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भारतीय मीडिया के लिए नजीर है ल्यूसन समिति
मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  November 06, 2013

पिछले हफ्ते ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ ने एक राजपत्र (चार्टर) पर हस्ताक्षर किए, जिसके अंतर्गत मीडिया को विनियमित करने के लिए एक स्वतंत्र संस्था स्थापित की जाएगी। हालांकि भारत के दृष्टिïकोण से यह खबर बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, लेकिन फिर भी दो बातें ऐसी हैं जो हमारे लिए काम की हो सकती हैं।

पहली जरूरी बात तो यह है कि भारत में पत्रकारिता के क्षेत्र में होने वाली ज्यादातर बहसों में ब्रिटिश मीडिया की नजीरें दी जाती रही हैं। द् इकनॉमिस्ट और द् गार्डियन जैसे गंभीर ब्रांडों और मशहूर हस्तियों पर नजर रखने वाले द् सन और द् डेली जैसे टैबलॉयड अखबार ब्रिटिश मीडिया को काफी आकर्षक बनाते हैं और यही वजह है कि हम सालों से उनके मुरीद बने हुए हैं। ऐसे बेहतरीन और मिलेजुले बाजार में मीडिया की स्वतंत्रता का सवाल उठ सकता है और यह काफी रुचिकर है।

 भारतीय और ब्रिटिश मीडिया दोनों देशों का मीडिया लोकतंत्र के अंतर्गत संचालित होता है, दोनों ही देशों में स्वतंत्र मीडिया की परंपरा का पालन होता है। साथ ही दोनों देशों में प्रेस परिषद की गठन किया जाता है जो कुल मिलाकर कुछ भी करने लायक नहीं है। ऐसे में जो कुछ भी ब्रिटेन ने किया है वह काफी मुश्किल है। अगर दुनिया के सबसे मुक्त मीडिया बाजारों में शुमार एक देश को लगता है कि उसे अखबारों के लिए एक विनियामक की जरूरत है तो ऐसे में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अखबार बाजार भारत और यहां प्रकाशक इसके खिलाफ कोई तर्क नहीं दे सकते हैं। भारतीय मीडिया के आत्मनियमन के मुलम्मे को ध्यान में रखते हुए यह राजपत्र भारतीय नेताओं के लिए मीडिया पर काबू पाने के अस्त्र के रूप में काम कर सकता है।

मीडिया की भ्रष्टïाचार को उजागर करने की अपनी प्रवृत्ति के चलते नेताओं का कोपभाजन बनना पड़ सकता है। चार्ली बैकेट लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में मीडिया और संचार विभाग के प्रमुख  हैं और अंतरराष्टï्रीय पत्रकारिता को लेकर चलने वाली बहस और शोध पर काम करने वाले एक थिंक टैंक पोलिस के निदेशक का पद भी संभाल रहे हैं। वह कहते हैं, 'इस चार्टर से मीडिया विनियमन में राजपरिवार और नेताओं के हस्तक्षेप की खतरनाक परंपरा की शुरुआत होगी। आप दुनिया में जहां भी देखेंगे जहां विनियमन नेताओं के हाथ में गया है, उन्होंने मीडिया के विस्तार को रोक दिया है और कभी-कभी तो यह नियमन बहुत ही खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। केन्या का उदाहरण हमारे सामने है। ब्रिटेन जिंबाब्वे तो नहीं है लेकिन यहां पहले अमेरिकी संशोधन जैसे अधिकार भी पत्रकारों को प्राप्त नहीं है।

पत्रकारों के ऊपर भी काफी दबाव है और काफी कानून पहले से मौजूद हैं। हमें ऐसे नियमन की जरूरत है जो मीडिया कंपनियों और राजनेताओं के प्रभावों से मुक्त हो और यह राजपत्र वह नहीं है।Ó

