन क्षमता दिखाने के साथ यह भी याद दिलाता है कि हमें इस वक्त किसी समिति की नहीं बल्कि सड़क नियामक की जरूरत है। बता रहे हैं विनायक चटर्जी

बीते अक्टूबर महीने की 8 तारीख को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उन सभी प्रमुख सड़क अनुबंधों के लिए एकबारगी पुनर्गठन पैकेज को मंजूरी दे दी जो विभिन्न वजहों से वित्तीय दबाव झेल रहे थे। सरकार ने प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) के अध्यक्ष सी रंगराजन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया ताकि वह अर्हता की शर्तों और योजना का ब्योरा तैयार करे। समिति में पांच सदस्य रखे गए हैं और उम्मीद की जा रही है कि वह दिसंबर तक अपनी अनुशंसाएं पेश कर देगी।

समिति के सदस्य हैं सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के सचिव विजय छिब्बर, योजना आयोग की सचिव सिंधुश्री खुल्लर, पीएमईएसी के सचिव आलोक शील, भारतीय राष्टï्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अध्यक्ष आर पी सिंह और व्यय सचिव आर एस गुजराल। बहरहाल अगर इसमें निजी क्षेत्र का प्रतिनिधि भी शामिल होता तो बेहतर होता।

तमाम डेवलपरों ने इस सैद्घांतिक मंजूरी का स्वागत किया। ऐसा इसलिए क्योंकि खुद उनकी वित्तीय स्थिति खस्ता है और उनको विभिन्न तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिस राहत पैकेज की बात की जा रही है उसमें शुरुआती वर्षों में कम शुल्क वाले वक्त में तयशुदा प्रीमियम भुगतान को समर्थन, विकास संबंधी कारकों, पूंजीगत जरूरतों और उच्चतम स्तर पर कर्ज में मदद की बात शामिल है।

शुरुआती वर्षों में इस सहायता की भरपाई बाद के वर्षों में उच्च प्रीमियम के जरिये की जाएगी ताकि संबंधित राजमार्ग परियोजना की नेट प्रजेंट वैल्यू (एनपीवी) बरकरार रहे। इस योजना का विरोध मोटे तौर पर नैतिक आधार तथा नीलामी प्रक्रिया पर इसके संभावित नकारात्मक असर को लेकर हो रहा है। हालांकि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के किसी तरीके पर बात नहीं की जा सकती है लेकिन फिलहाल के लिए तो यह निम्रलिखित सात वजहों से व्यावहारिक तरीका नजर आ रहा है:

(1) नए सिरे से बातचीत को समझने की आवश्यकता है और हमें इसे निजी सार्वजनिक परियोजनाओं (पीपीपी) की अनिवार्य जरूरत के रूप में स्वीकार करना होगा। खासतौर पर उनके शुरुआती दौर में। विश्व बैंक ने लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई द्वीप समूह में 1985 से 2000 के बीच  जिन 1,000 से अधिक पीपीपी का अध्ययन किया उनमें निम्र बातें निकलकर आईं:

41.5 फीसदी परियोजनाओं में नए सिरे से बातचीत की जरूरत पड़ी थी। परिवहन क्षेत्र की बुनियादी योजनाओं में से 55 फीसदी पर दोबारा चर्चा हुई। दोबारा चर्चा में से 85 फीसदी चार साल के भीतर और 60 फीसदी तीन साल के भीतर शुरू हुई। 

दोबारा बातचीत ज्यादातर उन मामलों में हुई जिनका आवंटन प्रतिस्पर्धी नीलामी के जरिये किया गया था।ऐसे में जाहिर है यह कोई प्रतिष्ठïा का प्रश्न नहीं है।

(2) देखा जाए तो यह भी स्पष्टï है कि जोखिम और विभिन्न अंशधारकों की जोखिम वहन करने की क्षमता का भी पर्याप्त आकलन नहीं किया गया। निजी क्षेत्र ने परिवहन से जुड़े अपने अति आक्रामक व्यवहार से यह बात उजागर की है। भारी भरकम कर्ज और ऊंची बोली में भी कई बार प्रबंधन के स्तर की परिपक्वता का अभाव नजर आया तथा जोखिम के आकलन की भी कमी दिखी। एनएचएआई ने भी सीमांत बोलियों को समाप्त करने में अक्षमता दिखाई। इसके अलावा वह समय पर भूमि अधिग्रहण करने तथा स्वीकृति के मामलों में भी समयावधि का पालन करने में नाकाम रहा। जब तक इन समस्याओं को हल नहीं किया जाता है दोबारा बातचीत के सिवा कोई राह नहीं है।

