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पनबिजली परियोजनाओं पर उत्तराखंड सरकार मौन
शिशिर प्रशांत / देहरादून November 10, 2013

उत्तराखंड सरकार ने एक तरफ तो मीडिया में अपनी उपलब्धियां बताने के लिए जोरदार अभियान की शुरुआत की है, वहीं दूसरी तरफ राज्य में पनबिजली परियोजनाओं की स्थिति को लेकर उसने पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। इस पहाड़ी राज्य में विकास को धार देने के लिए पनबिजली परियोजनाएं सबसे अहम क्षेत्र साबित हो सकता है लेकिन पिछले कुछ समय से इस मामले पर सरकार अपनी स्थिति स्पष्टï नहीं कर पा रही है।

मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राज्य की स्थापना दिवस के मौके पर एक पुस्तक जारी की, लेकिन इसमें भी पनबिजली परियोजनाओं के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा गया है। ऐसा लगता है कि पिछले कुछ सालों से सरकार ने इस क्षेत्र को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है और पनबिजली परियोजनाओं की स्थिति पर कुछ भी बोलने से कतरा रही है।

उत्तराखंड में पनबिजली परियोजनाओं के जरिये तकरीबन 26,000 से 30,000 मेगावॉट बिजली उत्पादन की क्षमता है जबकि मौजूदा समय में यहां महज 3,622.14 मेगावॉट बिजली का ही उत्पादन हो रहा है। यहां तक राज्य सरकार की बिजली उत्पादन कंपनी यूजेवीएन की लक्ष्य से भी ज्यादा करीब 481.21 करोड़ यूनिट बिजली उत्पादन की क्षमता है। वित्त वर्ष 2012-13 में इस कंपनी के लिए 475.26 करोड़ यूनिट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था।

दरअसल पर्यावरण और धार्मिक आस्था से जुड़ी बाधाओं के चलते राज्य सरकार ने पनबिजली परियोजनाओं की दिशा में अपना कदम रोक लिया है। यही कारण है कि कई परियोजनाओं का काम अधूरा पड़ा है। बड़ी पनबिजली परियोजनाओं पर लगातार बढ़ते विवाद के बाद सरकार ने छोटी पनबिजली परियोजनाओं (एसएचपी) पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

वहीं जून में आई भारी तबाही के बाद अब सरकार सौर ऊर्जा से चलने वाले लैंफ पर जोर दे रही है। यहां तक कि जून में बाढ़ की वजह से इस क्षेत्र की विभिन्न पनबिजली परियोजनाओं को कितनी क्षति पहुंची है, सरकार इस बारे में विस्तृत जानकारी भी नहीं दे रही है। उत्तराखंड में पनबिजली परियोजनाओं को लेकर राज्य सरकार की भविष्य की क्या नीति होगी, इस बारे में कुछ भी खुलासा करने से वह बच रही है।

अगस्त में उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद से ही सरकार ने इस मामले पर कुछ न बोलना ही बेहतर समझा है। यह विभाग स्वयं मुख्यमंत्री के पास है। मुख्यमंत्री भले ही अपनी नीति का खुलासा न करे, लेकिन वह इस मामले पर पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर हमला करने से नहीं चूकते हैं। उनका कहना है कि भाजपा सरकार के गलत फैसलों की वजह से यह क्षेत्र पूरी तरह बर्बाद हो गया। उनका कहना कि शीर्ष न्यायालय के आदेश को ध्यान में रखते हुए सरकार इस दिशा में आगे कदम नहीं बढ़ा पा रही है।

उल्लेखनीय है कि शीर्ष न्यायालय ने अपने आदेश में राज्य की 24 पनबिजली परियोजनाओं की समीक्षा करने का आदेश दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि इन परियोजनाओं की अध्ययन के लिए विशेषज्ञोंं की एक समिति गठित की जाए और तब तक कोई भी नई परियोजना लगाने की अनुमति न दी जाए।

शुरुआती अनुमान के मुताबिक उच्चतम न्यायालय के आदेश के चलते यूजेवीएन की कुल 35 परियोजनाओं का भविष्य अधर में लटक गया है, जिनसे तकरीबन 4,200 मेगावॉट बिजली पैदा होने की उम्मीद थी। यूजेवीएन के एमडी जी पी पटेल ने कहा, 'शुरुआती आकलन है हमारी कुल 35 परियोजनाएं समीक्षा के तहत आ गई हैं।Ó

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ऊर्जा मंत्रालय ने स्थानीय क्षेत्र विकास निधि (एलएडीएफ) के इस्तेमाल और निगरानी के लिए मसौदा दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिसमें केंद्रीय पनबिजली परियोजनाओं से प्रभावित इलाकों में बुनियादी ढांचे का विकास स्थानीय लोगों की जरूरतों के मुताबिक किए जाने का प्रावधान है। राष्ट्रीय पनबिजली नीति 2008 के मुताबिक  परियोजना से 1 प्रतिशत मुफ्त बिजली उपलब्ध कराई जानी है और इसकी राशि एलएडीएफ के लिए होगी।

इसके अलावा संबंधित राज्य सरकारें भी अपने हिस्से की 12 प्रतिशत मुफ्त बिजली में से 1 प्रतिशत राशि इस कोष के लिए मुहैया कराएंगी। यह दिशानिर्देश उन सभी केंद्रीय पनबिजली परियोजनाओं पर लागू होंगे, जहां परियोजनाओं के लिए 31 अगस्त 2008 के बाद आदेश जारी हुए हैं। इस सिलसिले मेंं मंत्रालय ने संबंधित पक्षों की राय एवं सुझाव मांगे हैं।

मसौदा दिशानिर्देशों के मुताबिक परियोजना के डेवलपर की ओर से मिलने वाली 1 प्रतिशत मुफ्त बिजली को बेचने पर मिली राशि का आवंटन स्थानीय क्षेत्र विकास समिति को नकदी हस्तांतरण के जरिये परियोजना से प्रभावित क्षेत्र के सभी परिवारों को हर साल दी जाएगी। यह परियोजना चालू रहने तक की अवधि तक के लिए लागू होगा। इस योजना के तहत नकदी का हस्तांतरण सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक हस्तांतरण के जरिये होगा। धनराशि का इस्तेमाल पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर के स्थानीय निकायों की सिफारिशों के मुताबिक होगा और पीएए द्वारा विकास कार्य कराए जाएंगे।  यह राजस्व एलएडीएफ में परियोजना के लिए निश्चित साल के लिए जमा होगा, जो बिजली नियामक द्वारा तय की गई दरों के आधार पर जमा किया जाएगा।

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