जुलाई, 2011 में ब्रिटिश सरकार ने मीडिया की संस्कृति, कार्यविधि और नैतिकता जांचने के लिए न्यायमूर्ति ल्यूसन समिति बनाई। ऐसा तब किया गया जब यह बात सामने आई कि न्यूज ऑफ द् वल्र्ड नाम के एक अखबार के कुछ संवाददाता लोगों के फोन संदेशों पर नजर रख रहे थे। नवंबर, 2012 में सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में मुख्य रूप से ल्यूसन समिति ने कानून के आधार पर मीडिया के लिए एक स्वतंत्र नियामक बनाने की सिफारिश की। लेकिन प्रेस और अन्य उदार तत्त्व आत्म नियमन की बात पर जोर दे रहे थे। राजपत्र को एक विकल्प के तौर पर पेश किया गया।

राजपत्र उस दौर के उत्पाद हैं जब अंग्रेजी राजशाही के पास आज के मुकाबले अधिक अधिकार हुआ करते थे। बीबीसी और ब्रिटिश काउंसिल ऐसे कुछ संगठनों में शामिल हैं जिन्हें राजपत्र के जरिये स्थापित किया गया है। इस संस्थानों को प्रिवी काउंसिल की ओर से मदद दी जाती है, फिलहाल इसके प्रमुख ब्रिटेन के उप-प्रधानमंत्री निक क्लेग हैं और इस काउंसिल में मंत्रिमंडल के कैबिनेट और उप मंत्री शामिल होते हैं। प्रिवी काउंसिल के पास राजपत्र लागू करने और हटाने का अधिकार होता है। इसलिए यह राजपत्र काम करेगा या नहीं इस बात को लेकर बहस जारी है।

यही वह बिंदु है जहां एक परिपक्व लोकतंत्र और बाजार और अपरिपक्व लोकतंत्र के बीच के अंतर को समझा जा सकता है। ल्यूसन समिति, सातवां मौका था जब 70 सालों के दौरान मीडिया की कार्यपद्घति की जांच के लिए जांच शुरू की गई। आजादी के 65 साल से भी अधिक समय बीतने पर भारत में अभी तक सिर्फ एक ही ऐसी जांच हुई है। 1953 में पहले प्रेस आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश की थी। इसके परिणामस्वरूप 1966 में भारतीय प्रेस परिषद की स्थापना की गई। इस पीछे मूल भावना आत्म नियमन मुहैया कराने की थी।

जब 140 समाचार चैनल और करीब 82,000 समाचार पत्र करीब 1 अरब लोगों तक पहुंचने की कोशिश करेंगे तो ऐसे में थोड़ा हो-हल्ला तो बनता है। चूंकि एक सूचना और खबर के लिए सैकड़ों समाचार ब्रांड एक दूसरे से मुकाबला करते हैं इसलिए पत्रकारिता से जुड़े मानकों में गिरावट आती है और औद्योगिक संगठनों की प्रतिद्वंद्विता तो अलग ही मसला है। उदाहरण के लिए न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन या एनबीए ने सदस्यों के लिए सामग्री को लेकर कुछ नियम और आचार संहिता बनाई है जिसका पालन वे नहीं करते हैं। वर्ष 2009 में आम चुनाव के दौरान पैसे लेकर खबरें छापने का आरोप कई प्रमुख अखबारों पर लगा। सिर्फ आधा दर्जन अन्य अखबारों ने उस खबरों को छापा। आरोपी ब्रांड न सिर्फ आशावादी बने रहे बल्कि वे निर्लज्जता पूर्वक अड़े रहे। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक पेड न्यूज के मामले वर्ष 2012 में काफी बढ़े।

 सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का रवैया काफी बेरुखी भरा है। या तो वह समाचार मीडिया को छूने से भी डरते हैं या फिर उसके लिए पूरी तरह तैयार हैं। ऐसे में शुरुआत में हमारे पास भी ल्यूसन समिति जैसी कोई समिति हो जहां उद्योग के मसलों पर चर्चा की जाए, उसके बाद विनियामक और उसकी प्रकृति के बारे में बात हो।

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