(3) एनएचएआई के नजरिये से देखें तो दोबारा बातचीत के बाद उसे जो उच्च प्रीमियम मिलेगा वह किसी भी हालत में मौजूदा निवेश के लिहाज से नकारात्मक माहौल में दोबारा बोली से हासिल होने वाली राशि से कहीं अधिक होगा। उम्मीद है कि परियोजना के बदले एनएचएआई को अगले 20 सालों तक डेवलपरों से 1.51 लाख करोड़ रुपये की राशि मिलेगी।

(4) दोबारा बोली लगाना से अपरिहार्य तौर पर और अधिक देरी होगी और इससे परियोजना की लागत भविष्य में और बढ़ेगी। इसका जीडीपी में विकास समेत रोजगार निर्माण, निर्माण उद्योग में तरक्की आदि तमाम संभावित लाभों पर नकारात्मक असर होगा।

(5) एनपीवी तटस्थता एक जन नीति की मिसाल के तौर पर पारदर्शिता और स्वच्छता के मानकों पर खरी उतरती है। यह ऊंची बोली लगाने वाले की वैधता को बरकरार रखती है।

(6) पुरानी बोलियों को खारिज करने का घरेलू और वैश्विक निवेशकों पर बहुत नकारात्मक असर पड़ेगा।

(7) हाल ही में केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग ने आयातित कोयले पर आधारित बड़ी बिजली परियोजनाओं के लिए जिस क्षतिपूर्ति वाले टैरिफ को मंजूरी दी है उसके उलट पुनर्गठन में उपभोक्ता शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

राजमार्ग प्रभाग के देवल मित्रा और राजीव भटनागर के नेतृत्व में हुई एक औपचारिक चर्चा में कुछ मुद्दों पर निम्रलिखित विचार सामने आए:
(क) दायरा और पात्रता: सड़क मंत्रालय केवल 23 फीसदी परियोजनाओं को आर्थिक मदद के बारे में विचार कर रहा है जबकि डेवलपरों का मानना है कि ऐसा सभी परियोजनाओं के लिए किया जाना चाहिए क्योंकि अधिकांश को आगे चलकर इसी तरह की परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

(ख) रियायती दर: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जिस 12 फीसदी रियायत दर की घोषणा की है वह थोड़ा सख्त नजर आती है। खासतौर पर यह देखते हुए कि उसने गत वर्ष दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को स्पेक्ट्रम शुल्क के स्थगन के लिए 9.75 फीसदी की दर निर्धारित की थी। इसके अलावा यह दर मौजूदा ब्याज दरों पर आधारित है क्योंकि मानक उच्च स्तर पर हैं। जबकि दो दशक या उससे अधिक की रियायती अवधि के लिए चक्रीय ब्याज दर के आधार पर विचार होना चाहिए था। पहले से ही मजबूत नकदी वाली परियोजनाओं को भारी भरकम रियायत देने से उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकेगी। ऐसे में 10 फीसदी की रियायत दर सही प्रतीत होती है।

(ग) जुर्माना: अगर डेवलपर की ओर से डिफॉल्ट होता है तो केंद्रीय मंत्रिमंडल ने परियोजना लागत के 0.5 फीसदी तक का जुर्माना लगाने का प्रस्ताव भी रखा है। यह अवधारणात्मक स्तर पर स्वीकार्य है।

(घ) बैंक गारंटी: एक नजरिया यह भी है कि डेवलपर शुरुआती और मौजूदा प्रीमियम के बीच के अधिकतम अंतर के बराबर की बैंक गारंटी जुटाएं। चूंकि मूल समझौते में किसी बैंक गारंटी की बात नहीं है इसलिए यह अनावश्यक है।

(च) प्रीमियम का पुनर्निर्धारण: डेवलपरों ने 6 से 8 वर्ष का विलंबकाल मांगा है जबकि योजना आयोग ने प्रीमियम के अंतर के प्रतिशत को हर वर्ष जोडऩे का प्रस्ताव रखा है। हर परियोजना की अलग-अलग प्राथमिकताओं को देखते हुए बेहतर यही होगा कि इस बात को एनएचएआई पर छोड़ दिया जाए।

(छ) समिति के फैसले के बाद एनएचएआई को मजबूत बनाना: एक बार रंगराजन समिति द्वारा स्वरूप तय कर दिए जाने के बाद एनएचएआई को पूरी तरह अधिकार संपन्न बनाया जाना चाहिए ताकि वह रियायतग्राहियों से निपट सके।

(ज) सड़क नियामक: मैं पहले भी यह दलील दे चुका हूं कि देश में एक मजबूत और विश्वसनीय सड़क नियामक होता तो संबंधित समस्याओं का हल अपेक्षाकृत जल्दी निकल आता।

कुल मिलाकर राजमार्ग पुनर्गठन की कवायद और हाल में आयातित कोयले की कीमतों पर केंद्रीय बिजली नियामक के फैसले से यह पता चलता है कि कैसे देश में पीपीपी पर दोबारा चर्चा अपरिहार्य होती जा रही है।

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