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प्रशासनिक फैसलों पर जांच से प्रधानमंत्री नाखुश
बीएस संवाददाता / नई दिल्ली November 11, 2013

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की ऐसे प्रशासनिक फैसलों से जुड़ी जांचों की आलोचना की जो किसी गलत इरादे से नहीं लिए गए थे। उन्होंने जांच की मौजूदा नीति को 'त्रुटिपूर्ण और जरूरत से ज्यादा सक्रियÓ करार दिया। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भ्रष्टïाचार और अपराध से निपटने के लिए आम रणनीति विषय पर आयोजित अंतरराष्टï्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने यह बात कही।

उल्लेखनीय है कि कोयला ब्लॉक आवंटन में तथाकथित गड़बडिय़ों की जांच कर रही सीबीआई ने पिछले महीने उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला और पूर्व कोयला सचिव पी सी पारेख के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया था। सीबीआई की इस तरह की कार्रवाई पर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे थे। सिंह का बयान सीबीआई द्वारा पूर्व कोयला सचिव के खिलाफ दर्ज एफआईआर की पृष्ठभूमि में आया है, जिसमें हिंडालको को तालाबीरा कोयला ब्लाक के आवंटन संबंधी फैसले को कथित रूप से बदलने के कारण उन्हें आपराधिक कदाचार का आरोपी बनाया गया है।

प्रधानमंत्री ने कहा, 'सरकार में नीति निर्धारण एक बहु-स्तरीय और जटिल प्रक्रिया है और एक पुलिस एजेंसी को नीति बनाने के बारे में दुराग्रह के सबूत के बिना फैसले सुनाना उचित नहीं होगा।Ó पूर्व कोयला सचिव पर एफआईआर दर्ज होने के बाद इसकी आंच सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के ऊपर भी आ गई। पारेख ने तो यहां तक कहा कि उगर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होता है तो फिर प्रधानमंत्री भी इसके दायरे में आ सकते हैं क्योंकि उस समय प्रधानमंत्री के पास की कोयला मंत्रालय का प्रभार था और इस तरह के मामलों में अंतिम फैसला प्रधानमंत्री का था।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हाल ही में गौहाटी उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में सीबीआई की वैधता पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि इस मामले को गंभीतरतापूर्वक और तत्काल विचार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा, 'सीबीआई और उसकी वैधता के लिए सरकार सभी तरह की जरूरी कदम उठाएगी।Ó सीबीआई को स्वायत्तता संबंधी बहस पर सिंह ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियां कार्यपालिका का हिस्सा हैं और उन्हें इसकी प्रशासनिक निगरानी में काम करना चाहिए। उन्होंने कहा, 'जांच में स्वायत्तता दे दी गई है। अगर जांच की प्रक्रिया को बाहरी दखल से बचाने के लिए कुछ और करने की जरूरत होगी तो हम ऐसा करने से हिचकिचाएंगे नहीं।Ó
सीबीआई को बचाने उतरी सरकार
गौहाटी उच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई को 'असंवैधानिकÓ करार दिए जाने के बाद अब सरकार पूरी तरह से सीबीआई के बचाव में उतर आई है। सरकार ने उस याचिका पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी है जिसकी सुनवाई करने के दौरान गौहाटी उच्च न्यायालय ने सीबीआई को 'असंवैधानिकÓ एजेंसी करार दिया था।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा था, 'भारत सरकार ने मामले में कोई भी हलफनामा नहीं दिया लेकिन दूसरे प्रतिवादी के तौर पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने शपथ पत्र दायर किया जिसमें यह दावा किया गया था कि वह दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट ऐक्ट 1946 के तहत अपने काम और अधिकारों का इस्तेमाल करती रही हैं।Ó

वरिष्ठï वकील विजय अग्रवाल ने कहा, 'शायद उन्होंने इसलिए जवाब दाखिल नहीं किया क्योंकि उनके पास इसका जवाब नहीं था। अदालत मूक दर्शक नहीं हो सकती है। इससे किसी मामले में कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि यह एक पक्षीय फैसला न होकर पूरी तरह से तार्किक फैसला है।Ó अग्रवाल ने 2जी स्पेक्ट्रम मामले में अपने मुवक्किल आर के चंदौलिया और शाहिद बलवा के खिलाफ  चल रही सुनवाई पर रोक लगाने की मांग की थी। चंदौलिया ए राजा के निजी सचिव रहे हैं जबकि शाहिद बलवा डीबी रियल्टी के प्रवर्तक हैं।

हालांकि पूर्वव्यापी प्रभाव के मामले में क्या इससे सीबीआई को लेकर उच्च न्यायालय के रुख से कोई असर होगा, यह बहस का विषय है। लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि याचिका दायर होने के बाद सरकार प्रस्ताव से जुड़े सभी साक्ष्यों एवं दस्तावेजों को सामने रख सकती थी। वरिष्ठï वकील अमन लेखी ने कहा, 'सरकार ने पूरी जानकारी सामने नहीं रखी। इसलिए अदालत ने मामले में निर्णय दिया।Ó

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी आज सीबीआई को आश्वासन देते हुए कहा कि एजेंसी की वैधता को बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास करेगी। पूर्व न्यायाधीश आर एस सोढ़ी ने कहा, 'जब कानून के बारे में सवाल उठाया जाता है तो जवाब देने की आवश्यकता होती है। हालांकि अगर कोई अधिसूचना नहीं थी तो वैसी स्थिति में उच्च न्यायालय के निर्णय पर कोई असर नहीं होगा।

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सरकार ने जवाब दिया या नहीं।Ó गौहाटी उच्च न्यायालय के खंडपीठ ने नवेंद्र कुमार की याचिका की सुनवाई करते हुए गृह मंत्रालय के उस प्रस्ताव को रद्द कर दिया था जिसके तहत सीबीआई का गठन किया गया था।

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